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आओ एक दीप जलाएं

एक बार फिर दिपावली का त्योहार मनाने हम जा रहे हैं दीपावली के छ: दिन बाद हम डूबते सूर्य को नमस्कार कर अगले दिन उगते सूर्य को नमस्कार कर छठ त्योहार मनाएंगे। इसी कड़ी में  छ: नवम्बर को गुरूनानक जयन्ती भी मनाने जा रहे हैं, सभी त्योहार हमें मन के अंधकार को दूर कर संतोष की कला सिखाता है ताकि हम सुख व शांति प्राप्त कर मुक्ति पाने के लिए प्रार्थना कर सकें।
क्या वास्तव में हम ऐसा कर पा रहे हैं। आत्ममंथन करें, आज फिर एक बार हमारे सामने एक सुनहरा अवसर है गणेश पूजा, श्राद्ध, दुर्गापूजा, दशहरा, बकरीद के बाद दीपावली, छठ, और गुरूनानक जयन्ती सभी बार-बार मुझे यह बताने का प्रयास कर रहा है कि सत्य की सदा जय होती है। रावणी शक्ति का हमेशा अंत होता है, अंधकार पर, सदा प्रकाश विजय प्राप्त करती है लेकिन आज भौतिक पदाथोर्ं की येन केन प्राप्ति के लिए हम अंधा होकर दिन-रात लगे हुए हैं। हमें इतना भर भी सोचने का समय नहीं है कि जो कुछ भी हम कर रहे हैं क्या वह उचित भी है? हम यह भी भूल चुके हैं कि हम जो कुछ दिन-रात संग्रह कर रहे हैं, वह सब कुछ, इसी जगत में छोड़कर जाना होगा। धन कमाना बुरा नहीं है लेकिन अंधा होकर धन अर्जित करना बिल्कुल बुरा है। मनुष्य को जीवन में तीन अवस्था से गुजरना पड़ता है, बचपन, जवानी और बुढ़ापा, बचपन में ब्रहमचर्य का पालन करते हुए नाना प्रकार के सद्‌विद्या रूपी धन अर्जित करना चाहिए। यह धन हमें जीवन के अन्तिम काल तक हमें राह दिखाता है। जवानी में परिश्रम रूपी धन अर्थात कर्मधन अर्जित करना चाहिए, इस धन से अपना, अपने परिवार का, अपने वंशजों  का ख्याल रखते हुए जरूरतमंदों की मदद करनी चाहिए। बुढ़ापे में आहार विहार का संयम के साथ प्रभू भजन रूपी धन अर्जित करना चाहिए जो हमें मोक्ष प्राप्त करने में सहायक हो। नीतिकार शिरोमणि भर्तृहरि ने कहा है-
 भोगा न भुक्ता, वयमेव भुक्ता, स्तपो प तप्तं वयमेव तप्ता।
 कालो न यातो, वयमेव याता: स्तृष्णा न जीर्णा, वयमेव जीर्णा:।
भोगों के भोगते जाने से भोगों के प्रति भूख उतरोत्तर बढ़ती जाती है। जिस व्यक्ति को जीवन में संतोष नहीं आता, उसकी जिंदगी का अंत बुरा होता है। कामना की पूर्ति से एक और कामना पैदा हो जाती है हिटलर, नेपोलियन और सिकन्दर जैसे योद्धाओं को जब बेसब्री के चश्में लगे तो उन्होंने पूरे विश्व को आपने अधीन करना चाहा, रावण को जब भोग विलास की कामनाओं ने बेसब्र किया तो उसने श्रीराम से बैर ले लिया और परिणाम क्या हुआ यह बताने की आवश्यकता नहीं है।
 जब संतुष्टि आती है तो मनुष्य के पास उपलब्ध विशाल वैभव राशि भी कोई मायने नहीं रखती। कहा भी गया है-
 गजधन, गऊधन, बाजी धन और रत्न धन खान, जब आवे संतोष धन, सब धन धूलि समान।
 संतोष मन की एक ऐसी अवस्था है, जिसकी प्राप्ति पर संसार के सारे धन धूल के समान लगते हैं। संतोष धन प्राप्त करने के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा तृष्णा है और जब तक आप तृष्णा पर विजय प्राप्त नहीं कर लेते तब तक आप संतोष धन नहीं प्राप्त कर सकते हैं।  विभिन्न धमोर्ं में त्योहार का महत्व यही बताता है कि आप तृष्णा पर विजय प्राप्त कर संतोष धन प्राप्त करें लेकिन तृष्णा पर विजय पाने की जगह हम मृगतृष्णा में भटकते रहते हैं। जिस प्रकार रेगिस्तान में मृग पानी की चाह में इधर-उधर भटक कर अंत में अपने प्राणों से हाथ धो बैठता है, उसी प्रकार इस आधुनिक दुनिया में आधुनिकता की चाह में मानव दर-दर भटक रहा है और अंतत: सभी कुछ यहीं छोड़ जाता है। आईये, इस दीपावली, छठ, गुरूपर्व के अवसर पर एक दीप हम, संतोष प्राप्ति के लिए जलाएं, जो तृष्णा रूपी अंधकार से हमंे। मुक्ति दिलाएं। भारत अध्यात्म का देश है, और जो अध्यात्म के मार्ग पर चलकर तृष्णा पर विजय प्राप्त करने में सफल हो जाएगा, उसे मोक्ष तो अवश्य मिलेगी वर्ना तृष्णा हमें अनंत जन्मों तक जीवन मृत्यु के चक्र में घेरे रखेगा और हम यूं ही भटकते रहेंगे।
   
     इन्हीं शब्दों के साथ आप सभी को दीपावली, छठ, गुरूपर्व की हार्दिक बधाई।
                                                                                                                                        ललित "सुमन"


 उपराज्यपाल पर अब सारी जिम्मेदारी
दिल्ली विधानसभा  चुनाव परिणाम आने के साथ ही यह स्पष्ट हो चुका था कि दिल्ली की आवाम ने दिल्ली को बीच मझधार  में लाकर खड़ा कर दिया है और कांग्रेस-भाजपा को दरकिनार कर एक नइ पार्टी आप पर भी हद से अधिक भरोसा नहीं किया। भाजपा को 32, आप को 28 और कांग्रेस को सत्ता से दूर करते हुए 8 सीट पर समेट कर अपने आक्रोश की ज्वाला को भले शांत किया लेकिन सभी पार्टियों को अग्नि  परीक्षा देने के लिए विवश कर दिया।  दिल्ली के उपराज्यपाल डा. नजीब जंग ने बड़ी पार्टी के नाते भाजपा को आमंत्रित किया लेकिन भाजपा बहुमत नहीं होने की बात कह सत्ता बनाने से इंकार कर दिया। दूसरी बड़ी पार्टी आप को कांग्रेस ने समर्थन दिया लेकिन आप ने समर्थन पत्र  प्राप्त होने के बावजूद जनता से रायसुमारी की और सरकार बन गइ। उपराज्यपाल ने पद एवं गोपनीयता की शपथ आप मंत्री मंडल को दिलाकर अपने कर्त्तव्य  का पालन किया।
 49 दिनों के अंदर कइ घटनाक्रम घटित हुइ और तरह-तरह के मसले आमलोगों के सामने आये जो आज तक दिल्ली की जनता ने दूसरे प्रदेशों के संदर्भ में मीडिया के माध्यम  से देखा व सूना था लेकिन पहली बार वे अपने राज्य में अपने आंखों से देखा कि सत्ता और सत्ता संचालन के दरम्यान दिल्ली की सरकार के सामने किस-किस प्रकार की समस्याएं आती है और एक मुख्यमंत्री  को किस प्रकार संघर्ष करके दिल्ली की जनता के हीत में विकास कार्य का निष्पादन करना पड़ता है। दिल्ली में पांच वर्ष भाजपा ने शासन किया लेकिन उसे तीन मुख्यमंत्री  बनाने पड़े। मदन लाल खुराना के त्याग व तपस्या को दरकिनार करना भाजपा को इतना भारी पड़ा कि आज तक वह सत्ता वापसी के लिए खून-पसीना बहा रही है लेकिन दिल्ली की जनता का दिल नहीं जीत पा रही है। मदन लाल खुराना ने हवाला कांड डायरी में नाम आने पर आडवाणी के साथ पद त्याग कर अपने नैतिकता व उच्च चरित्रा का परिचय दिया, लेकिन भाजपा ने अपने उस कर्मयोगी को दरकिनार कर दिल्ली की जनता का विश्वास खो दिया।
 कांग्रेस को दिल्ली की जनता ने मौका दिया। शीला दीक्षित के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार तीन बार बनी दिल्ली ने विकास किया, जो साफ नजर आ रहा है, लेकिन इस बार दिल्ली की जनता ने न सिर्फ  कांग्रेस को आठ सीट पर समेट दिया बल्कि  मुख्यमंत्री  शीला दीक्षित को पढ़े-लिखे वर्ग  ने नकार दिया और उन्हें पराजय का मुंह देखना पड़ा, कारण स्पष्ट था। दस वर्ष शीला दीक्षित सरकार ने जमकर काम किया लेकिन तीसरी बार चुनाव जीतने के उपरांत कांग्रेस ने युवा वर्ग  के लिए, आमलोगों के लिए वह कार्य नहीं किया जिसकी उम्मीद दिल्लीवासी कर रहे थे। मंहगाइ-भ्रष्टाचार के साथ कांग्रेस की आपसी गुटबाजी से दिल्ली का आम जनता त्रस्त रही, उसका सूनने वाला कोइ नहीं था, भाजपा-कांग्रेस के नेता अपने-अपने क्षेत्र  में सांठ-गांठ कर लिया, निगम में भाजपा लुटती रही, प्रांत में कांग्रेस, बेचारी जनता पिसती रही, तत्कालीन उपराज्यपाल, तेजेन्द्र खन्ना भी कांग्रेस व भाजपा के कुछ विधायक  को अपने पक्ष में कर आम जनता की हित से अधिक शीला सरकार को कमजोर व भाजपा-कांग्रेस नेताओं को संरक्षण देते रहे। दिल्ली की जनता आखिर कहां अपनी फरियाद लेकर जाये। वह पिसती रही, खामोश रही, अन्दर-अन्दर सुलगती रही और जब अन्ना हजारे का आन्दोलन हुआ सड़कों पर उतर आयी। अरविन्द केजरीवाल ने विश्वनाथ प्रताप सिंह की तरह जनता के आक्रोश को समझा और राजनीतिक आखाड़े में कुद गये। 
 सच्चाइ यही है इसे जिसको जिस रूप में मुल्यांकन करना है, विवेचना करना है करता रहे। भाजपा ने मदन लाल खुराना को दरकिनार कर गुटबाजी के माध्यम  से सत्ता तो प्राप्त कर, सत्ता सुख भोग लिया लेकिन कभी सशक्त विपक्ष की भूमिका अदा नहीं किया अगर वह सशक्त विपक्ष की भूमिका अदा किया होता तो 2009 के चुनाव में वह सत्ता में वापस आ सकती थी। भाजपा पुन: बार-बार वही गलती दुहरा रही है, कभी विजेन्द्र गुप्ता को आगे करती है, कभी विजय गोयल को आगे करती है, कभी हर्ष वर्धन  को आगे करती है। खुराना के बाद अगर भाजपा में प्राण अगर किसी ने फूंका  तो वह विजेन्द्र गुप्ता है, जुनियर-सीनियर की लड़ाइ में भाजपा जनता के दिलों में विश्वास स्थापित करने में नाकामयाब रही। क्या कारण है दो वर्ष पुरानी एक युवाओं की टीम इतनी-पुरानी कांग्रेस व भाजपा को चुनौती देने में न सिर्फ कामयाब रही बलिक 28 सीट प्राप्त कर दिल्ली में 49 दिन सरकार चला कर पुन: कांग्रेस-भाजपा को कठघड़े में खड़ा कर एक नइ पारी की शुरूआत करने पूरे देश में निकल पड़ी है। दिल्ली की जनता या देश की जनता सब कुछ देख रही है, वह सब कुछ समझती है, जो पुराने लोग हैं वे ये जानते होंगे कि जब देश आजाद हुआ था तो कइ नेता चुनाव के पक्ष धर नहीं थे लेकिन नेहरूजी ने उस वक्त चुनाव कराया, जनता पर भरोसा किया और देश की जनता भले, भूखे पेट रहे, वस्त्र न हो, इलाज के पैसे न हो लेकिन अपने राष्ट्र के स्वाभिमान के लिए अपना बलिदान देने में कभी पीछे नहीं रहा है, इतिहास इस बात का गवाह है आज भारत एक विशाल लोकतांत्रिक राष्ट्र है तो इसका प्रमाण यही है।
 अरविन्द केजरीवाल एवं उनका मंत्रिमंडल  नये लोगों का संगठन है, पहली बार सभी चुनकर आये थे, क्या हमारे पुराने विधयकों, मंत्रियों का यह दायित्व नहीं बनता था कि वे उन्हें यह बताते की एक राज्य को सुचारू रूप से चलाने के लिए बजट की आवश्यकता होती है, विकास की गति बनाये रखने के लिए इस प्रकार की योजना बनानी पड़ती है, लेकिन सरकार बनने के साथ ही राजनीति शुरू हो गइ, सरकार को घेरो, बदनाम करो, उलझाओ। अगर पुराने नेता राजनीति इसे कहते है तो आम आदमी पार्टी ने भी वही किया जो वे करते है तो फिर इसमें गलत क्या है। अन्य नेता मीडिया व समाचार पत्रों  में सुर्खियां  बनाने के लिए मीडिया का उपयोग करे तो सही, आम पार्टी बोले तो गलत, आप संविधन की उपेक्षा करो तो सही, आम पार्टी करे तो गलत आखिर ऐसा क्यों। गलत तो गलत है चाहे वह कोइ करे। अरविन्द केजरीवाल ने विधानसभा  के अंदर कांग्रेस भाजपा पर सीधा  आरोप लगाया कि अम्बानी से भाजपा कांग्रेस दोनों चंदा लेती है उसके खिलाफ एफआर्इआर का उन्होंने आदेश दिया, इसलिए दोनों दल मिलकर जनलोकपाल बिल सदन में नहीं आने दे रहे। यह पूरी तरह राजनीतिक विचार कहा जा सकता है लेकिन यही आरोप तो दिल्ली में भाजपा, कांग्रेस सरकार पर व केन्द्र में भाजपा, कांग्रेस की सरकार पर इसी तरह की अनेकों आरोप बेगैर सिर-पैर की लगाती रही है। विश्वनाथ प्रताप सिंह ने जिस बोफोर्स घोटाला के नाम पर कांग्रेस को सत्ता से हटाया था वही बोपफोर्स तोप कारगिल युद्ध में भारतीय सेना का मस्तक ऊंचा किया था।
 सिख दंगा का मामला बीस वर्षों  से दिल्ली में 36 रहा था, भाजपा ने भी शासन किया, अकाली उनके मित्र  है लेकिन उन्होंने एसआर्इटी क्यों नहीं बनवाया। क्या भाजपा इसका जवाब दिल्ली की जनता को देगी। केजरीवाल ने राजनीति ही किया हो लेकिन सिख विरादगी के घाव पर मरहम तो लगाया, आपने ऐसा करना अपना कर्त्तव्य  क्यों नहीं समझा। पहले भी उपराज्यपाल थे, डा. नजीब जंग ही एसआर्इटी के लिए क्यों?  दिल्ली के उपराज्यपाल डा. नजीब जंग के पास एक बेहतरीन मौका है। इश्वर जब किसी से अति प्रसन्न होता है तो उसके सामने चुनौती पेश करता है ताकि वह अपनी दक्षता व क्षमता का प्रयोग कर इतिहास में अपने नाम दर्ज करा ले। डा. नजीब जंग को खुदा ने यह अवसर दिया है, वे राष्ट्रपति के दिल्ली में उत्तराधिकारी है, भूमि, पुलिस व कानून व्यवस्था सभी कुछ उनके पास है। विगत 20 वर्षों  में दिल्ली में जिनते भ्रष्टाचार हुए है उसकी निष्पक्ष जांच कराकर दिल्ली की जनता के दिल व दिमाग में यह बैठा दें कि कानून अभी जिंदा है। दिल्ली में जितने भूमि घोटाले हुए है, डीडीए प्लाट, आदि पर भू-माफियाओं  ने कब्जा कर रखा है उसे मुक्त कराकर इतिहास रच दें, दिल्ली की सड़कों पर और अपने घरों में लोग यह महसूस करें कि कोइ उनकी सुरक्षा के लिए सजग है तो क्या दिल्ली में राम-राज्य नहीं आ जायेगा।  उपराज्यपाल डा. नजीब जंग प्रशासनिक अधिकारी, रंगमंच के कलाकार, शिक्षाविद होने के साथ-साथ दिल्ली के उपराज्यपाल है और इश्वर ने उन्हें राजनीतिक दक्षता का परिचय देने का अवसर दिया है यह किसी कुदरती करिश्मा से कम नहीं है। वर्ष-2014-15 का बजट, बिजली कम्पनियों को पैसा, जल बोर्ड के विकास  प्रोजेक्ट, दिल्ली विश्वविधालय में गर्वनिगबडी विधायक  फंड, आदि मुददें रोजमर्रा का मुददा है लेकिन सबसे बड़ी बात है दिल्ली वासियों के दिल में कानून के प्रति विश्वास व संविधन के प्रति आस्था का विश्वास कायम करना। यह बेहतरीन मौका डा. नजीब जंग को समस्याओं के निदान के साथ इतिहास रचने के लिए कुदरत का तोहफा है।
ललित "सुमन" 


