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बुनियाद: जब लाहौर की सड़कों पर भी छा जाता था सन्नाटा

टेलीविजन का मशहूर सीरियल रहा बुनियाद कल (25 जुलाई) से एक बार फिर दूरदर्शन पर प्रसारित होने जा रहा है. इस ख़बर ने बचपन की कई मीठी यादें जगा दीं. जिन लोगों ने बुनियाद देखा है वो शायद इस बात को समझ जाएंगे कि कैसे उस दौर में बुनियाद उनकी ज़िंदगी का अहम हिस्सा बन गया था. ये वो कहानी है जिसे 27 साल पहले, हिंदुस्तान में ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान में भी बड़े चाव से देखा गया था. 27 साल पहले बुनियाद के मास्टर जी, लाजो जी, वीरांवाली और इन जैसे कई किरदार हर परिवार का हिस्सा बन गए थे. देश के विभाजन के दर्द से जूझते, लेकिन हार ना मानने वाले इन किरदारों के दुख-सुख, टीवी के सामने बैठे हर परिवार के दुख-सुख बन गए थे. ये वो दौर था जब टेलीविजन सीरियल सिर्फ मनोरंजक ही नहीं बल्कि साहित्यिक भी हुआ करते थे. वो साल था 1986, भारत में टेलीविजन का वो दौर जब आज की तरह सैकड़ों टीवी चैनल्स नहीं थे, सिर्फ दूरदर्शन था. दूरदर्शन के बेहद मशहूर सीरियल हम लोग के ख़त्म होने के कुछ ही महीने बाद बुनियाद का प्रसारण शुरू हुआ था. बुनियाद को मशहूर फिल्म निर्देशक रमेश सिप्पी ने निर्देशित किया था. वहीं रमेश सिप्पी जिन्होने भारतीय सिनेमा को फिल्म शोले जैसा मील का पत्थर दिया. लेकिन बुनियाद के किरदारों का सृजन करने, उनमें प्राण फूंकने का काम किया लेखक साहित्यकार मनोहर श्याम जोशी ने. मनोहर श्याम जोशी ने बड़ी शिद्दत, बड़े जुनून के साथ उस दौर के हालात, समाज और किरदारों का ख़ाका बुनियाद में खींचा था. जो लोग बुनियाद और इसकी कहानी से वाक़िफ़ नहीं हैं, उनके लिए कुछ पंक्तियों में ये कहानी बयां कर देता हूं. बुनियाद की कहानी की शुरुआत हुई विभाजन से पहले के लाहौर में, जहां जिंदगी बेलौस थी, बेफिक्र थी. ये दास्तान थी लाहौर की गली विछ्छौं वाली में रहने वाले मास्टर हवेलीराम और उनके परिवार की. अपने उसूलों के पक्के देशभक्त मास्टर हवेली राम आजादी की लड़ाई के सिपाही थे, जबकि उनके पिता लाला गेंदामल अंग्रेजों के हिमायती. बुनियाद में रौमैंस भी था लेकिन उस प्रेम कहानी में भी अपनी ही कशिश थी. मास्टर जी लाजो जी को पढ़ाने जाते हैं, और मन ही मन उसे पसंद भी करते हैं. मास्टरजी लाजो से अपने प्यार का इज़हार नहीं कर पाते. लाजो की शादी एक बड़ी उम्र के आदमी से हो जाती है. लेकिन शादी की रात ही दिल का दौरा पड़ने से लाजो के पति की मौत हो जाती है. परिवार और समाज के कड़े विरोध के बावजूद मास्टर जी विधवा लाजो से शादी कर लेते हैं. दिन बीतते जाते हैं और फिर होता है वो हादसा जो पूरे देश, पूरे समाज मे उथल-पुथल मचा देता है. देश के बंटवारे की खबर आती है और देश विभाजन से ठीक पहले लाहौर में हुए दंगे मास्टर हवेलीराम के आदर्शों की बुनियाद को हिला कर रख देते हैं. परिवार पर मुसीबतें एक साथ गिरती हैं और फिर इन्ही दंगो में अचानक मास्टर हवेली राम लापता हो जाते हैं. देश के विभाजन के बाद ये परिवार बेघर हो जाता है, दोस्त रिश्तेदार छूट जाते हैं. रह जाती है तो बस यादें, जिन्हे लेकर हवेली राम का पूरा परिवार दिल्ली के एक रिफ्यूजी कैंप में जाता है. मास्टर हवेली राम की भूमिका निभाने वाले आलोक नाथ आज भी बुनियाद का ज़िक्र आने पर मुस्कुरा देते हैं, ऐतिहासिक घटना रही बुनियाद...हमने एक नासूर को , एक दर्द को, एक वक़्फ़े को...