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आतंकी देविंदरपाल सिंह भुल्लर को फांसी
नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने खालिस्तान लिबरेशन फोर्स (केएलएफ) के आतंकवादी देविंदरपाल सिंह भुल्लर की मौत की सजा को उम्रकैद में तब्दील करने की याचिका को शुक्रवार को खारिज कर दिया। भुल्लर ने अपनी दया याचिका पर फैसले में देरी होने के आधार पर गुहार लगाई थी। खचाखच भरे अदालत कक्ष में फैसला सुनाते हुए न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी और न्यायमूर्ति एसजे मुखोपाध्याय की पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता सजा को कम करने के लिए मामला पुख्ता करने में विफल रहे। आज के फैसले से भुल्लर को फांसी देने का रास्ता साफ होगा और मौत की सजा की कतार में 17 अन्य दोषियों पर भी इसका असर पड़ सकता है, जिनमें राजीव गांधी हत्याकांड के दोषी भी शामिल हैं। 48 वर्षीय भुल्लर की कनाडा में रहने वाली पत्नी नवनीत कौर फैसले के दौरान अदालत में मौजूद थी। जब पीठ ने पूर्वाह्न 11:15 बजे फैसला पढ़ा तो कौर उदास नजर आई। उसने संवाददाताओं के सवालों का जवाब नहीं दिया और अदालत परिसर से चली गई। शीर्ष अदालत ने भुल्लर के परिवार की याचिका पर पिछले साल 19 अप्रैल को अपना फैसला सुरक्षित रखा था। परिवार ने भुल्लर की ओर से दाखिल याचिका में कहा था कि उसकी दया याचिका पर फैसला करने में काफी देरी हुई और वह मानसिक रूप से स्वस्थ नहीं है इसिलए उसे सुनाई गई मौत की सजा को आजीवन कारावास में तब्दील किया जाए। याचिका में दलील दी गई थी कि मौत की सजा दिए जाने के इंतजार में कैदी को लंबे समय तक जेल में रखना क्रूरता के समान है और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मूलभूत अधिकार का उल्लंघन है। भुल्लर को सितंबर, 1993 में यहां बम विस्फोट करने के मामले में मौत की सजा सुनाई गई थी। विस्फोट में नौ लोगों की जान चली गई थी और तत्कालीन युवक कांग्रेस अध्यक्ष एमएस बिट्टा समेत 25 अन्य घायल हो गए थे। अगस्त, 2001 में निचली अदालत ने भुल्लर को मौत की सजा सुनाई थी, जिस पर 2002 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने मुहर लगा दी थी। इसके खिलाफ उसकी अपील को शीर्ष अदालत ने 26 मार्च, 2002 को खारिज कर दिया था। भुल्लर ने एक पुनर्विचार याचिका दाखिल की थी। उसे भी 17 दिसंबर, 2002 को खारिज कर दिया गया था। भुल्लर ने तब सुधारात्मक याचिका दाखिल की और शीर्ष अदालत ने उसे भी 12 मार्च, 2003 को खारिज कर दिया था। इस बीच भुल्लर ने 14 जनवरी, 2003 को राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका दाखिल की थी। राष्ट्रपति ने आठ साल से अधिक समय के अंतराल के बाद 25 मई, 2011 को उसकी दया याचिका को खारिज कर दिया था।



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