देश ने देखा दिल्ली विधानसभा के अंदर का नजारा 
2 जनवरी 2014, नववर्ष का दूसरा दिन, मौका अल्पमत की सरकार का विधानसभा के अन्दर विश्वास मत प्राप्त करने का..
नई दिल्ली। आम आदमी पार्टी को छः महीने का जीवन मिलने का साक्षी बनने का गौरव दिल्ली विधानसभा  को प्राप्त हो चुका है। इस सरकार को अब छः माह तक कोई गिरा नहीं सकता क्योंकि अविश्वास प्राप्त छः महीने के बाद ही इसके खिलाफ लाये जा सकते है, ऐसा संवैधानिक  प्रावधान है।
आम आदमी पार्टी के मंत्री मनीष सिसौदिया ने अपनी अल्पमत की सरकार के लिए, अपने 18 सूत्री  मांग के साथ विधानसभा सदस्यों के सामने विश्वास मत समर्थन का प्रस्ताव रखा और प्रोटेम स्पीकर मतीन अहमद ने विश्वास मत की कार्यवाही को आगे बढ़ाते हुए चर्चा शुरू करवाया।
भाजपा के विधानसभा में नेता डा. हर्षवर्धन ने आप और कांग्रेस पर करारा प्रहार किया और अरविन्द केजरीवाल व मनीष सिसौदिया की संस्था को विदेश से प्राप्त फंड की जांच कराने का मुद्दा  उठाया, डा. हर्षवर्धन  ने कांग्रेस को बार-बार भ्रष्ट कांग्रेस और आप को अनैतिक गठबंध्न करने को लेकर खिचाइ किया, उन्होंने विधानसभा को राजनैतिक मंच बनाने में भी पीछे नहीं रहे, वे यहां तक बोल गये कि किसी प्रकार का अनैतिक गठबंधन कर लिया जाय, नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनने से कोइ रोक नहीं सकता। डा. हर्षवर्धन  काफी आक्रोशित नजर आ रहे थे. उन्होंने साफ शब्दों में कह दिया वे आम आदमी पार्टी के विश्वास मत के खिलाफ है। उन्होंने यहां तक कहा कि अरविन्द केजरीवाल ने बच्चों का कसम खाया था कि किसी से न समर्थन लेंगे न देंगे, फिर  ऐसी कौन सी विवसता  है कि वे कांग्रेस के समर्थन से सरकार बना रहे है।
कांग्रेस पार्टी की ओर से अरविन्दर सिंह लवली विश्वास मत पर अपनी पार्टी की सोच को बड़े ही तरीके से विधानसभा के अन्दर रखा और कहा कि उनकी पार्टी आम आदमी पार्टी की सरकार को विश्वास मत, तब तक जारी रखेगी, जब तक दिल्ली के विकास के लिए अपने घोषणा पत्र  के अनुसार यह सरकार काम करती रहेगी, जरूरत पड़ने पर कांग्रेस पांच साल तक समर्थन देगी लेकिन उन्होंने मुख्यमंत्री केजरीवाल से यह भी कहा कि कोइ भी फैसला जल्दबाजी में न करें, अफसरों के चंगुल में न फंसे, साथ ही कहा कि निगम में व्याप्त भ्रष्टाचार की जांच भी होनी चाहिए।
अरविन्दर सिंह लवली ने भाजपा नेता डा. हर्षवर्धन को कहा कि आधी  सच्चाई  की जगह पूरी सच्चाई  बोले, गुमराह न करें। बंगारू लक्ष्मण, नितिन गडकरी व यदुरप्पा की पार्टी भ्रष्टचार की बात किस नैतिक अधिकार के साथ कर सकती है। अरविन्दर सिंह लवली ने यहां तक कहा कि सी.एम. इन वेटिंग मदन लाल खुराना, विजय कुमार मल्होत्रा, कुछ समय के लिए विजय गोयल फिर  डा.  हर्षवर्धन  जिस प्रकार रह गये, उसी प्रकार नरेंद्र मोदी भी पी.एम. इन वेटिंग बने रहेंगे।
रामवीर सिंह विधुरी ने कांग्रेस के कार्यकाल में हुइ भ्रस्टाचार  व उच्च न्यायालय द्वारा दिये गये फैसले की कइ बातें विधानसभा में उठाकर कांग्रेस को कठघरे में खड़ा करने का काम किया। जदयू के अकेले विधायक शोएब इकबाल ने आम आदमी पार्टी सरकार का बिना शर्त  समर्थन देते हुए भाजपा द्वारा उठाये गये एक, एक सवाल पर बारी बारी से भाजपा पर प्रहार करने का जो सिलसिला शुरू किया उसका अंत विधानसभा की गरिमा पर आघात के साथ खत्म हुआ।
भाजपा द्वारा काश्मीर का मुद्दा, अरविन्द केजरीवाल द्वारा बच्चों की कसम की बात सदन में उठायी गइ दी, शोएब इकबाल ने कहा कि जब बार-बार राम की कसम खाते रहे, कि मंदिर वही बनाएंगे, उस कसम का क्या हुआ, इस पर भाजपा के विधायक शोएब इकबाल का विरोध् करने लगे, बात कामनवेल्थ गेम में हुइ भ्रष्टाचार पर पहुंची, फिर हंगामा, विरोध् और अंत में एक, दूसरे को देख लेने और सांढ़ तक बात पहुंच गइ और शोएब इकबाल ने कोट  तक उतार दिया। प्रोटेम स्पीकार को कहना पड़ा सारा देश देख रहा है, सदन कपड़े उतारने की जगह नहीं है, विवाद बढ़ता देख मार्शल को बुलाना पड़ा और शोएब इकबाल को बैठा दिया गया।
भाजपा की ओर से तीन व कांग्रेस की ओर से दो विधायक ने विश्वास मत पर अपने विचार रखें। कांग्रेस के जयकिशन ने कांग्रेस सरकार द्वारा किये गये विकास कार्यो  पर प्रकाश डालते हुए रामवीर सिंह विधुरी  से कहा कि 81ए पर अगर कांग्रेस सरकार ने गलत कार्य किया था तो हजारों व्यकित को लेकर अरविन्दर जी को धन्यवाद देने वे क्यों पहुंचे थे। जयकिशन ने दो मिनट के अन्दर कइ सवालों का जबाव इस प्रकार दिया कि मुख्यमंत्री  अरविन्द केजरीबाल भी उनकी बात गम्भीरतापूर्वक सुनते देखे गये। भाजपा की ओर से चौहान ने आम आदमी पार्टी पर कइ सवाल उठाया और कहा कि इनके विधायकों के पास इतनी-इतनी दौलत चल-अचल है फिर ये आम आदमी कहां से है, आम आदमी होता है। रेहड़ी वाला, आम आदमी मजदूर है, आम आदमी पार्टी सिर्फ जनता को गुमराह करने का काम करती रही है। इस पर आम आदमी पार्टी के विधायक यहां तक मंत्री राखी बिड़ला ने भी उनका विरोध् किया और सभी विधायक काफी उत्तेजित नजर आये, लेकिन उन्हें मनीष सिसौदिया ने शांत कर दिया। मुख्यमंत्री  अरविन्द केजरीवाल ने सदन में भी अपनी बात, अपने चिर पिरचित अंदाज में रखा। जिस प्रकार रामलीला मैदान में शपथ ग्रहण के बाद जनता को सम्बोधित करते हुए उन्होंने रखा था उसी प्रकार विधानसभा में भी रखा और स्पष्ट रूप से कहा कि भ्रष्टाचारी को किसी भी कीमत पर नहीं बख्शा जायेगा। 18 सूत्री  कार्यक्रम दिल्ली के विकास में लागू किया जायेगा, साथ ही उन्होंने कहा कि भाजपा आम आदमी, सिर्फ झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले को समझती है, जबकि उनकी नजर में वे तमाम लोग आम लोग है जो भ्रष्टाचार से प्रभावित रहे है और देश का विकास चाहते है, चाहे वह स्लम में रहते हो या ग्रेटर कैलाश में।
उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि वे आम आदमी पार्टी के लिए समर्थन नहीं मांग रहे उन्हें आम लोगों की समस्याओं के निदान के लिए, किये जाने वाले विकास कार्यों  के लिए समर्थन चाहिए। प्रोटेम स्पीकर मतीन अहमद ने कहा कि जिन्हें विश्वास मत का समर्थन करना है वे खड़े हो जाएं इस पर आम आदमी पार्टी के विधायक, कांग्रेस विधायक, जदयू विधायक खड़े हो गये जिनकी संख्या 37 थी, भाजपा और अकाली विधायक ने विश्वास मत का विरोध् किया और बैठे रहे। इस प्रकार विधानसभा के अन्दर सत्ता पक्ष, विपक्ष व जदयू विधायक के प्रत्येक कार्यशैली का सारा देश देखा।


लोकसभा में विरोधी दल की नेता सुषमा स्वराज ने दिल्ली में भाजपा की हार व आप के बढ़ते कदम के लिए दिल्ली प्रभारी पर परोक्ष रूप से प्रहार किया है। सुषमा स्वराज ने मंच से कहा कि उन्होंने आप द्वारा सेंघ लगाने की ओर ध्यान आकृष्ट किया लेकिन इस पर ध्यान ही नहीं दिया गया।
 नेता विरोधी दल के इस ब्यान के बाद भाजपा में महाभारत मची हुई है। सुषमा स्वराज जमीन से जुड़ी नेत्री रही है और उन्हें अवश्य इस बात का अंदाजा चुनाव परिणाम से पूर्व हो गया होगा कि अरविन्द केजरीवाल की पार्टी जनाधार बढ़ा रही है।  सुषमा स्वराज ही नहीं देश की राजनीति पर पैनी नजर रखने वाला ‘‘मदर इंडिया पत्रिका ने अपने 10 नवम्बर 2013 के सम्पादकीय में साफ-साफ लिख दिया था कि’’  ‘‘भाजपा सत्ता के काफी करीब पहुंच चुका था, कांग्रेसी के सांस, भ्रष्टाचार और महंगाई के मुद्दे पर फूल रहे थे लेकिन सी.एम. इन वेटिंग के चक्कर में भाजपा पुनः काफी पिछड़ चुका है। जिसका अंदाजा उसे मतगणना के बाद हो जाएगा कि आपसी लड़ाई में पार्टी, सत्ता से कैसे दूर खिसक जाती है’’ अगर आपको विश्वास न हो तो।www.motherindiamagazine.com पर जाकर सम्पादकीय के नीचे से तीन लाइन अभी भी पढ़ सकते हैं।
 दिल्ली में भाजपा 43 से अधिक  सीट प्राप्त करने की स्थिति में थी लेकिन टिकट बंटवारे में हुई बंदरवांट, देर से टिकट का वितरण, जमीनी कार्यकर्ताओं  की उपेक्षा व अपने ही प्रदेश अध्यक्ष पर ईमानदार चेहरा के नाम पर प्रश्न चिन्ह लगाना उसके लिए घातक साबित हुआ है।
 आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस को भ्रष्टाचार व मंहगाई के मुद्दे पर व भाजपा की आपसी लड़ाई, निगम में व्याप्त आकंठ भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर सत्ता की दौर से बाहर करने में कामयाब रहा।
 आम आदमी पार्टी को 28 सीट तो बहुत कम मिली है, जिस प्रकार दिल्ली के युवा एवं महिलाएं संगठित होकर मतदान किया उसकी सीट 47 के आस-पास जाकर रूकती लेकिन कुछ सीटों पर आम पार्टी के प्रत्याशी अपना दावा सही ढ़ंग से पेश नहीं कर पाया, कुछ सीट पर मतददाताओं को लगा कि कहीं कांग्रेस चुनाव न जीत जाय इसलिए भाजपा उम्मीदवार के पक्ष में अंतिम समय में बटन दबा दिया।
 आम आदमी पार्टी आज की तारीख में कांग्रेस व भाजपा दोनों के लिए चुनौती बन चुका है, दिल्ली ही नहीं देश की जनता दोनों पार्टी की गतिविधियों  पर पैनी नजर रख रही है। भाजपा-कांग्रेस ने उसे घेरने या गिराने का प्रयास किया तो वह काफी नुकसानदायक साबित होगा। आम आदमी पार्टी को, दोनों दलों को पूरा मौका देना होगा, राजनीतिक अनुभवहीनता के कारण वह उलझती जायेगी और आम लोग उससे हद से अध्कि उम्मीद लगा बैठे हैं, उनका मोहभंग होगा फिर  वह अपने कारणों से गिरेगी।

कांग्रेस व भाजपा दोनों को आत्ममंथन करना चाहिए कि आखिर क्यों तीसरा दल बजूद में आया। निगम में भाजपा 7 वर्षों से शासन में है, कांग्रेस पन्द्रह वर्षों से दिल्ली सरकार में थी फिर  आम लोग क्यों नहीं संतुष्ट है। युवा व महिलाएं क्यों भाजपा व कांग्रेस का नाम सुनते ही दहाड़ उठती है, आखिर कारण क्या है।
 कांग्रेस के शासन में दिल्ली विकास अवश्य किया, लेकिन कांग्रेसी विधायक , मंत्री, संगठन न तो युवा व महिलाओं को अपने विकास कार्यों से अवगत करा सका, न ही निगम में व्याप्त भ्रष्टाचार को मुद्दा बना सका। भाजपा और कांग्रेस दोनों के मुख्य कर्ताधर्ता आपस में खिचड़ी पकाते रहें , अपने  हेल्थ व वेल्थ को बढ़ाते रहे, आम जनता को मंहगाई व भ्रष्टाचार के हवाले कर दिया। भाजपा का पन्द्रह वर्षों की विपक्षी भूमिका भी आम लोगों के हीत में आवाज उठाने की जगह हेल्थ व वेल्थ बढ़ाने में रहा, निगम में व्याप्त भ्रष्टाचार खत्म करने के जितने दावे किये गये, भ्रष्टाचार उतना ही बढ़ता रहा। आंख बंद कर लेने से सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। 
 
इन्हीं शब्दों के साथ नववर्ष की बधाई ।   
  
ललित 'सुमन' 