हमने जीवंत किया टेलीविजन पर . लेखक मनोहर श्याम जोशी आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन इस सीरियल की रिसर्च में उनकी मदद करने वाले प्रोफेसर पुष्पेश पंत बताते हैं, विभाजन के वक्त के माहौल की तस्वीर बयान करने में हिंदी साहित्य की मशहूर हस्ती, लेखिका कृष्णा सोबती का भी अमूल्य योगदान था. इस बात का जिक्र अपनी किताब बुनियाद में खुद मनोहर श्याम जोशी ने भी किया है. तकनीकी तौर पर भी रमेश सिप्पी ने उस दौर की घटनाओं को रीक्रिएट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. बुनियाद के शुरुआती बीस से भी ज्यादा एपिसोड एक फिल्म की तरह शूट किए गए थे. हालांकि बाद के एपिसोड्स का निर्देशन ज्योति सरूप ने किया था. साल 1986 के मध्य मे दूरदर्शन पर बुनियाद की शुरुआत हुई और शुरुआती तीन एपिसोड्स ने ही दर्शकों का दिल जीत लिया. बुनियाद की शूटिंग के दौरान ही वीरावांली का किरदार निभा रही अभिनेत्री किरण जुनेजा और निर्देशक रमेश सिप्पी की दोस्ती शुरू हुई जो बाद में शादी की मंज़िल तक पहुंची. देश के विभाजन से जुड़ी इस कहानी ने उस दौर में दर्शकों के दिल पर भी गहरा असर डाला. ये असर सिर्फ हिंदुस्तान के दर्शकों पर ही नहीं था बल्कि हर मंगलवार और शनिवार जब बुनियाद का प्रसारण होता था, तो पाकिस्तान के लाहौर की सड़कों पर भी सन्नाटा छा जाता. बुनियाद के किरदारों के साथ दर्शक किस हद तक जुड़ गए थे. इसकी मिसाल है सीरियल में वृष्भान के बेटे जयभूषण यानी जेबी के किरदार की मौत. कहानी में जेबी को ब्लड कैंसर हो जाता है. जेबी का किरदार निभाने वाले अभिनेता अभिनव चतुर्वेदी बताते हैं, मुंबई के टाटा मेमोरियल कैंसर हॉस्पिटल के एक डॉक्टर ने बुनियाद के लेखक मनोहर श्याम जोशी को एक पत्र लिखा. डॉक्टर का कहना था सीरियल में जेबी को मरते हुए ना दिखाया जाए. अगर ऐसा होगा तो देश में कैंसर के मरीज़ हिम्मत हार बैठेंगे। लेकिन मनोहर श्याम जोशी ने कहानी के उस मोड़ पर डॉक्टर की बात मानने से इंकार कर दिया और फिर बुनियाद में जेवी की मौत देश भर में दर्शकों की आंखे नम कर दीं थीं. सीरियल में जेवी की मौत के बाद उनकी पत्नी मंगला का किरदार निभाने वाली अभिनेत्री कृतिका देसाई को मुंबई के बाजार में कुछ महिलाओं ने घेर लिया, रोने लगीं और उनके सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया कि सब कुछ टीक हो जाएगा. सीरियल में विलेन श्यामलाल का किरदार निभाने वाले अभिनेता विनोद नागपाल पर मुंबई में कुछ लोगों ने पत्थरों से हमला कर दिया. वो जोर जोर से कह रहे थे कि तुमने वृष्भान के परिवार को उजाड़ दिया...तुम्हे सज़ा मिलनी ही चाहिए . कुछ ऐसा था 27 साल पहले बुनियाद का असर . 104 एपिसोड तक चलने वाला बुनियाद, उस समय का सबसे लंबा चलने वाला टीवी सीरियल था. ये रिकॉर्ड तो बाद में कई सीरियल्स ने तोड़ा लेकिन ऐसी छाप कम ही सीरियल छोड़ पाए. यही वजह है कि उस दौर के लोगों के बीच आज भी जब बुनियाद का जिक्र आता है तो यादों में मास्टर हवेलीराम और लाजो जी फिर मुस्कुराने लगते हैं. आज समय भी काफ़ी बदल चुका है और टेलीविजन की तस्वीर भी. पहली बार प्रसारण के बाद, इस सीरियल का अलग अलग चैनलों पर रिपीट टेलीकास्ट भी हो चुका है. इसलिए बुनियाद अब भी 27 साल पहले जैसा असर छोड़ेगा, ये मानना ज़्यादती होगी. लेकिन ये कहना भी ग़लत नहीं होगा कि आज के हालात में भी बुनियाद की कहानी ने अपनी प्रासंगिकता नहीं खोई है. आज के तेज़ रफ्तार वाले सीरियल्स के बीच, अगर आप इस पुराने सीरियल को देखने बैठेंगे तो यक़ीन मानिए, इसके जज़्बात आज भी आपके दिल को छू लेंगे.





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