कार्तिक पूर्णिमा में लगायें आस्था की डुबकी

कार्तिक का महीना बहुत पवित्र माना गया है। इस माह में की गई भक्ति-आराधना का पुण्य कई जन्मों तक बना रहता है। इस माह में किए गए दान, स्नान, यज्ञ, उपासना से श्रद्धालु को तुरंत ही शुभ फल प्राप्त होने लगते हैं। इस वर्ष कार्तिक पूर्णिमा 17 नवम्बर दिन रविवार को पड़ रही है|
शास्त्रों के अनुसार कार्तिक पूर्णिमा शाम भगवान श्रीहरि ने मत्स्यावतार के रूप में प्रकट हुए। भगवान विष्णु के इस अवतार की तिथि होने की वजह से आज किए गए दान, जप का पुण्य दस यज्ञों से प्राप्त होने वाले पुण्य के बराबर माना जाता है। पूर्णिमा पर पवित्र नदिनों में दीपदान करने की भी परंपरा हैं। देश की सभी प्रमुख नदियों में श्रद्धालुओं द्वारा दीपदान किया जाता है।
कार्तिक पूर्णिमा पर यदि कृतिका नक्षत्र आ रहा हो तो यह महाकार्तिकी होती है। भरणी नक्षत्र होने पर यह विशेष शुभ फल देती है। रोहिणी नक्षत्र हो तो इस दिन किए गए दान-पुण्य से सुख-समृद्धि और धन की प्राप्ति है।
कार्तिक पूर्णिमा की पूजन विधि-
इस दिन सुबह स्नान आदि से निवृत होकर पूरा दिन निराहार रहते हैं और भगवान विष्णु की आराधना करते हैं| श्रद्धालुगण इस दिन गंगा स्नान के लिए भी जाते हैं, जो गंगा स्नान के लिए नहीं जा पाते वह अपने नगर की ही नदी में स्नान करते हैं| भगवान का भजन करते हैं| संध्या समय में मंदिरों, चौराहों, गलियों, पीपल के वृक्षों तथा तुलसी के पौधे के पास दीपक जलाते हैं| लम्बे बाँस में लालटेन बाँधकर किसी ऊँचे स्थान में "आकाशी" प्रकाशित करते हैं| इस व्रत को करने में स्त्रियों की संख्या अधिक होती है|
इस दिन कार्तिक पूर्णिमा का व्रत करने वाले व्यक्ति को ब्राह्मण को भोजन अवश्य कराना चाहिए| भोजन से पूर्व हवन कराएं| संध्या समय में दीपक जलाना चाहिए| अपनी क्षमतानुसार ब्राह्मण को दान-दक्षिणा देनी चाहिए| कार्तिक पूर्णिमा के दिन रात्रि में चन्द्रमा के दर्शन करने पर शिवा, प्रीति, संभूति, अनुसूया, क्षमा तथा सन्तति इन छहों कृत्तिकाओं का पूजन करना चाहिए| पूजन तथा व्रत के उपरान्त बैल दान से व्यक्ति को शिवलोक प्राप्त होता है, जो लोग इस दिन गंगा तथा अन्य पवित्र स्थानों पर श्रद्धा - भक्ति से स्नान करते हैं, वह भाग्यशाली होते हैं|
कार्तिक पूर्णिमा की कथा-
प्राचीन समय की बात है, एक नगर में दो व्यक्ति रहते थे| एक नाम लपसी था और दूसरे का नाम तपसी था| तपसी भगवान की तपस्या में लीन रहता था, लेकिन लपसी सवा सेर की लस्सी बनाकर भगवान का भोग लगाता और लोटा हिलाकर जीम स्वयं जीम लेता था| एक दिन दोनों स्वयं को एक-दूसरे से बडा़ मानने के लिए लड़ने लगे| लपसी बोला कि मैं बडा़ हूं और तपसी बोला कि मैं बडा़ हूँ, तभी वहाँ नारद जी आए और पूछने लगे कि तुम दोनों क्यूं लड़ रहे हो? तब लपसी कहता है कि मैं बडा़ हूं और तपसी कहता है कि मैं बडा़ हूँ| दोनों की बात सुनकर नारद जी ने कहा कि मैं तुम्हारा फैसला कर दूंगा|
अगले दिन तपसी नहाकर जब वापिस आ रहा था, तब नारद जी ने उसके सामने सवा करोड़ की अंगूठी फेंक दी| तपसी ने वह अंगूठी अपने नीचे दबा ली और तपस्या करने बैठ गया| लपसी सुबह उठा, फिर नहाया और सवा सेर लस्सी बनाकर भगवान का भोग लगाकर जीमने लगा| तभी नारद जी आते हैं और दोनों को बिठाते हैं| तब दोनों पूछते है कि कौन बडा़ है? तपसी बोला कि मैं बडा़ हूँ| नारद जी बोले - तुम गोडा़ उठाओ और जब गोडा़ उठाया तो सवा करोड़ की अंगूठी निकलती है| नारद जी कहते हैं कि यह अंगूठी तुमने चुराई है| इसलिए तेरी तपस्या भंग हो गई है और लपसी बडा़ है|

सभी बातें सुनने के बाद तपसी नारद जी से बोला कि मेरी तपस्या का फल कैसे मिलेगा? तब नारद जी उसे कहते हैं - तुम्हारी तपस्या का फल कार्तिक माह में पवित्र स्नान करने वाले देगें उसके आगे नरद जी कहते हैं कि सारी कहानी कहने के बाद जो तेरी कहानी नहीं सुनाएगा या सुनेगा, उसका कार्तिक का फल खत्म हो जाएगा| 


"भाजपा का चेहरा एक व नेक होना चाहिए!" 

भाजपा व विश्व हिन्दू परिषद ने अयोध्या में राम का मंदिर बनाने का मुद्दा छोड़ दिया लेकिन बिहार के मुख्यमंत्री ने बिहार में श्री राम की भव्य मंदिर कि बात कह कर भाजपा व विश्व हिन्दू परिषद को कठघरे में खड़ा करने का कार्य किया है कि-  भाजपा सिर्फ वोट बटोरने के लिए हिन्दू कि बात करती थी, मोदी को पहले टोपी से परहेज था, लेकिन अब वे अपने को धर्म निरपेक्ष बनाना चाहते हैं. 

 देर से सही अगर भाजपा सभी को साथ लेकर चले, अपनी  कथनी और करनी एक जैसा रखें तो वह एक बेहतर विपक्ष कि भूमिका अदा कर सकता है और सत्ता भी मिल सकती है लेकिन चल-चरित्र व चेहरा एक व नेक होना चाहिए। 


युवाओं राष्ट्र  को बचालो 

देश के किसी भी कोने में नफ़रत कि चिंगारी सुलगे, यह लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं  है । जिस प्रकार आज फिर एक बार  सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए देश कि आवाम को गुमराह करने का प्रायोजित खेल खेला जा रहा है, उसका अंजाम  सभी को भुगतना होगा|
    हमें साहिर लुधियानवी कि वह पंक्ति याद  आ रही है,…
   
हर बस्ती में आग लगेगी, हर बस्ती जल जायेगी, सन्नाटे के पीछे से तब, एक सदा ये आयेगी-
कोई नही है, कोई नही है!
कोई नही है, कोई नही है!!

युवाओं, एक धृतराष्ट्र ने कौरव सेना का सर्वनाश करवा दिया था, आज अनेको धृतराष्ट्र इस देश में अपने स्वार्थ सिद्धि में लगे हैं| आप जागो और देश को बचा लो...


लौहपुरूष सरदार वल्लभभाई पटेल की जयन्ती पर विशेष.....

आज हम जिस विशाल भारत को देखते हैं उसकी कल्पना लौह पुरुष कहलाने वाले सरदार वल्लभ भाई पटेल के बिना शायद पूरी नहीं हो पाती| वल्लभ भाई पटेल एक ऐसे इंसान थे जिन्होंने देश के छोटे-छोटे रजवाड़ों और राजघरानों को एककर भारत में सम्मिलित किया| भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की जब भी बात होती है तो सरदार पटेल का नाम सबसे पहले ध्यान में आता है| उनकी दृढ़ इच्छा शक्ति, नेतृत्व कौशल का ही कमाल था कि 600 देशी रियासतों का भारतीय संघ में विलय कर सके| भारत के प्रथम गृह मंत्री और प्रथम उप प्रधानमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नाडियाड में उनके ननिहाल में हुआ| वह खेड़ा जिले के कारमसद में रहने वाले झावेर भाई पटेल की चौथी संतान थे| वल्लभ भिया पटेल की माता का नाम लाडबा पटेल था| बचपन से ही उनके परिवार ने उनकी शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया| प्रारंभिक शिक्षा काल में ही उन्होंने एक ऐसे अध्यापक के विरुद्ध आंदोलन खड़ाकर उन्हें सही मार्ग दिखाया जो अपने ही व्यापारिक संस्थान से पुस्तकें क्रय करने के लिए छात्रों के बाध्य करते थे। हालाँकि 16 साल में उनका विवाह कर दिया गया था पर उन्होंने अपने विवाह को अपनी पढ़ाई के रास्ते में नहीं आने दिया| 22 साल की उम्र में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की और ज़िला अधिवक्ता की परीक्षा पास की, जिससे उन्हें वकालत करने की अनुमति मिली| अपनी वकालत के दौरान उन्होंने कई बार ऐसे केस लड़े जिसे दूसरे निरस और हारा हुए मानते थे| उनकी प्रभावशाली वकालत का ही कमाल था कि उनकी प्रसिद्धी दिनों-दिन बढ़ती चली गई| गम्भीर और शालीन पटेल अपने उच्चस्तरीय तौर-तरीक़ों और चुस्त अंग्रेज़ी पहनावे के लिए भी जाने जाते थे| लेकिन गांधीजी के प्रभाव में आने के बाद जैसे उनकी राह ही बदल गई|
भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने जब पूरी शक्ति से अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन चलाने का निश्चय किया तो सरदार पटेल ने अहमदाबाद में एक लाख जन-समूह के सामने लोकल बोर्ड के मैदान में इस आंदोलन की रूपरेखा समझाई। लौह पुरुष कहे जाने वाले सरदार बल्लभ भाई पटेल ने पत्रकार परिषद में कहा, ऐसा समय फिर नही आएगा, आप मन में भय न रखें। चौपाटी पर दिए गए भाषण में कहा, आपको यही समझकर यह लड़ाई छेड़नी है कि महात्मा गांधी और अन्य नेताओं को गिरफ्तार कर लिया जाएगा तो आप न भूलें कि आपके हाथ में शक्ति है कि 24 घंटे में ब्रिटिश सरकार का शासन खत्म हो जाएगा।
सितंबर, 1946 में जब पंडित जवाहर लाल नेहरु की अस्थाई राष्ट्रीय सराकर बनी तो सरदार पटेल को गृहमंत्री नियुक्त किया गया। अत्यधिक दूरदर्शी होने के कारण भारत मे विभाजन के पक्ष में पटेल का स्पष्ट मत था कि जहरवाद फैलने से पूर्व गले-से अंग को ऑपरेशन कर कटवा देना चाहिए। नवंबर,1947 में संविधान परिषद की बैठक में उन्होंने अपने इस कथन को स्पष्ट किया, मैंने विभाजन को अंतिम उपाय मे रूप में तब स्वीकार किया था जब संपूर्ण भारत के हमारे हाथ से निकल जाने की संभावना हो गई थी। मैंने यह भी शर्त रखी कि देशी राज्यों के संबंध में ब्रिटेन हस्तक्षेप नहीं करेगा। इस समस्या को हम सुलझाएंगे। और निश्चय ही देशी राज्यों के एकीकरण की समस्या को पटेल ने बिना खून-खराबे के बड़ी खूबी से हल किया, देशी राज्यों में राजकोट, जूनागढ़, वहालपुर, बड़ौदा, कश्मीर, हैदराबाद को भारतीय महासंघ में सम्मिलित करना में सरदार को कई पेचीदगियों का सामना करना पड़ा।
भारतीय नागरिक सेवाओं (आई.सी.एस.) का भारतीयकरण कर इसे भारतीय प्रशासनिक सेवाएं (आई.ए.एस.) में परिवर्तित करना सरदार पटेल के प्रयासो का ही परिणाम है। यदि सरदार पटेल को कुछ समय और मिलता तो संभवत: नौकरशाही का पूर्ण कायाकल्प हो जाता। उनके मन में किसानो एवं मजदूरों के लिये असीम श्रद्धा थी। वल्लभभाई पटेल ने किसानों एवं मजदूरों की कठिनाइयों पर अन्तर्वेदना प्रकट करते हुए कहा:-
 दुनिया का आधार किसान और मजदूर पर हैं। फिर भी सबसे ज्यादा जुल्म कोई सहता है, तो यह दोनों ही सहते हैं। क्योंकि ये दोनों बेजुबान होकर अत्याचार सहन करते हैं। मैं किसान हूँ, किसानों के दिल में घुस सकता हूँ, इसलिए उन्हें समझता हूँ कि उनके दुख का कारण यही है कि वे हताश हो गये हैं। और यह मानने लगे हैं कि इतनी बड़ी हुकूमत के विरुद्ध क्या हो सकता है ? सरकार के नाम पर एक चपरासी आकर उन्हें धमका जाता है, गालियाँ दे जाता है और बेगार करा लेता है। 
किसानों की दयनीय स्थिति से वे कितने दुखी थे इसका वर्णन करते हुए पटेल ने कहा: -
किसान डरकर दुख उठाए और जालिम की लातें खाये, इससे मुझे शर्म आती है और मैं सोचता हूँ कि किसानों को गरीब और कमजोर न रहने देकर सीधे खड़े करूँ और ऊँचा सिर करके चलने वाला बना दूँ। इतना करके मरूँगा तो अपना जीवन सफल समझूँगा,
कहते हैं कि यदि सरदार बल्लभ भाई पटेल ने जिद्द नहीं की होती तो रणछोड़ राजेंद्र प्रसाद राष्ट्रपति पद के लिए तैयार ही नहीं होते। जब सरदार वल्‍लभभाई पटेल अहमदाबाद म्‍युनिसिपेलिटी के अध्‍यक्ष थे तब उन्‍होंने बाल गंगाघर तिलक का बुत अहमदाबाद के विक्‍टोरिया गार्डन में विक्‍टोरिया के स्‍तूप के समान्‍तर लगवाया था। जिस पर गाँधी जी ने कहा था कि- सरदार पटेल के आने के साथ ही अहमदाबाद म्‍युनिसिपेलिटी में एक नयी ताकत आयी है। मैं सरदार पटेल को तिलक का बुत स्‍थापित करने की हिम्‍मत बताने के लिये उन्हे अभिनन्‍दन देता हूं।
सरदार पटेल को कई बार जाना पड़ा जेल-
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 1929 के लाहौर अधिवेशन में पटेल, गांधी के बाद अध्यक्ष पद के दूसरे उम्मीदवार थे। गांधी ने स्वाधीनता के प्रस्ताव को स्वीकृत होने से रोकने के प्रयास में अध्यक्ष पद की दावेदारी छोड़ दी और पटेल पर भी नाम वापस लेने के लिए दबाव डाला। इसका प्रमुख कारण मुसलमानों के प्रति पटेल की हठधर्मिता थी। अंतत: जवाहरलाल नेहरू अध्यक्ष बने। 1930 में नमक सत्याग्रह के दौरान पटेल को तीन महीने की जेल हुई। मार्च 1931 में पटेल ने इंडियन नेशनल कांग्रेस के करांची अधिवेशन की अध्यक्षता की। जनवरी 1932 में उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया। जुलाई 1934 में वह रिहा हुए और 1937 के चुनावों में उन्होंने कांग्रेज़ पार्टी के संगठन को व्यवस्थित किया। 1937-38 में वह कांग्रेस के अध्यक्ष पद के प्रमुख दावेदार थे। एक बार फिर गांधी के दबाव में पटेल को अपना नाम वापस लेना पड़ा और जवाहर लाल नेहरू निर्वाचित हुए। अक्टूबर 1940 में कांग्रेस के अन्य नेताओं के साथ पटेल भी गिरफ़्तार हुए और अगस्त 1941 में रिहा हुए। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, जब जापानी हमले की आशंका हुई, तो पटेल ने गांधी की अहिंसा की नीति को अव्यावहारिक बताकर ख़ारिज कर दिया। सत्ता के हस्तान्तरण के मुद्दे पर भी पटेल का गांधी से इस बात पर मतभेद था कि उपमहाद्वीप का हिन्दू भारत तथा मुस्लिम पाकिस्तान के रूप में विभाजन अपरिहार्य है। पटेल ने ज़ोर दिया कि पाकिस्तान दे देना भारत के हित में है।

माना जाता है पटेल कश्मीर को भी बिना शर्त भारत से जोड़ना चाहते थे पर जवाहर लाला नेहरु ने हस्तक्षेप कर कश्मीर को विशेष दर्जा दे दिया| नेहरू ने कश्मीर के मुद्दे को यह कहकर अपने पास रख लिया कि यह समस्या एक अंतरराष्ट्रीय समस्या है| यदि कश्मीर का निर्णय नेहरू की बजाय पटेल के हाथ में होता तो कश्मीर आज भारत के लिए समस्या नहीं बल्कि गौरव का विषय होता| 15 दिसंबर 1950 को प्रातःकाल 9.37 पर इस महापुरुष का 76 वर्ष की आयु में निधन हो गया|



रसूखदारों को राहत देने वाला अध्यादेश 

अध्यादेश की शक्ति प्रजातंत्र की मूल भावना से मेल नहीं रखती। संविधान सभा में  इस पर बहस हुई थी। कई सदस्यों ने इसे कार्यपालिका की निरंकुशता का प्रतीक मानकर विरोध किया था। लेकिन संविधान सभा ने व्यापक विचार विमर्श के बाद अध्यादेश का प्रावधान किया। जिस समय संसद का अधिवेशन न चल रहा हो, शीघ्रता से कोई विधेयक पारित कराना सम्भव न हो तथा राष्ट्र और जनहित के लिये किसी कानून की तत्काल आवश्यकता हो, तब कार्यपालिका अध्यादेश जारी कर सकती है। अध्यादेश कानून की भांति होता है। अध्यादेश जारी करने की शक्ति कार्यपालिका को दी गयी।
लेकिन संविधान निर्माताओं ने अध्यादेश प्रावधान के ऐसे दुरुपयोग की कल्पना नहीं की होगी। केन्द्र सरकार ने सजा प्राप्त राजनेताओं को राहत देने के लिये अध्यादेश जारी किया। सरकार के इस कार्य में  संवैधानिक पवित्रता को बनाये रखने की भावना नही  थी। इसमें राष्ट्र या जनहित का कोई मसला समाहित नहीं था। फौरी तौर पर दो मामले सामने थे। बताया जाता है कि सरकार तत्काल रूप में कांग्रेस के रशीद मसूद और राजद प्रमुख लालू यादव को राहत देना चाहती थी।
यह आम धारणा बन गयी है कि देश में रसूखदार लोग कानून से बच निकलते हैं। एक तो दशकों तक उन पर लगे आरोपो पर निर्णय नहीं होता। इसमें केवल न्यायिक प्रक्रिया की कमी नहीं है। जांच एजेंसियां आवश्यक प्रमाण जुटाने में लापरवाही दिखाती हैं। उन पर सरकार का दबाव होता है। यह बात अब किसी से छिपी नहीं है। वस्तुतः अध्यादेश के माध्यम से सरकार ने अपनी इसी नीति और नीयत को आगे बढ़ाया है। रशीद मसूद और लालू यादव पर लगे आरोप करीब दो दशक पुराने है। अनियमितता व बड़े घोटाले हुए। इस पूरी अवधि में ये लोग सत्ता या सदन के गलियारे मंे रहे। अब सदन में  इस प्रकार के लोगों की बड़ी संख्या में है। ए. राजा, कलमाड़ी, मधुकोड़ा आदि ऐसे मामलों के बड़े नाम हैं। न्यायिक निर्देया के बाद ही इन पर शिकंजा कसा था। अब सब पहले की तरह होता जा रहा है। ये सभी राजनीतिकी नई पारी के लिये तैयार हैं। न्यायपालिका ने दो वर्ष के सजायाफ्ताओं पर एक निर्णय दिया। सरकार उनके बचाव में आ गयी। वह इस अध्यादेश से क्या संदेश देना चाहती है। यही कि रसूखदार लोगों को कानून शिकंजे से बचाने के प्रत्येक संभव प्रयास किये जायेंगे। बेशक राजनीतिक मुकदमों को अलग रखना चाहिए। कई बार प्रदर्शन, आन्दोलन, धारा-144 के उल्लंघन आदि के मुकदमें लगते हैं। लेकिन घोटालों तथा अन्य गम्भीर अपराधों को इस श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। 
ऐसे में यह सरकार का दायित्व था कि अपराधी तत्वों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का मार्ग प्रशस्त करे। सरकार ने अपनी इस जिम्मेदारी का निर्वाह नहीं किया। इसीलिए उच्चतम न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ा। उसने संसद और विधायिका से ऐसे सदस्यों की सदस्यता समाप्त करने का आदेश पारित किया था, जिसे दो वर्ष या अधिक की सजा मिली हो। केन्द्रीय मंत्रिमण्डल ने इस न्यायिक निर्णय को निष्प्रभावी बनाने के लिये अध्यादेश का सहारा लिया। सरकार को अध्यादेश जारी करने का अधिकार है। लेकिन इस मामले में प्रश्न सरकार की नीयत और नैतिकता को लेकर उठा है। 
आपराधिक या भ्रष्टाचार के सजायाफ्ताओं को बचाने में संप्रग सरकार को इतनी जल्दबाजी क्या थी। उसने पहले सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायरा की थी। जो स्वीकार नहीं की गयी। संसद के मानसून सत्र में सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को निष्प्रभावी बनाने के लिये संशोधन प्रस्ताव रखा था। इसमें जेल में बन्द व्यक्ति के चुनाव लड़ने पर लगी रोक हटाने पर सभी दलों में आम सहमति थी। अतः यह प्रस्ताव पारित हो गया। लेकिन दो वर्ष के सजायाफ्ता की सदस्यता रद्द होने वाले निर्णय को निष्प्रभवी बनाने के लिये संशोधन प्रस्ताव रखा था। इसमें जेल में बन्द व्यक्ति के लिये संशोधान प्रस्ताव रखा था। इसमें जेल में बन्द व्यक्ति के चुनाव लड़ने पर लगी रोक हटाने पर सभी दलों में  आम सहमति थी। अतः यह प्रस्ताव पारित हो गया। लेकिन दो वर्ष के सजायाफ्ता की सदस्यता रद्द होने वाले निर्णय को निष्प्रभावी बनाने पर आम सहमति नहीं बन सकी थी। सरकार का संशोधन प्रस्ताव राज्यसभा से पारित नहीं हो सका। सदन में सहमति न बनने के कारण इसे स्थायी समिति के पास भेजा गया। ऐसे में सरकार को स्थायी समिति की रिपोर्ट तथा संसदीय निर्णय का इंतजार करना चाहिए था। सरकार को उन बिन्दुओं पर विचार करना चाहिए था, जिन पर आम सहमति नहीं बन रही थी। सरकार की दलील थी कि निचली अदालत किसी सांसद या विधायक को दो वर्ष जेल की सजा दे, तो वह अपनी सदस्यता से वंचित हो जायेगा। लेकिन ऊंची अदालत उसे निर्दोष मानकर सजा से मुक्त कर दे, तब क्या होगा। तब उसकी सदन की समाप्त हुई सदस्यता बहाल नहीं होगी। संविधान में इसकी कोई व्यवस्था नहीं है। यह भी सम्भव है ऊंची अदालत से उसे निर्दोश करार देने से पहले उपचुनाव के माध्यम से रिक्त सीट भर ली जाए।

जाहिर है कि इस मसले पर दो गम्भीर बातों पर विचार होना चाहिए था। एक यह कि किस निर्दोष को परेशान न होना पड़े। दूसरा यह कि उच्च पदों पर आसीन व्यक्ति कानून से बचते न रहे। पहले वाली बात प्रायः दुर्लभ होती है। कुछ ऐसे भी उदाहरण हैं कि आरोप लगने और जांच शुरू होने से पहले ही कई राजनेताओं ने अपने पदों से त्यागपत्र दे दिया था। उन्होंने निर्दोष साबित होने तक कोई पद ग्रहण न करन का संकल्प लिया था। जनसेवा या राजनीति ऐसे ही उच्च आदर्शों की मांग करती है। राजनेताओं को ऐसे त्याग के लिये तैयार रहना चाहिए। वह नौकरी पर निर्भर रहने वाले सरकारी मुलाजिम नहीं होता। आपराधिक मामले में किसी भी अदालत से दो वर्ष की सजा मिलना सामान्य बात नहीं होती। संसद और विधानसभा ऐसे लोगों से मुक्त होकर अपनी गरिमा बढ़ा सकती है। वह भविष्य में निर्दोष साबित हुए तो उनकी छवि में अधिक निखार दिखाई देगा। यदि ऊंची अदालत ने सजा को सही माना, तो समाज में संदेश जायेगा। यह संदेश विधि के शासन को प्रतिष्ठित करेगा। कानून से ऊपर कोई नहीं। रसूखदारों को मिलने वाली सजा का प्रशासन के निचले स्तर तक अच्छा संदेश जायेगा। उन्हें बचाने या संरक्षण देने का प्रयास अनैतिकता को बढ़ावा देगा।


देश की वर्तमान दशा और बुद्धिजीवी
उदारीकरण और भूमण्डलीकरण के इस दौर ने मनुष्य को बाजार की वस्तु बना दिया है। उसका इसी आधार पर आकलन होने लगा है। विदेशी पूंजी अपने साथ अपनी सभ्यता लेकर आती है। इसका हमला प्रत्यक्ष रूप से दिखार्इ नहीं देता। लेकिन दिल-दिमाग के भीतर तक पैठ बना लेता है। राजनीतिक गुलामी प्रत्यक्ष होती है। अंग्रेजों ने भारत पर शासन किया था। अपने शासन को स्थायित्व देने के लिये उन्होंने राजनीतिक व प्रशासनिक मोर्चे को अपर्याप्त माना था। इसके समक्ष आने वाली चुनौतियों को उन्होंने समय से पहले समझ लिया था। वह जानते थे कि ब्रिटिस शासकों के खिलाफ भारत के लोग आन्दोलन कर सकते हैं। शासक जब सामने होते हैं, उनसे लड़ा जा सकता है। उनकी सत्ता को चुनौती दी जा सकती है। बि्रटिश शासकों के सामने ऐसी परिसिथतियां सामने आयी थीं। इसलिए उन्होंने अपने को प्रशासनिक-राजनीतिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रखा था। सभ्यता और संस्कृति के क्षेत्र को भी योजनाबद्ध ढंग से प्रभावित करने की रणनीति पर अमल किया। वह भारतीयों के ऐसे वर्ग का निर्माण चाहते थे, जो मानसिक रूप से पाश्चात्य सभ्यता-संस्कृति के वशीभूत हो। उसका रंग भले ही काला हो, लेकिन जीवन-शैली अंग्रेजों जैसी हो। अंग्रेजों की दिखने की उसमें इच्छा हो। अंग्रेजी भाषा पर उसे गर्व हो। भारतीय सभ्यता-संस्कृति में उसका लगाव न हो। मैकाले की सोच चल निकली। अंग्रेज भारतीयों का ऐसा वर्ग बनाने में सफल रहे। लेकिन उस समय भी भारतीय चिन्तन से प्रभावित बुद्धिजीवियों की समानान्तर धारा प्रवाहित हो रही थी। वह जानते थे कि भारतीय समाज में कतिपय कमियां हो सकती हैं। जातीय भेदभाव हो सकते हैं। 
लेकिन इसका समाधान अंग्रेज नहीं कर सकते। वह अपना स्वार्थ पूरा करने के लिये भारत में थे। भारत का हित करना उनका उद्देश्य नहीं था। उन पर विश्वास नहीं किया जा सकता। ऐसे ही बुद्धिजीवियों ने स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार का नारा बुलन्द किया। महर्षि अरविन्द जैसे लोगों ने बेडि़यों में जकड़ी भारत माता के रूप से लोगों को परिचित कराया। यहां के सभी लोग भारत माता की सन्तान हैं। इस आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए। यह चिन्तन भी कोर्इ नयी नहीं था। यह प्राचीन भारतीय विरासत थी। समस्याएं बाद में उत्पन्न हुर्इं। लेकिन अंग्रजों के लिये यह अच्छी बात थी। फूट डालो राज करो की नीति पर उनका चलना आसान था। बि्रटिश सत्ता से सुधार की उम्मीद करने वाले भ्रम में थे। बुद्धिजीवियों ने मार्ग दिखाया। स्वतंत्रता का कोर्इ विकल्प नहीं हो सकता। स्वशासन के बल पर ही हम अपनी कमजोरियों को दूर कर सकते हैं। इसके पहले भी भारत में बुद्धिजीवियों ने समय-समय पर 
सुधारवादी आन्दोलन चलाए। इसी का परिणाम था कि भारत अपवाद को छोड़कर कभी सांस्कृतिक रूप से परतंत्र नहीं हुआ।
कुछ बात है कि हस्ती
मिटती नहीं अपनी।
बात यही थी। गुलामी के लम्बे दौर में भी सांस्कृतिक चेतना के दीपकों को रौशन रखा गया।
हवा भी चलती रही
और दीप भी चलते रहे।
यह बुद्धिजीवियों की भूमिका थी, जिसने सदियों की गुलामी के बाद भी भारतीय सभ्यता-संस्कृति को दम तोड़ने नहीं दिया। जबकि विश्व की अन्य प्राचीन सभ्यताएं समय के थपेड़ों में विलुप्त हो गयीं।
लेकिन सम्राज्यवादी शकितयां आज भी सक्रिय हैं। प्रभावी हैं। केवल इनका स्वरूप बदला है। अब सांस्कृति आक्रमण हो रहा है। इसमें आक्रमणकारी प्रत्यक्ष नहीं है। यह हमारी जीवनशैली बदल रहा है। जो काम अंग्रेजों के प्रत्यक्ष शासन में बहुत धीमी गति से हो रहा था। वह अब बहुत तीव्र गति में चल रहा है। उपभोक्तावाद हमारे मन-मसितष्क पर हावी हो रहा है। बाजार दशा-दिशा तय कर रहा है। त्यौहारों का स्वरूप बदल रहा है। उसका आध्यातिमक महत्व कम हो रहा हैं बाजार उन्हें अपने मुनाफे के लिये बदल रहा है। अक्षय-तृतीया में किसका और किस प्रकार पूजन होना चाहिए, इसका मतलब नहीं रहा। बाजार बता रहे हैं- इस दिन सोना खरीदना जरूरी है। गरीब क्या करे। ठगा सा देख रहा है। दीपावली अपने नाम की सार्थकता खो रहा है। बाजार तरह-तरह की झालरों से आकर्षित कर रहा है। चीन भी इसमें पीछे नहीं। पटाखों का जखीरा सामाजिक शान का प्रतीक बन गया। गरीब अपनी झोपड़ी के सामने बैठकर आकाश की तरफ देखता है। कहीं कोर्इ चिंगारी उसके आशियाने को खाक न कर दे। इस भेदभाव पर कौन ध्यान देगा। गणेश-लक्ष्मी के पूजन में भी बाजार का हस्तक्षेप है। लगता है जीवन का उíेश्य केवल उपभोक्तावाद है। व्यकित की पहचान का यही आधार है। डिजाइनर कपड़े-सूट हमारी पहचान बनाते हैं। चार पहिया वाहन होना पर्याप्त नहीं। जितनी महंगी कार से चलो, उतने ही महत्वपूर्ण हो जाओगे।
जाहिर है कि उदारीकरण के इस दौर ने सामाजिक भेदभाव को अधिक गहरा किया है। अब यह बुद्धिजीवियों का दायित्व है कि वह सुधार का बीड़ा उठायें। नव सम्राज्यवाद का हमला घर-परिवार तक है। माता-पिता के लिये वर्ष में केवल एक दिन। वह भी केक, जाम और डांस के नाम रहता है। बुद्धिजीवी ही बता सकता है मातृ-पितृ ऋण का महत्व। इससे उऋण होने के लिये एक जीवन कम है। बुद्धिजीवियों को सक्रिय राजनीति में अपनी भूमिका तलाशनी होगी। उसका स्वरूप कुछ भी हो सकता है। अन्यथा राजनीति में अपराधी, माफिया, धन-बाहुबलियां का इसी प्रकार वर्चस्व बढ़ता रहेगा। नि:संदेह आज बुद्धिजीवियों की भूमिका पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गयी है।


चमत्कारों की दुनिया में नयी सेंध

भले आपको यह सब कपोल-कल्पना लगे, लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है-
> कि भविष्य में बिना चीर-फाड़ किए डॉक्टर छोटी और बड़ी आंत का आप्रेशन     कर सकेंगे।
>कि गगनचुंबी इमारतें पूरी तरह से मशीनें बनाएंगी।
>कि उम्र का बढऩा रुक जाएगा।
>कि विषैले कचरे को साफ कर नदियों व समुद्र को प्रदूषण रहित किया जाएगा।
जी हां, चमत्कारिक से लगने वाले ये तमाम काम वैज्ञानिकों के मुताबिक, उस तकनीक की बदौलत होंगे जिसे नैनोटेक कहते हैं। नैनो तकनीक का मूल यह है कि मशीन खुद अपनी प्रतिकृति निर्मित करेगी। ऐसा होना शुरू भी हो चुका है। प्रयोगों के स्तर पर ऐसी मशीन निर्मत हो चुकी है… इससे इस कल्पना को और भी बल मिला है। वास्तव में नैनो टेक्नोलॉजी पिछली सदी के आठवें दशक से ही दुनिया के लिए वह सपनीली दुनिया बन चुकी थी जिस पर भविष्य के विकास का दारोमदार देखा जाने लगा था।
1999 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने एक राष्ट्रीय नैनो टेक्नोलॉजी कार्यक्रम की घोषणा की थी। लेकिन नैनो टेक्नोलॉजी का एक लंबा वैज्ञानिक इतिहास है। 1959 में रिचर्ड फेन मैड जिन्हें आइंस्टीन के बाद अब तक का सबसे योग्य सैद्धांतिक भौतिकशास्त्री माना जाता है, ने एक बातचीत में  इसका विषय था सतह पर काफी जगह है, में यह सुझाया गया था कि एक दिन ऐसी मशीनों को बना पाना संभव होगा जिसमें कि सिर्फ कुछ हजार अणु होंगे। नैनो टेक्नोलॉजी शब्द की उत्पत्ति नैनोमीटर से हुई है। नैनोमीटर का एक अरबवां हिस्सा होता है। जबकि एक आम वायरस का आकार भी लगभग 100 नैनोमीटर  ही होता है। इससे नैनोमीटर की लघुता का अंदाजा लगाया जा सकता है।
सवाल है, ऐसी मशीन किस काम आयेगी? लघु स्तर पर होने वाली निर्माण योजनाएं जिसमें एक मॉलीक्यूल और यहां तक कि एक अणु का ईंट के रूप में इस्तेमाल होगा। इसका मतलब यह हुआ कि आप शून्य से भी कुछ बना सकते हैं। क्योंकि रसायनशास्त्र व जीव विज्ञान में मॉलीक्यूल्स से छेड़छाड़ तथा उनका स्थान परिवर्तन होता है। निर्माण की प्रक्रिया तो वास्तव में सिर्फ मॉलीक्यूल्स के बड़े-बड़े समूहों को लेकर उन्हें उपयोगी वस्तु का रूप भर देना है।
अगर हम देखना चाहें तो प्रत्येक कोशिका नैनो टेक्नोलॉजी  का जीता-जागता उदाहरण है। इसी तरह नैनो टेक्नोलॉजी न सिर्फ ईंधन को शक्ति में परिवर्तित करती है बल्कि वह अपने डीएनए में इनकोड किए गये साफ्टवेयर के अनुसार बनाती व बाहर निकालती है। प्रोटीन व एंजाइमों को विभिन्न जीवों से मिले डीएनए को पुनर्संयोजित कर आनुवंशिक इंजीनियरों से पहले ही नई नैनो डिवाइसेस को बनाना सीख लिया है। मसलन बैक्टीरिया कोशिकाएं, जो चिकित्सकीय रूप से उपयोगी मानवीय हार्मोनों को बाहर निकालती हैं।
बॉयो टेक्नोलॉजी की सीमा वहीं आ जाती है जहां कोशिकाओं को पहले से ही ये पता होता है कि उन्हें क्या करना है? जबकि नैनोटेक के इरादे कुछ और ही हैं। एक ऐसी नैनो मशीन की कल्पना कीजिए जो कच्चे कॉर्बन को लेकर उसे सुस्थापित कर अणु दर अणु एक पूर्ण हीरे में बदल देती है। एक ऐसी मशीन की कल्पना कीजिए जो डायोक्सिन मॉलीक्यूल्स को एक-एक करके अलग-अलग भागों में बांट देती है या फिर एक ऐसा उपकरण जो मानव की रक्तधारा में प्रवेश कर कोलेस्ट्रॉल द्वारा जाम की गयी नसों में जाम हुई जगहों का पता लगाकर उन्हें साफ कर सके या फिर एक ऐसी मशीन जो घास के टुकड़े लेकर उन्हें फिर से ब्रेड में बदल सके। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो दुनिया का हर भौतिक पदार्थ कंप्यूटर से लेकर पनीर तक मॉलीक्यूल्स यानी अणुओं से बना है और सिद्धांत रूप में नैनो मशीन इन सबको बना सकती है।
हालांकि सिद्धांत से प्रयोग की ओर बढऩा काफी कठिन काम है।  पर नैनो तकनीक के विशेषज्ञों ने यह पहले ही दर्शा दिया है कि उकपरणों और स्कैनिंग, टनलिंग, इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप का प्रयोग व्यक्तिगत एकल अणुओं  को एक जगह से ऐसी जगह लगाने में किया जा सकता है जैसे कि प्राकृतिक रूप से उनके लिए संभव नहीं था। आईबीएम का लोगों, उपकरण के लिए या फिर दुनिया का एक नक्शा अपने आकार का 1/10 अरबवां हो या फिर एक कार्यरत छोटा सूक्ष्मदर्शी गिटार जिसके सारे तारों का आकार कुल सिर्फ 50 नैनोमीटर  हो। उन्होंने कुछ मॉलीक्यूल्स से बने बेहद छोटे गियर और मोटर की डिजाइन तैयार की है, पर अभी उन्हें बनाया नहीं है। (इनकी तुलना उन छोटे गियरों और मोटरों से नहीं की जानी चाहिए जोकि दसियों लाख मॉलीक्यूल्स से बनी होती है और उन्हें पारंपरिक चिप इचिंग तकनीक से बनाया गया होता है। अगर भविष्य के गियर और मोटर के साथ उनकी तुलना की जाए तो वे आकार में बहुत बड़े साबित होंगे।)
आने वाले अगले 25 सालों में नैनो तकनीकविदों को विश्वास है कि वे सिर्फ वैज्ञानिक दावे करने के बजाय कुछ ठोस कर दिखाएंगे और असली काम करने वाली नैनो मशीन का अस्तित्व होगा। जिसका प्राथमिक स्वरूप सामने आ चुका है।  जोकि मॉलीक्यूल्स को इधर-उधर कर सकेगी और उनके अंदर ऐसा सूक्ष्म इलेक्ट्रॉनिक मस्तिक होगा जो उसे या उन्हें इस बात के लिए दिशा निर्देशित करेगा कि उन्हें क्या करना है, क्या नहीं और कच्चे माल की खोज कर सके। ये मशीनें कार्बन नैनो ट्यूब्स की बनी हो सकती हैं। बाल के जैसे आकार वाले कार्बन मॉलीक्यूल जिनकी खोज सन् 1991 में हुई। स्टील से नौ गुना अधिक सशक्त और मानव बाल से 50 हजार गुना पतले हैं।
इसके इलेक्ट्रॉनिक मस्तिक भी खुद नैनो ट्यूब्स के बने हो सकते हैं, जिससे कि उन्हें जोडऩे वाले ट्रांजिस्टर और तार दोनों ही तरह से प्रयोग में लाये जा सकते हैं या फिर जो डीएनए से बनाये जा सकते हैं। इनमें छेड़छाड़ कर इन्हें ऐसे निर्देश दिये जा सकते हैं, जिनकी प्रकृति ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी। सही साफ्टवेयर और पर्याप्त दक्षता के साथ नैनोरोबोट या नैनोबोट कुछ भी बना सकता है। स्वयं की प्रतिलिपि भी। किसी भी प्रकार का उपयोगी काम करने के लिए आपको प्रत्येक कार्य के लिए ढेरों नैनो मशीनों को छोडऩा पड़ेगा-प्रत्येक रक्तधारा में कई बिलियन, प्रत्येक विशैले कूड़े वाले स्थान पर कई ट्रिलियन और एक कार बनाने के लिए कई कवाड्रिलियन या हजारों खरब कोई भी एसेंबली लाइन इतनी बड़ी संख्या में नैनोबोट नहीं बना सकती।
नैनो टेक्नोलॉजिस्ट इसके संभावित खतरों  से भी अनजान नहीं है, पर उन्हें विश्वास है कि वो उनका सामना कर सकते हैं। उनका विचार एक नैनोबोट साफ्टवेयर को कुछ इस तरह प्रोग्राम करने का है कि वह कुछ पीढिय़ों बाद स्वयं को नष्टï कर ले। एक अन्य विकल्प यह है कि नैनोबोट को कुछ इस तरह डिजाइन किया जाए कि वो कुछ निर्धारित शर्तों के भीतर ही काम कर सके। विषैले रसायनों की अत्यधिक उपस्थिति की दशा में, उदाहरण के लिए, तापमान और आद्र्रता की बेहद संकुचित रेंज के अंदर आप नैनोबोट्स को कुछ इस तरह भी प्रोग्राम कर सकते हैं कि वे पुनरुत्पादित होना बंद कर दें, जब उनके कई सारे साथी आसपास हों। यह वही योजना है जिससे कि प्रकृति बैक्टीरिया की संख्या पर नियंत्रण रखती है।

लेकिन ऐसा तब कुछ भी नहीं हो सकेगा जब कोई नैनोटेक को एक हथियार की तरह प्रयोग करना चाहेगा। एक ऐसी संभावना जोकि तुलना किए जाने पर कंप्यूटर वायरसों को बौना बना देगी। कुछ आलोचकों का मत है कि नैनोटेक के संभावित लाभ उसके संभावित खतरों की अपेक्षा कहीं कम हैं। फिर भी उसके आने वाले लाभ इतने अधिक हैं कि नैनोटेक, कंप्यूटर और आनुवंशिक दवाओं से कहीं ज्यादा आने वाली सदी का भविष्य तय करने वाली तकनीक साबित हो सकती है। यह भी हो सकता है कि दुनिया को एक नैनोटेक प्रतिरोध प्रणाली की जरूरत आन पड़े, जिसके अंतर्गत पुलिस नैनोबोट लगातार विनाश बोट्स के साथ सूक्ष्मदर्शी लड़ाई करते नजर आएंगे।


कब और कैसे करें श्राद्ध

हिन्दू धर्म में मान्यता है कि शरीर नष्ट हो जाने के बाद भी आत्मा अजर-अमर रहती है। वह अपने कार्यों के भोग भोगने के लिए नाना प्रकार की योनियों में विचरण करती है। शास्त्रों में मृत्योपरांत मनुष्य की अवस्था भेद से उसके कल्याण के लिए समय-समय पर किए जाने वाले कृत्यों का निरूपण हुआ है। 
सामान्यत: जीवन में पाप और पुण्य दोनों होते हैं। हिन्दू मान्यता के अनुसार पुण्य का फल स्वर्ग और पाप का फल नर्क होता है। नर्क में जीवात्मा को बहुत यातनाएं भोगनी पड़ती हैं। पुण्यात्मा मनुष्य योनि तथा देवयोनि को प्राप्त करती है। इन योनियों के बीच एक योनि और होती है वह है प्रेत योनि। वायु रूप में यह जीवात्मा मनुष्य का मन:शरीर है, जो अपने मोह या द्वेष के कारण इस पृथ्‍वी पर रहता है। पितृ योनि प्रेत योनि से ऊपर है तथा पितृलोक में रहती है। 
भाद्रपद की पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण अमावस्या तक सोलह दिनों तक का समय सोलह श्राद्ध या श्राद्ध पक्ष कहलाता है। शास्त्रों में देवकार्यों से पूर्व पितृ कार्य करने का निर्देश दिया गया है। श्राद्ध से केवल पितृ ही तृप्त नहीं होते अपितु समस्त देवों से लेकर वनस्पतियां तक तृप्त होती हैं।
श्राद्ध करने वाले का सांसारिक जीवन सुखमय बनता है तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है। ऐसी मान्यता है कि श्राद्ध न करने से पितृ क्षुधा से त्रस्त होकर अपने सगे-संबंधियों को कष्ट और शाप देते हैं। अपने कर्मों के अनुसार जीव अलग-अलग योनियों में भोग भोगते हैं, जहां मंत्रों द्वारा संकल्पित हव्य-कव्य को पितर प्राप्त कर लेते हैं। 
श्राद्ध की साधारणत: दो प्रक्रियाएं हैं- एक पिंडदान और दूसरी ब्राह्मण भोजन। ब्राह्मण के मुख से देवता हव्य को तथा पितर कव्य को खाते हैं। पितर स्मरण मात्र से ही श्राद्ध प्रदेश में आते हैं तथा भोजनादि प्राप्त कर तृप्त होते हैं। एकाधिक पुत्र हों और वे अलग-अलग रहते हो तो उन सभी को श्राद्ध करना चाहिए। ब्राह्मण भोजन के साथ पंचबलि कर्म भी होता है, जिसका विशेष महत्व है। 
शास्त्रों में पांच तरह की बलि बताई गई हैं, जिसका श्राद्ध में विशेष महत्व है।
1. गौ बलि
2. श्वान बलि
3. काक बलि
4. देवादि बलि 
5. पिपीलिका बलि
यहां बल‍ि से तात्पर्य किसी पशु या पक्षी की हत्या से नहीं है, बल्कि श्राद्ध के दिन जो भोजन बनाया जाता है। उसमें से इनको भी खिलाना चाहिए। इसे ही बलि कहा जाता है। 
यूं तो एक आम मान्यता है कि जिस भी तिथि को किसी महिला या पुरुष का निधन हुआ हो उसी तिथि को संबंधित व्यक्ति का श्राद्ध किया जाता है, लेकिन आपकी जानकारी के लिए हम कुछ खास बातें यहां बता रहे हैं...
* सौभाग्यवती स्त्री का श्राद्ध नवमी के दिन किया जाता है।
* यदि कोई व्यक्ति संन्यासी है तो उसका श्राद्ध द्वादशी के दिन किया जाता है।
* शस्त्राघात या किसी अन्य दुर्घटना में मारे गए व्यक्ति का श्राद्ध चतुर्दशी के दिन किया जाता है।
* यदि हमें अपने किसी पूर्वज के निधन की तिथि नहीं मालूम हो तो उनका श्राद्ध अमावस्या के दिन किया जाता है। इसीलिए इसे सर्वपितृ अमावस्या भी कहा जाता है।
* आश्विन शुक्ल की प्रतिपदा को भी श्राद्ध करने का विधान है। इस दिन दादी और नानी का श्राद्ध किया जाता है। 
* श्राद्ध के दौरान यह सात चीजें वर्जित मानी गई- दंतधावन, ताम्बूल भक्षण, तेल मर्दन, उपवास, संभोग, औषध पान और परान्न भक्षण।
* श्राद्ध में स्टील के पात्रों का निषेध है। 
* श्राद्ध में रंगीन पुष्प को भी निषेध माना गया है।
* गंदा और बासा अन्न, चना, मसूर, गाजर, लौकी, कुम्हड़ा, बैंगन, हींग, शलजम, मांस, लहसुन, प्याज, काला नमक, जीरा आदि भी श्राद्ध में निषिद्ध माने गए हैं। 
* संकल्प लेकर ब्राह्मण भोजन कराएं या सीधा इत्यादि दें। ब्राह्मण को दक्षिणा अवश्य दें।
* भोजन कैसा है, यह न पूछें।
* ब्राह्मण को भी भोजन की प्रशंसा नहीं करनी चाहिए।
* सीधा पूरे परिवार के हिसाब से दें।
इस प्रकार आप पितरों को प्रसन्न कर उनका आशीर्वाद लेकर अपने कष्ट दूर कर सकते हैं। यूं भी यह व्यक्ति का कर्तव्य है, जिसे पूर्ण कर पूरे परिवार को सुखी एवं ऐश्वर्यवान बना सकते हैं। इस बात का विशेष ध्यान रखें कि श्राद्ध करते समय संकल्प अवश्य लें



विश्वकर्मा पूजा पर विशेष!
हिंदू धर्म में मानव विकास को धार्मिक व्यवस्था के रूप में जीवन से जोड़ने के लिए विभिन्न अवतारों का विधान मिलता है। इन्हीं अवतारों में से एक भगवान विश्वकर्मा को दुनिया का इंजीनियर माना गया है, अर्थात समूचे विश्व का ढांचा उन्होंने ही तैयार किया है। वे ही प्रथम आविष्कारक थे। हिंदू धर्मग्रंथों में यांत्रिक, वास्तुकला, धातुकर्म, प्रक्षेपास्त्र विद्या, वैमानिकी विद्या आदि का जो प्रसंग मिलता है, इन सबके अधिष्ठाता विश्वकर्मा माने जाते हैं। इस बार विश्वकर्मा पूजा 17 सितम्बर दिन मंगलवार को पड़ रही है| 
विश्वकर्मा ने मानव को सुख-सुविधाएं प्रदान करने के लिए अनेक यंत्रों व शक्ति संपन्न भौतिक साधनों का निर्माण किया। इन्हीं साधनों द्वारा मानव समाज भौतिक चरमोत्कर्ष को प्राप्त करता रहा है। प्राचीन शास्त्रों में वैमानकीय विद्या, नवविद्या, यंत्र निर्माण विद्या आदि का उपदेश भगवान विश्वकर्मा ने दिया। माना जाता है कि प्राचीन समय में स्वर्ग लोक, लंका, द्वारिका और हस्तिनापुर जैसे नगरों के निर्माणकर्ता भी विश्वकर्मा ही थे।
माना जाता है कि विश्वकर्मा ने ही इंद्रपुरी, यमपुरी, वरुणपुरी, कुबेरपुरी, पांडवपुरी, सुदामापुरी और शिवमंडलपुरी आदि का निर्माण किया। पुष्पक विमान का निर्माण तथा सभी देवों के भवन और उनके दैनिक उपयोग में आने वाली वस्तुएं भी इनके द्वारा निर्मित हैं। कर्ण का कुंडल, विष्णु का सुदर्शन चक्र, शंकर का त्रिशूल और यमराज का कालदंड इत्यादि वस्तुओं का निर्माण भी भगवान विश्वकर्मा ने ही किया है।
एक कथा के अनुसार यह मान्यता है कि सृष्टि के प्रारंभ में सर्वप्रथम नारायण अर्थात् विष्णु भगवान क्षीर सागर में शेषशय्या पर आविर्भूत हुए। उनके नाभि-कमल से चतुर्मुख ब्रह्मा दृष्टिगोचर हो रहे थे। ब्रह्मा के पुत्र धर्म तथा धर्म के पुत्र वास्तुदेव हुए।
कहा जाता है कि धर्म की वस्तु नामक स्त्री से उत्पन्न वास्तु सातवें पुत्र थे, जो शिल्पशास्त्र के आदि प्रवर्तक थे। उन्हीं वास्तुदेव की अंगिरसी नामक पत्नी से विश्वकर्मा उत्पन्न हुए थे। अपने पिता की भांति ही विश्वकर्मा भी आगे चलकर वास्तुकला के अद्वितीय आचार्य बने। भगवान विश्वकर्मा के अनेक रूप बताए जाते हैं। उन्हें कहीं पर दो बाहु, कहीं चार, कहीं पर दस बाहुओं तथा एक मुख और कहीं पर चार मुख व पंचमुखों के साथ भी दिखाया गया है। उनके पांच पुत्र मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी एवं दैवज्ञ हैं।
यह भी मान्यता है कि ये पांचों वास्तुशिल्प की अलग-अलग विधाओं में पारंगत थे और उन्होंने कई वस्तुओं का आविष्कार भी वैदिक काल में किया। इस प्रसंग में मनु को लोहे से, तो मय को लकड़ी, त्वष्टा को कांसे एवं तांबे, शिल्पी ईंट और दैवज्ञ को सोने-चांदी से जोड़ा जाता है। हिंदू धर्मशास्त्रों और ग्रथों में विश्वकर्मा के पांच स्वरूपों और अवतारों का वर्णन मिलता है :
विराट विश्वकर्मा : सृष्टि के रचयिता
धर्मवंशी विश्वकर्मा : शिल्प विज्ञान विधाता और प्रभात पुत्र
अंगिरावंशी विश्वकर्मा : आदि विज्ञान विधाता और वसु पुत्र
सुधन्वा विश्वकर्मा : विज्ञान के जन्मदाता (अथवी ऋषि के पौत्र)
भृंगुवंशी विश्वकर्मा : उत्कृष्ट शिल्प विज्ञानाचार्य (शुक्राचार्य के पौत्र)
विश्वकर्मा के विषय में कई भ्रांतियां हैं। बहुत से विद्वान विश्वकर्मा नाम को एक उपाधि मानते हैं, क्योंकि संस्कृत साहित्य में भी समकालीन कई विश्वकर्माओं का उल्लेख है। कुछ विद्वान अंगिरा पुत्र सुधन्वा को आदि विश्वकर्मा मानते हैं, तो कुछ भुवन पुत्र भौवन विश्वकर्मा को आदि विश्वकर्मा मानते हैं।
ऋग्वेद में विश्वकर्मा सूक्त के नाम से 11 ऋचाएं लिखी हुई हैं। यही सूक्त यजुर्वेद अध्याय 17, सूक्त मंत्र 16 से 31 तक 16 मंत्रों में आया है। ऋग्वेद में विश्वकर्मा शब्द इंद्र व सूर्य का विशेषण बनकर भी प्रयुक्त हुआ है। महाभारत के खिल भाग सहित सभी पुराणकार प्रभात पुत्र विश्वकर्मा को आदि विश्वकर्मा मानते हैं। स्कंद पुराण प्रभात खंड के इस श्लोक की भांति किंचित पाठभेद से सभी पुराणों में यह श्लोक मिलता है :
बृहस्पते भगिनी भुवना ब्रह्मवादिनी।
प्रभासस्य तस्य भार्या बसूनामष्टमस्य च।
विश्वकर्मा सुतस्तस्यशिल्पकर्ता प्रजापति: ।।16।।
महर्षि अंगिरा के ज्येष्ठ पुत्र बृहस्पति की बहन भुवना जो ब्रह्मविद्या जानने वाली थी, वह अष्टम वसु महर्षि प्रभास की पत्नी बनी और उससे संपूर्ण शिल्प विद्या के ज्ञाता प्रजापति विश्वकर्मा का जन्म हुआ। भारत में शिल्प संकायों, कारखानों और उद्योगों में प्रत्येक वर्ष 17 सितंबर को भगवान विश्वकर्मा पूजनोत्सव का आयोजन किया जाता है।


हिंदी दिवस विशेष !

हिंदी भारोपीय (भारतीय-यूरोपीय) परिवार की एक ऐसी भाषा है जो आम भारतीयों की अभिव्यक्ति का माध्यम है। संख्या बल की दृष्टि से यह दुनिया में सर्वाधिक लोगों के बीच समझी जाने वाली भाषा है। भारोपीय परिवार की भाषा होने के कारण यह भारतीय सीमा के बाहर भी समझी जाती है। संस्कृत शब्दों की बहुलता के कारण यह देश के भीतर संपर्क का बेहतर माध्यम मानी जाती है।
 
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ही आजाद देश की भाषा के रूप में हिंदी को स्वीकार किए जाने की वकालत की जाने लगी थी। उस समय करीब-करीब देश के हर नेता ने हिंदी के महत्व को स्वीकार किया था, किंतु दुर्भाग्यवश हिंदी को वह सम्मानजनक आसन दिला पाने में वे विफल रहे।
हिंदी दिवस: कारण और महत्व
स्वतंत्रता के बाद 14 सितंबर, 1949 को संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया कि हिंदी (खड़ी बोली) ही भारत की राजभाषा होगी। इसी महत्वपूर्ण निर्णय के महत्व को प्रतिपादित करने तथा हिंदी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के अनुरोध पर 1953 से संपूर्ण भारत में 14 सितंबर को प्रतिवर्ष हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है।
इस दिन विभिन्न शासकीय, अशासकीय कार्यालयों, शिक्षा संस्थाओं आदि में विविध गोष्ठियों, सम्मेलनों, प्रतियोगिताओं तथा अन्य कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। कहीं-कहीं हिंदी पखवाड़ा तथा राजभाषा सप्ताह भी मनाए जाते हैं।
पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में 13 सितंबर, 1949 के दिन बहस में भाग लेते हुए कहा था कि किसी विदेशी भाषा से कोई राष्ट्र महान नहीं हो सकता। कोई भी विदेशी भाषा आम लोगों की भाषा नहीं हो सकती। भारत के हित में, भारत को एक शक्तिशाली राष्ट्र बनाने के हित में, ऐसा राष्ट्र बनाने के हित में जो अपनी आत्मा को पहचाने, जिसे आत्मविश्वास हो, जो संसार के साथ सहयोग कर सके, हमें हिंदी को अपनाना चाहिए।
यह बहस 12 सितंबर, 1949 को शाम चार बजे से शुरू हुई और 14 सितंबर, 1949 के दिन समाप्त हुई थी। 14 सितंबर की शाम बहस के समापन के बाद भाषा संबंधी संविधान के तत्कालीन भाग 14 (क) और वर्तमान भाग 17 में हिंदी का उल्लेख है।
संविधान सभा की भाषा विषयक बहस लगभग 278 पृष्ठों में मुद्रित हुई। इसमें डॉ. कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी और गोपाल स्वामी आयंगार की महती भूमिका रही। बहस के बाद यह सहमति बनी कि संघ की भाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी। देवनागरी में लिखे जाने वाले अंकों और अंग्रेजी में लिखे जाने वाले अंकों को लेकर बहस हुई और अंतत: आयंगार-मुंशी फार्मूला भारी बहुमत से स्वीकार कर लिया गया।
स्वतंत्र भारत की राजभाषा के प्रश्न पर काफी विचार-विमर्श के बाद जो निर्णय लिया गया, वह भारतीय संविधान के अध्याय 17 के अनुच्छेद 343 (1) में इस प्रकार वर्णित है: संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी। संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप अंतर्राष्ट्रीय ही होगा।

राजभाषा के प्रश्न से अलग हिंदी की अपनी एक विशाल परंपरा है। साहित्य और संचार के क्षेत्र में भी हिंदी का दबदबा देखने को मिलता है। तकनीक की क्रांति ने हिंदी को बल दिया है तो इसे सीमा के बाहर भी फैलने का अवसर प्रदान किया है।


 किसका सहारा ले मानव-जीवन

अपने दिल का हाल किसे बताऊं! मैं बहुत परेशान हूँ। रातों की नींद उजड़ गई। नींद से पहले जैसे रोज ही मौत से लड़ता हूँ। लगता रहता है कि अभी निष्‍प्राण हुआ कि तभी। पता नहीं कौन सी ललक होती है, जिसके सहारे नींद तक पहुंच कर मौत से संघर्ष रुक जाता है। सुबह की धूप में नई जिन्‍दगी फिर  से अच्‍छी लगने लगती है। मौनवश होकर प्रकृति को देखता हूँ। पेड़-पौधों, सूर्य किरणों, फूलों, नई सुबह के नए अनुभवों से पिछला सभी कुछ किसी गहरी परत के नीचे दब जाता है। रोजाना के कार्यों, संवादों को नवीनता प्रदान करने की कोशिश करता हूँ। हरेक जीवन गतिविधि के प्रति अपने पुराने विचारदर्शन को ये सोच कर नया करता हूँ कि आनेवाले गिरे हुए समय में खुद को गिरने से बचा सकूं। दिनभर की मेरी अच्‍छी जिन्‍दगी में जो बाहरी दुनिया की गन्‍दगी प्रवेश करती है उस से मजबूती से भिड़ने के लिए अपने अन्‍दर खाने को अपनी ही संवेदनाओं की खुराक देता हूँ। लेकिन दिन बीतने और रात के शिकंजे में खुद को एक बार फिर  से पड़ा देख मैं डर जाता हूँ और देर रात तक डर के वशीभूत हो कभी अपनी मौत तो कभी दुनियावी छिछलाहट के अनुभवों के संग युद्ध करते-करते आखिर में नींद में होता हूँ। नींद में भी सपनों की ऐसी श्रृंखला बनती है जो जीवन, मृत्‍यु और मृत्‍यु के बाद भी देखे जा सकनेवाले ऐसे दृश्‍यों को मानस-पटल पर अंकित कर देती, जिससे सुबह उठने से लेकर कई दिनों तक छुटकारा नहीं मिलता। कभी अपने हाथ की लकीरों में अपना व्‍यक्तित्‍व पढ़ता हूँ तो कभी हाथों से किए जानेवाले श्रम के बलबूते अपने भाग्‍य को गढ़ने, सुधारने के प्रयत्‍न करता हूँ। कमबख्‍त नींद भी तो काम के वक्‍त पर आती है। सुबह नहाने के बाद सोने का मन होता है। लेकिन इस वक्‍त सो नहीं सकता। सुबह ने जागने का दायित्‍व जो सौंप रखा है। परिवार के साथ जो रह रहा हूँ। साधु-सन्‍त तो हूँ नहीं कि योग करते-करते ही नींद की झपकी ले ली या नींद खुलते ही योग-ध्‍यान में लीन हो जाऊं। पड़ोसी जब दुखों, समस्‍याओं से थोड़ा-बहुत उबर कर बहुत दिनों के बाद नजर आता है तो मुझे पता चलता है कि कुछ दिनों पूर्व से वो कितने कष्‍टों में है। खुद से घृणा होने लगती कि पड़ोसी की मुसीबत की कोई खबर ही नहीं तुझे। अपने लिए अपनी नजर की घृणा में तब कमी होती है जब पड़ोसी को कहते हुए सुनता हूँ कि भाई साहब आप खुद ही परेशान और दुखी हैं, ऐसे में आपको बताना, तंग करना ठीक नहीं समझा। अपनी हालत ये हो गई कि किसी की मदद करने की दिली इच्‍छा को भी दबा देना पड़ता है। भिखारी को भीख देने के लिए जेब में हाथ डालता हूँ तो मुंह से व्‍यवस्‍था और व्‍यवस्‍थापकों के लिए अपशब्‍द निकल पड़ते हैं। वो हाथ फैलाए बैठा रहता है और मैं विडंबना से ग्रसित होकर दूर निकल जाता हूँ। परिवार सहित आत्‍महत्‍या करनेवालों के प्रति प्रगाढ़ सहानुभू‍ति होती है। बिना किसी रोग, दुर्घटना के केवल समाज-सरकार की तीव्र उपेक्षा से एक परिवार इकाई जब मौत को गले लगा ले और शासनाधीश इस ओर निश्चिंत हों तब उसके लिए जीवित होना न होना एकसमान होता है। ऐसे में उनके लिए एकमात्र रास्‍ता आत्‍महत्‍या ही होता है। फिर  भी मौत की नींद में समाने के बाद भी जो सपने वे देखते हैं वहां भी पास-पड़ोसवाले, नाते-रिश्‍तेदार उन्‍हें कोसते हुए ही नजर आते हैं। लोगों की छीछालेदर वे मौत के बाद भी झेल रहे होते हैं। अकेले रह रहे बूढ़े दम्‍पत्तियों और लावारिश बच्‍चों को देख कर कैसे लग सकता है कि भारत निर्माण हो रहा है। सरकार भ्रूण हत्‍या खासकर कन्‍या भ्रूण हत्‍या को अपराध मानती है। भ्रूण की मौत पे शायद इतना दुख न हो जितना भ्रूण के पांच-छह फुट के मानव में बदलने के बाद जीते जी हो रही उसकी सामाजिक हत्‍या से हो। समाज की देखरेख जब सरकार करती है तो समाज सुधार भी करे। भ्रूण के मानव के रुप में पलने-बढ़ने के लिए अनुकूल सामाजिक वातवारण भी तो निर्मित करे। जो आया ही नहीं उसकी चिन्‍ता काहे की। जो हैं चिन्‍ता के केन्‍द्र में वे होने चाहिए। स्‍वाभाविक, स्‍वच्‍छन्‍द जीवनयापन पर आधुनिकता की मोटी जंग जम गई है। एक-दूसरे को लाख दिलाशाएं देते हुए हम सब जीवन में आशावादी बने रहने की कितनी भी कोशिश क्‍यों न करें लेकिन सच ये है कि सभी आम लोग घोर निराशा में जी रहे हैं। लोग आस्‍था-अनास्‍था को लेकर झगड़ रहे हैं। कोई विज्ञान तो कोई धर्म-ईश्‍वर के पक्ष में खड़ा दीखता है। पर मनुष्‍य जीवन की क्षणभन्‍गुरता और क्षणभन्‍गुर जीवन की समस्‍याएं पूर्व युगों की तरह इस युग में भी जस की तस हैं। इन्‍हें न तो विज्ञान-वैज्ञानिक समाप्‍त कर पाए हैं और ना ही धार्मिक-ईश्‍वरीय शक्तियां खत्‍म कर पाईं हैं। तो फिर  कौन  है  जिसका सहारा लेकर मानव जीवन का आत्‍मविश्‍वास बढ़े। यदि मानव जीवन धर्म-प्रणालियों से परे केवल नवजात बच्‍चे जैसी भाव-विह्वलता लेकर गुजरे तो कितना अच्‍छा हो। इस दिशा में यदि सामाजिक प्रयास, प्रयोग होते हैं तो इसके लिए अनेक शुभकामनाएं हैं।



कृष्ण एक मानवीय शक्ति !

हाल ही में एक भारतवंशी ब्रितानी शोधकर्ता ने खगोलीय घटनाओं और पुरातात्विक व भाषाई साक्ष्यों के आधार पर दावा किया है कि भगवान कृष्ण हिंदू मिथक और पौराणिक कथाओं के काल्पनिक पात्र न होते हुए एक वास्तविक पात्र थे। सच्चाई भी यही है। ब्रिटेन में न्यूक्लियर मेडिसिन के फिजिशियन डॉ़ मनीष पंडित ने अपने अनुसंधान में बताया है कि टेनेसी के मेम्फिस विश्वविद्यालय में भौतिकी के प्रोफेसर डॉ़ नरहरि अचर ने खगोल विज्ञान की मदद से महाभारत युद्घ के काल का पता लगाया है। कृष्ण का जन्म 3112 बीसी में हुआ। डॉ़ पंडित द्वारा बनाई गई दस्तावेजी फिल्म ‘कृष्ण इतिहास और मिथक’ में बताया गया है कि पांडवों और कौरवों के बीच महाभारत की लड़ाई ईसा पूर्व 3067 में हुई थी। इन गणनाओं के अनुसार कृष्ण का जन्म ईसा पूर्व 3112 में हुआ था, यानी महाभारत युद्घ के समय कृष्ण की उम्र 54-55 साल की थी। महाभारत में 140 से अधिक खगोलीय घटनाओं का विवरण है। इससे स्पष्ट होता है कि कृष्ण कोई अलौकिक या दैवीय शक्ति न होकर एक मानवीय शक्ति थे।
कृष्ण बाल जीवन से ही जीवनपर्यंत सामाजिक न्याय की स्थापना और असमानता को दूर करने की लड़ाई दैव व राजसत्ता से लड़ते रहे। वे गरीब की चिंता करते हुए खेतीहर संस्कृति और दुग्ध क्रांति के माध्यम से ठेठ देशज अर्थव्यवस्था की स्थापना और विस्तार में लगे रहे। सामारिक दृष्टि से उनका र्शेष्ठ योगदान भारतीय अखंडता के लिए उल्लेखनीय रहा। कृष्ण जड़ हो चुकी उस राज और देव सत्ता को भी चुनौती देते हैं, जो जन विरोधी नीतियां अपनाकर लूट तंत्र और अनाचार का हिस्सा बन गए थे? भारतीय लोक के कृष्ण ऐसे परमार्थी थे जो चरित्र भारतीय अवतारों के किसी अन्य पात्र में नहीं मिलता। कृष्ण की विकास गाथा अनवरत साधारण मनुष्य बने रहने में निहित रही। 16 कलाओं में निपुण इस महानायक के बहुआयामी चरित्र में वे सब चालाकियां बालपन से ही थीं, जो किसी चरित्र को वाक्पटु और उद्दंडता के साथ निर्भीक नायक बनाती हैं, लेकिन बाल कृष्ण जब माखन चुराते हैं तो अकेले नहीं खाते, अपने सब सखाओं को खिलाते हैं और जब यशोदा मैया चोरी पकड़े जाने पर दंड देती हैं तो उस दंड को अकेले कृष्ण झेलते हैं। चरित्र का यह प्रस्थान बिंदु किसी उदात्त नायक का ही हो सकता है।
कृष्ण का पूरा जीवन समृद्घि के उन उपायों के विरुद्घ था, जिनका आधार लूट और शोषण रहा। शोषण से मुक्ति, समता व सामाजिक समरसता से मानव को सुखी और संपन्न बनाने के गुर गढ़ने में कृष्ण का चिंतन लगा रहा। इसीलिए कृष्ण जब चोरी करते हैं, स्नान करती स्त्रियों के वस्त्र चुराते हैं, खेल-खेल में यमुना नदी को प्रदूषण मुक्त करने के लिए कालिया नाग का मान र्मदन करते हैं, उनकी वे सब हरकतें अथवा संघर्ष उत्सवप्रिय हो जाते हैं। नकारात्मकता को भी उत्सवधर्मिता में बदल देने का गुर कृष्ण चरित्र के अलावा दुनिया के किसी इतिहास नायक के चरित्र में विद्यमान नहीं हैं?
भारतीय मिथकों में कोई भी कृष्ण के अलावा ईश्वरीय शक्ति ऐसी नहीं है जो राजसत्ता से ही नहीं उस पारलौकिक सत्ता के प्रतिनिधि इन्द्र से विरोध ले सकती हो जिसका जीवनदायी जल पर नियंत्रण था? यदि हम इन्द्र के चरित्र को देवतुल्य अथवा मिथक पात्र से परे मनुष्य रूप में देखें तो वे जल प्रबंधन के विशेषज्ञ थे, लेकिन कृष्ण ने रूढ़, भ्रष्ट व अनियमित हो चुकी उस देवसत्ता से विरोध लिया, जिस सत्ता ने इन्द्र को जल प्रबंधन की जिम्मेदारी सौंपी हुई थी और इन्द्र जल निकासी में पक्षपात बरतने लगे थे। किसान को तो समय पर जल चाहिए अन्यथा फसल चौपट हो जाने का संकट उसका चैन हराम कर देता है। कृष्ण के नेतृत्व में कृषक और गौ पालकों के हित में यह शायद दुनिया का पहला आंदोलन था, जिसके आगे प्रशासकीय प्रबंधन नतमस्तक हुआ और जल वर्षा की शुरुआत किसान हितों को दृष्टिगत रखते हुए शुरू हुई। 

आज नारी नर के समान स्वतंत्रता और अधिकारों की मांग कर रही है, लेकिन कृष्ण ने तो औरत को पुरुष के बराबरी का दर्जा द्वापर में ही दे दिया था। राधा विवाहित थी, लेकिन कृष्ण की मुखर दीवानी थी। ब्रज भूमि में स्त्री स्वतंत्रता का परचम कृष्ण ने फहराया। जब स्त्री चीर हरण (द्रोपदी प्रसंग) के अवसर पर आए तो कृष्ण ने चुनरी को अनंत लंबाई दी। स्त्री संरक्षण का ऐसा कोई दूसरा उदाहरण दुनिया के किसी भी साहित्य में नहीं है? इसीलिए वृंदावन में यमुना किनारे आज भी पेड़ से चुनरी बांधने की परंपरा है। जिससे आबरू संकट की घड़ी में कृष्ण रक्षा करें। 



प्याज का दर्द , सरकारी उदासीनता की देन

आम भारतीय की थाली का अहम हिस्सा प्याज उसकी पहुंच से दूर होता जा रहा है। लेकिन सरकार इस दिशा में कतई गंभीर नजर नहीं आती। अपने राजनीतिक प्रपंचों में उलझी केंद्र सरकार शायद भूल रही है कि प्याज में राजनीतिक पार्टियों की आंखों में आंसू लाने की ताकत है। इसके लिए डेढ़ दशक पहले के दिल्ली के राजनीतिक परिदृश्य पर नजर डालने की जरूरत है। तब भाजपा की दिल्ली सरकार के खिलाफ प्याज एक बड़ा मुद्दा बना। सरकार गई तो फिर लौट के नहीं आई। इस बात को दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने समझा है और सस्ता प्याज बेचने की कवायद शुरू की। लेकिन इन अस्थायी दुकानों से समस्या का हल निकलता नजर नहीं आता। इसके लिए स्थायी व्यवस्था की दरकार है। साफ-सी बात है कि किसी वस्तु का मूल्य मांग और आपूर्ति के संतुलन से तय होता है। प्याज के प्रमुख उत्पादक महाराष्ट्र में सूखे के चलते कुछ उत्पादन कम क्या हुआ कि प्याज के दाम आसमान छूने लगे। यह ठीक है कि बारिश के कारण सब्जियों के दाम बढ़ जाते हैं, लेकिन इतने भी नहीं। मध्यप्रदेश व राजस्थान आदि राज्यों में वर्षा से बाधित यातायात के कारण प्याज की जो आवक कम हुई, कहीं न कहीं उससे भी प्याज की कीमतों पर असर पड़ा। कच्ची प्याज भी बरसात के दिनों में खराब हो जाती है। लेकिन जिस अनुपात में प्याज का उत्पादन कम हुआ, उससे कई गुना प्याज के दाम बढ़ गए। जाहिर-सी बात है कि बिचौलियों और मुनाफाखोरों ने कृत्रिम कमी उत्पन्न करके मनमाने दाम वसूलने शुरू कर दिए।
यूं तो हर प्याज आंसू नहीं निकालता। कुछ मीठा प्याज भी होता है। प्याज भले ही तामसिक प्रवृत्ति का माना जाए और कुछ धर्म-संप्रदाय इसे खाने से परहेज करते हों, लेकिन प्याज कई मर्जों की दवा भी है। लेकिन फिलहाल तो ये दर्द ही बढ़ा रहा है। पहले इसे छीलते वक्त आंसू आते थे, अब इसकी कीमत सुनकर भी आंसू आने लगे हैं। वजह साफ है इसकी कीमत का 70-80 रुपये तक पहुंच जाना। लेकिन सारे प्रकरण में सरकार की काहिली ही उजागर होती है। एक रहस्यमय बात है कि चीनी हो, दूध हो या फिर प्याज—देश के जिम्मेदार मंत्री के इलाके से सारे देश के भाव बढ़ाने की शुरुआत होती है। महाराष्ट्र से ही प्याज के दामों के बढऩे की शुरुआत हुई। महंगाई पर उनके बेसिर-पैर के बयान कृषि और खाद्य आपूर्ति मंत्री के बतौर आते रहे हैं। वे कहते रहे हैं कि वे न ज्योतिषी हैं कि बता सकें कि दाम कब कम होंगे और न उनके पास जादू की छड़ी ही है जो दाम कम कर सके। ऐसा लगता है कि उनके बयान आम जनता के हित में कम, मुनाफाखोरों और बिचौलियों के हित में ज्यादा आते हैं। उनके बयानों के बाद कीमतें उछाल मारती रही हैं। प्याज के मामले में भी ऐसा ही हुआ है। प्याज क्योंकि ऐसी चीज है जो हर घर में उपयोग होती है और कमोबेश हर सब्जी में उसका उपयोग होता है। जो लोग सब्जी नहीं खरीद पाते, वे आलू-प्याज से काम चला लेते हैं। कहते भी हैं गरीब प्याज-रोटी खाकर भी गुजारा चला लेता है। देश के योजना आयोग ने गरीबी के निर्धारण के लिए जो मानक तय किये हैं, उसमें तो इस मानक वाले लोग भी प्याज खरीदने की स्थिति में नहीं हैं।ऐसे में जनाक्रोश का बढऩा स्वाभाविक भी है।

सबसे अधिक विचलित करने वाली बात ये है कि सरकारों का रवैया गैरजिम्मेदाराना रहा है। जब यह बात साफ है कि उत्पादन में आई कमी के अनुपात से कई गुना कीमतों के दाम में वृद्धि हो रही है तो जरूर कहीं न कहीं बिचौलियों की भूमिका है। इसको गोदामों में भरने और आपूर्ति में बाधा डालने का काम प्याज के बड़े व्यापारियों द्वारा किया जा रहा है। हालात तो यहां तक हो गए हैं राजस्थान से प्याज से भरे ट्रक लूटने की खबरें आई हैं। लेकिन केंद्र सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी है। यदि सरकार समय रहते प्याज का निर्यात बंद कर देती तथा आयात की निविदाएं समय रहते मंगा लेती तो शायद कीमतों में इतना उछाल नहीं आता। सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय समझौतों का हवाला देकर प्याज का निर्यात तो कम नहीं किया लेकिन आयात की कोशिशें जरूर शुुरू कर दीं। बताया जा रहा है कि पाकिस्तान, ईरान, मिस्र और चीन से प्याज आयात करने की कोशिशें जारी हैं। हालांकि सरकार ने कदम उठाने में देर कर दी है लेकिन इससे कुछ राहत तो अवश्य मिलेगी। मगर सवाल फिर वही है कि मुनाफाखोरों और बिचौलियों के खिलाफ सरकार के तमाम विभाग कार्रवाई क्यों नहीं करते? यह भी कि सरकार आधे-अधूरे प्रयास क्यों करती है। क्यों ऐसी व्यवस्था नहीं की जाती कि प्याज की कीमतों पर नियंत्रण हो। यानी समस्या का स्थायी समाधान निकाला जाए।


नये सी. पी.  के प्रयास से दिल्ली हो जायेगा अपराध मुक्त 

धरा  बेच देंगे, गगन बेच देंगे, चमन बेच देंगे, सुमन बेच देंगे

अगर सो गये, देश के सिपाही, वतन के सौदागर, वतन बेच देंगे।

दिल्ली के नवनियुक्त पुलिस कमिश्नर भीमसेन बस्सी ने पद भार ग्रहण करने के उपरांत मीडियाकर्मियों के सामने जब यह कहा कि वह दिल्ली को सुरक्षित प्रदेश बनाने का काम करेंगे तो यह अन्य पुलिस कमिश्नरों द्वारा दिये गये बयान की तरह ही रटा-रटाया एक पंक्ति भर नजर आ रहा था।
दिल्ली के नवनियुक्त पुलिस कमिश्नर ने पद ग्रहण के दूसरे दिन शुक्रवार को जब पुलिस मुख्यालय में जिले के वरिष्ठ अधिकारयों  को यह निर्देश दिया कि अपने-अपने जिले के ए.सी.पी. व एस.एच.ओ. को यह निर्देश जारी करे कि अब आम लोगों की थानों में शिकायत दर्ज करने में कोई कोताही नहीं बरतें, अगर ऐसा हुआ तो सम्बन्ध्ति अधिकारीयों  के खिलापफ सख्त कार्रवाई की जायेगी। यह खबर मिलने पर मीडियाकर्मी को श्री बस्सी अन्य से अलग नजर आने लगे।

पुलिस आयुक्त भीमसेन बस्सी के इस फरमान के बाद जिस प्रकार एडिशनल सी.पी. व जिला उपायुक्तों ने त्वरित कार्रवाई करते हुए बैठक की और नये सी.पी. के फरमान से उन्हें अवगत कराया, यह दिल्ली पुलिस के इतिहास में शायद पहली बार देखने को मिला। एक उपायुक्त ने तो वायरलेंस से ही सभी थानाध्यक्षों को अपने जिला में सी.पी. का फरमान जारी कर दिया। सी.पी. द्वारा इस तरह का फरमान जारी तो अनेकों बार हुए हैं लेकिन पहली बार यह चर्चा का विषय बना है। अपराध् नियंत्राण व निरंकुश व्यवस्था पर अंकुश लगाने के लिए एक दृढ़ इच्छाशक्ति होनी चाहिए जो नवनियुक्त पुलिस आयुक्त ने चंद घंटों में दिखा दिया है। दिल्ली को अपराधमुक्त  करने की दिशा में कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं की ओर नवनियुक्त पुलिस आयुक्त का ध्यान दिया जाना आवश्यक है। अपराध् की शुरुआत छोटे स्तर से शुरू होकर बड़े स्तर पर पहुंचता है इसे रोकने के लिए ईमानदार व कत्र्तव्यनिष्ठ पुलिसकर्मियों को संरक्षित करना आवश्यक है। मफिययों   व भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई करना पड़ेगा। चेन स्नेचिंग रोकना, सड़कों को अतिक्रमण से मुक्त रख यातायात व्यवस्था सुदृढ़ करना, पार्कों के अन्दर सुबह 9 बजे, दिन के दो बजे और रात्रि नौ बजे जांच करना, किरायेदारों की जांच पड़ताल करना, बेरोजगार युवकों के हाथों में मंहगी मोबाइल, मोटर साईकिल के जरिये का पता लगाना, शराब के ठेके, स्कूल के गेट, मेट्रो की पार्किंग पर नजर रखना, जैसे छोटे-छोटे मुद्दे हैं जो अपराध् को बढ़ाने व कानून व्यवस्था को चुनौती देने में अहम भूमिका अदा करते हैं।
इस तरह के वारदात के बाद कुछ संगठित रूप से अपराध् भी दिल्ली में हो रहे हैं इसे रोकने के लिए आवश्यक है कि पुलिस आयुक्त सम्बंधित  थाना को यह निर्देश दे कि उक्त थाना क्षेत्रा में प्रोपर्टी डीलर कितने हैं, बिल्डर कितने हैं, लाइसेंस कितने के पास है, बगैर लाइसेंस का कौन-कौन काम कर रहा है, इनमें से कितने पर आपराधिक  मुकदमें चल रहे हैं, कितने जेल जा चुके हैं, कौन विवादास्पद प्रोपर्टी खरीदने व बेचने का काम करता है। दिल्ली में अपराध् का ग्राफ व अवैध् हथियार की खपत अगर बढ़ी है तो इसमें भू-माफिया , बिल्डर माफिया   का अहम रोल माना जा सकता है। भू-माफिया , बिल्डर माफिया  पैसे के बल पर थाना के निचले स्तर के कर्मी, छुटभैय्ये आवारा लड़कों का इस्तेमाल अपने विरोधियों  को रास्ते से हटाने के लिए तरह-तरह के प्रपंच रचकर करते हैं और कानून को चुनौती पेश करते हैं।
पुलिस आयुक्त इलाके में चलने वाले ढाबे जो बगैर लाइसेंस के चल रहे है और जहां शराब पिलाई जाती है उसकी भी सूची बनवाकर उस पर अकस्मात् छापामारी कराने में सफल रहे तो कई वारदात होने से बच सकता है। मेडिकल स्टोरों से आज लाल व हरे रंग की गोली युवा वर्ग खरीद रहे हैं और नशे के शिकार हो रहे हैं अगर मेडिकल स्टोरों को निर्देश जारी कर दिया जाय कि बगैर डॉक्टर  की पर्ची के कोई दवा खासकर 20 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को न दिया जाय तो अपराध् का ग्राफ गिर सकता है क्योंकि अपराधी  किस्म के व्यक्ति इस प्रकार के नशेड़ी युवाओं को प्रोलोभन देकर उनसे उठाईगिरी, बच्चों के अपहरण, चेन स्नेचिंग, पाॅकेटमारी, वाहन से सामान चोरी जैसे अनेक वारदात को अंजाम देते हैं। दिल्ली में अपराध् बढ़ने के पीछे एक महत्वपूर्ण कारण सट्टाबाजी भी है। दिल्ली के कई इलाकों में सट्टा का खेल स्थानीय पुलिस की छत्राछाया में होता है। यह सट्टा सुबह 10 बजे से शुरू होकर देर रात तक चलता हे। इस सट्टे के खेल के लिए दूर-दूर से तरह-तरह के युवा एकत्र होते हैं ओर हारने के बाद अपराध् करते हैं। इसे रोकना दिल्ली पुलिस के लिए एक चुनौती होगी क्योंकि निचले स्तर से लेकर एस.एच.ओ. स्तर तक इन सट्टेबाजों की पहुंच होती है। नवनियुक्त सी.पी. भीमसेन बस्सी दिल्ली की आबोहवा से पूर्णरूपेण परिचित हैं अगर इन छोटी-छोटी समस्याओं पर अंकुश लगाने में वे सपफल रहे तो दिल्ली की महिलाएं, बच्चे व आम नागरिक जहां सुरक्षित हो जाएंगे वहीं दिल्ली के पुलिस आयुक्त इतिहास पुरुष बन मिसाल पेश कर सकते हैं।
दुष्यंत की पंक्ति हैः-
कौन कहता है आसमान में सुराग हो नहीं सकता
एक पत्थर तो दिल से उछालो यारों। 


                                                                                                       ललित "सुमन"



सन् 2005 से प्रारम्भ हुए इंटरनेट-टीवी का मुकाबला अभी डिश टीवी, केवल आपरेटर, से है। इंटरनेट टीवी प्रावाइडर और इनके मध्य अभी बहुत कुछ तय होना बाकी है। लेकिन इन सब में आखिरकाल कुछ फायदा तो उपभोक्ता का होना ही है। दुनिया के कई देशों में पारम्पारिक रूप से टीवी चैनलों को इंटरनेट टीवी के माध्यम से ही दिखाया जा रहा है।
हमारे यहाँ  भी काफी चैनल इस प्रकार उपलब्ध हैं। इंटरनेट से जुड़े टेलीविजन सेट कम्प्यूटर की तरह तो काम करते ही हैं, वे टीवी पर कमाल की सुविधाएं भी देते हैं। इनके जरिए टीवी देखने के ज्यादा व्यक्तिगत अनुभव कमाल के हैं। मसलन यू-ट्यूब पर ताजा वीडियो भी देख सकते हैं। पुरानी फिल्म या म्यूजिक तथा परम्परागत तरीके से सीरियल्स आदि तो देखने को मिलना ही है। फिर भी बहुत कुछ बदल रहा है। बहरहाल आपका टीवी और भी कई मामलों में बदल रहा है। प्रस्तुत हैं भविष्य के टीवी की बदलती तस्वीर की कुछ झलकियां-
थ्री डी भी नए रूप में होगा
थ्री डी चश्मे बदल गए हैं। अब वे प्लास्टिक की बजाए एलसीडी लेंस से बनते हैं और काफी महंगे हैं। लेकिन हां, उनका सिद्वांत वही है। थ्री डी टीवी भी विकसित हो रहे हैं। और अब तो इस श्रेणी के ऐसे टीवी भी आ गये हैं, जिनमें विशेष चश्मा पहनने की जरूरत नहीं रह गई है। पूरी संभावना है कि भविष्य में ये थ्रीडी टीवी सामान्य टीवी की जगह ले लेंगे। बहरहाल, यह तय है कि भविष्य का टीवी हमारी ज्यादा इंद्रियों को और प्रभावित करेगा और टीवी देखने का हमारा अनुभव वर्तमान की तुलना में कहीं अधिक वास्तविक होगा।
एचडी पीछे छूट गया, यूडी का है जमाना टीवी की स्क्रीन बड़ी होती जा रही है। वह लिविंग रूम की दीवार पर ज्यादा से ज्यादा जगह घेर रही है। ऐसे में हाई डेफिनिशन एचडी टीवी पीछे छूटता जा रहा है। भविष्य अल्ट्रा डेफिनिशन -यूडी टीवी सेट्स का है। यूडी टीवी में आमतौर पर 3,840 गुणा  2,160 पिक्सेल का रिजोल्यूशन होगा, यानी और भी क्लियर पिक्चर, जिसे आप जितना चाहें ज़ूम करके देख सकें। जबकि, एचडी में 1,920गुणा 1,080 का रिजाॅल्युशन होता है।
लचीला टीवी, कपढे जैसा चाहो मोड़ो यह है क्वांटम डाट टेक्नोलाॅजी, जो एलसीडी की तुलना में काफी कम बिजली खपत करती है। ये सेमीकंडक्टिंग नैनो क्रिस्टल्स प्रकाश या बिजली के सम्पर्क से चमकने लगते हैं। सैमसंग के वैज्ञानिको ने इन्हे लचीले प्लास्टिक पर जमाकर पतली फिल्म वाले ट्रांजिस्टर से चार्ज करने की कौशीश शुरू कर दी है। यही लचीली टीवी स्क्रीन की शुरूआत है। जिसे आप कपढे की तरह मोड़ सकते हैं। भविष्य में आपका टीवी प्लास्टिक या रबर से बनेगा, जिसे मोड़ा जा सके, ताकि आपको मिले परफैक्ट व्यू।
फूल की खुश्बू टीवी पर सूंघेगें कैलिफोर्निया विश्वविधालय के शोधकर्ताओं ने एक छोटा बाॅक्स बनाया है, जिसके भीतर रखे द्रव पदार्थ को बिजली के करंट के जरिए गर्म करने पर दस हजार तरह की गंध निकलती है। संभव है इससे आगे की तकनिकी  स्क्रीन पर नजर आ रही है, टीवी वस्तु या दृश्य के अनुसार गंध उत्सर्जित करने में सक्षम हो जाए। भविष्य के टीवी में पर्दे पर जो दिख रहा होगा, उसकी गंध आप भी सूंघ सकेंगे। मुश्किल यह है कि सुगंध तो अच्छी रहेगी, पर दुर्गन्ध को कैसे बर्दाश्त कर पायेंगे।
डॉक्टर  अपने लिविंग रूम में आप कल्पना करे कि आप अपने घर के सोफे पर बैठ कर रिमोट उठाकर टीवी चालू कर रहे हैं। आपने अपनी किसी बीमारी के इलाज के बारे में सोचते हुए चैनल बदली सामने किसी अस्पताल के सहायक की छवि उभरती है। वह बताता है कि डॉक्टर  जल्दी ही आपको देखेंगे। कुछ पल बाद डॉक्टर  स्क्रीन पर नजर आते हैं। वह आपके ब्लड टेस्ट व अन्य परीक्षणों के बारे में बताता है। आपके स्वास्थ्य से जुड़े अन्य सवाल करते है, और आप भी उससे सवाल कर अपनी आंशकाओं का समाधान करते हैं। यह सब कुछ वैसे ही हो रहा है, जैसे आप डॉक्टर  के पास चेकअप के लिए जाते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि डॉक्टर  तो अपने क्लिनिक में हैं और आप अपने लिविंग रूम में टीवी के सामने यह सब संभव होगा भविष्य के टीवी के नये रूप के साथ।
यह भविष्य के टीवी की एक व्यवस्था है, जो वर्तमान में छोटे पैमाने पर साकार हो चुकी है। एक प्रयोग के तहत इंग्लैंड के साउथ कोस्ट में यह प्रणाली चल रही है। संभावना है कि 2015 तक ब्रिटेन के एक करोड़ टीवी सेट इंटरनेट से जुड़ जाएंगे। वैश्विक स्तर पर इस दशक के अंत तक इंटरनेट सुविधा वाले टीवी सेट की संख्या पचास करोड़ तक पहुँच जाने की संभावना है।


चीन के साथ सावधानी जरूरी

चीन और पाकिस्तान दोनों भारत की स्थायी भौगोलिक समस्या है। पड़ोसी देशों के साथ अच्छे संबंधों का परोक्ष तथा अपरोक्ष रूप से लाभ होता है। लेकिन भारत के ये दोनों पड़ोसी अविश्वसनीय है। इसलिए संबंधों में सौहार्द की अपेक्षा समस्याएं अधिक होती है। पाकिस्तान को एक तरफ शांति वार्ताएं चलाने दूसरी तरफ आतंकी गतिविधियों को प्रोत्साहन देने में महारत हासिल है। ये दोनों काम वह बखूबी कर सकता है। इसी प्रकार चीन का दबाव की रणनीति पर चलता है। इसलिए संबंध सुधारने की उसकी पहल में नेकनीयकत नहीं होती। उसके अपने आर्थिक लाभ अधिक महत्वपूर्ण होते हैं। भारत के विशाल बाजार पर उसकी पैनी नजर रहती है। यहां वह अपने पांव जमाना चाहता है। उस दिशा में प्रयास भी कर रहा है। लेकिन इसके लिए भी उसने हमेशा भारतीय सीमा पर दबाव बनाने का काम पहले किया। उसे लगता है कि वह सीमा पर दबाव बनाकर या भारत को परेशान करने वाले कार्यों को अन्जाम देकर आर्थिक संबंधों को अपने पक्ष में मोड़ सकता है। भारत और चीन के बीच व्यापारिक संबंध इसको प्रमाणित करते है। व्यापार संतुलन पूरी तरह चीन के पक्ष में है। वह द्विपक्षी व्यापार में भारत से कई गुना अधिक फायदे में है। ये ठीक है कि चीन भारत का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। पिछले वर्ष 66 अरब डालर का व्यापार हुआ। अगले दो वर्षों में इसे सौ अरब डालर तक पहुंचाने का लक्ष्य है। व्यापार जितना बढ़ेगा चीन को उतना ही लाभ होगा। भारत उसे कच्चा सामान भेजता है। वह निर्मित माल भेज रहा है। वास्तविक फायदा उसका है। इसके बावजूद वह दबाव की राजनीति करता है। जबकि दबाव हमारा होना चाहिए। भारत का बाजार उसके लिए बहुत पहले ही खुल चुका है। यहां उसकी अच्छी पैठ बन रही है। घरों के भीतर, यहां तक कि पूजा घरों तक उसकी पैठ बन गई है। खिलौने खरीदने में समर्थ परिवारों के बच्चे भी चीन को जानते है। वहां के निर्मित खिलौनों को खेलकर वह बड़े हो रहे है। यह ठीक है कि हम उदारीकरण वैश्वीकरण को बड़ी हद तक स्वीकार कर चुके है। लेकिन इस माहौल में भी व्यापारिक संतुलन का अपना महत्व है। व्यापारिक असंतुलन को सहन करने वाला देश अपने राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित नहीं रख सकता। चीन इस दिशा में बहुत चालाकी से आगे बढ़ रहा है। वह आर्थिक और व्यापारिक क्षेत्र में अपने लक्ष्यों को हासिल कर रहा है। उसके नेता इन्हीं उद्देश्यों को लेकर भारत की यात्रा पर आते है। और सफलता के साथ वापस लौटते है। हम उसकी उदण्डता के लिए प्रभावी विरोध भी दर्ज नहीं करा पाते। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के शासन में दोनों देशों ने एक विशेष कार्यदल बनाया था। इसका उद्देश्य सीमा पर होने वाली अस्वाभाविक गतिविधियों का संज्ञान लेना था। दोनों देशों के विशेष प्रतिनिधि उसका समय रहते समाधान करते थे। लेकिन यह समझौता जारी नहीं रह सका। इसकी समाप्ति चीन के पक्ष में रही।
भारत को नीचा दिखाना फिर व्यापारिक लाभ उठाना उसकी नीति है। ब्रह्मपुत्र पर बोध, हिमालय क्षेत्र में सड़क, हैलीपैड निर्माण रोम, अरुणांचल पर दावा, नत्थीवीजा, भारत को चारों तरफ से घेरना उसकी नीति है। सीमा पर अतिक्रमण जैसे घटनाओं को चीनी सैनिक ही अंजाम देते रहे है। भारत ने कभी इस प्रकार की हरकतों पर विश्वास नहीं किया। लेकिन भारत को किसी भी दशा में कमजोर नहीं दिखना चाहिए। बेशक हम शांति-सौहार्द को महत्व दे। हम पड़ोसी देश की सीमा का अतिक्रमण नहीं करें। लेकिन इतनी हनक तो रहनी चाहिए कि दूसरा भी ऐसा करने की हिम्मत न करे। यह ठीक है कि युद्ध से समस्या का समाधान नहीं हो सकता। पाकिस्तान से कई युद्ध हुए। हजारों सैनिक शहीद हुए। अन्ततः समझौतों की मेज पर आना पड़ा। दोनों देश जहां थे, वहीं है। ऐसे में युद्ध से बचना चाहिए। चीन भी जानता है कि भारत सामजिक रूप से पहले की तरह नहीं है। यह परमाणु सम्पन्न देश है। चीन के बिल्कुल भीतर तक मार करने वाली मिसाइलें भारत के पास है। बेशक रक्षा तैयारियों में हम पीछे हैं, लेकिन शत्रुओं के मुकाबले कमजोर भी नहीं। चीन इसे समझाता है। इसलिए वह दबाव बनाने के कदम ही चलता है। लेकिन ये भी भारत के दीर्घकालिक हितों के लिए ठीक नहीं है। भारत और चीन के साथ शांतिपूर्ण संबंधों में ही भलाई है। भारत को अपनी दृढ़ता बनाए रखनी होगी। चीन के सत्तर प्रतिशत लोह अयस्क की आपूर्ति भारत से होती है। इसके बिना उसकी अर्थव्यवस्था पटरी से उतर सकती है। हम यह धौंस देने में भी संकोच करते है। चीन ने भारत के साथ विश्वासघात किया है।
यहां पुराने इतिहास के दोहराने की आवश्यकता नहीं है। चीनी प्रधानमंत्री लीकेचियांग की हालिया यात्रा पर विचार करें। प्रायः विदेश मंत्री, प्रधानमंत्री की यात्राएं पहले से निर्धारित होती है। इस बीच सामान्यतः संबंधित देशों के बीच विश्वास बनाने की तैयारी की जाती है। यह राजनायिक सभ्यता का तकाजा है। पड़ोसी है तो सीमा पर शांति रखने का कार्य अनिश्चित किया जाता है। दूतावास, विदेश विभाग के अधिकारी माहौल को तनावमुक्त बनाने का यथासंभव प्रयास करते है। इन सभ्य राजनायिक मान्यताओं की कसौटी पर चीन का आकलन कीजिए। भारत के विदेश मंत्री की चीन तथा चीनी प्रधानमंत्री की भारत यात्रा निर्धारित थी। चीन यात्रा, वार्ता और समझौते का कैसा माहौल बना रहा था। उसके सैनिक भारतीय सीमा में घुसकर तम्बू लगा रहे थे। यह दबाव की रणनीति थी। यह लाइन आॅफ एक्चुअल कन्ट्रोल की समस्या नहीं थी। यह चीन की शरारत थी। वह ऐसी हरकते समय-समय पर करता रहा है। सीमा पर उसकी तैयारियां भारत पर दबाव बनाए रखने के मद्देनजर चल रही है। गौरतलब है कि जब से भारत और चीन के बीच विभिन्न स्तरों की वार्ताओं का सिलसिला शुआ हुआ है तभी से उसने तिब्बत पर नियंत्रण तथा सीमा पर तैयारियों को अप्रत्याशित रूप से बढ़ाया है। सीमा पर हरकत के बाद वह वार्ता और समझौता करता है। इस बार भी वही हुआ। लद्दाख में हालिया घुसपैठ पर उसने भ्रम की स्थिति बनाए रखी। हमने भ्रम तोड़ने का संजीदा प्रयास नहीं किया। व्यापार, जल संसाधन, संस्कृति सहित विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग के आठ समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। इसमें कोई नई बात नहीं। व्यापार संतुलन के मामले में चीन का ही पलड़ा भारी रहेगा। भारतीय प्रधानमंत्री ने दबे स्वर में घुसपैठ का मामला उठाया। चीनी प्रधानमंत्री ने मान लिया सीमा पर समस्या है। मनमोहन सिंह ने चीन का बाजार भारत के लिए खोलने की बात की। ली काछयांग ने वादा नहीं किया। यह तरीका ही हमारी कमजोरी उजागर करता है। चीन इसका फायदा उठाता है। उसे बताना होगा कि सीमा पर घुसपैठ की हरकतंे आपसी सहयोग को प्रभावित करेगी। यदि उसने बाजार नहीं खोला तो यहां उसके लिए भी द्वार बन्द होगा। साहस दिखाईए-युद्ध की संभावना कम होती जाएगी।



स्पाट फिक्सिंग ओ यस अभी

आईपीएल के बड़े प्रायोजकों में से एक है पेप्सी, जिसके विज्ञापन की एक पंक्ति है, ओ यस अभी। 16 मई को जिस तरह आईपीएल के मैचों में कई करोड़ की सट्टेबाजी का खुलासा हुआ, उसे देखकर यही पंक्ति ध्यान आई कि बैटिंग-बालिंग बाद में कभी, स्पाट फिक्सिंग ओ यस अभी। क्रिकेट में सट्टेबाजी कोई अनोखी बात नहींहै। पिछले दो-ढाई दशकों में सट्टेबाजी के अनेक मामले सामने आ चुके हैं। कई अच्छे, बड़े और उभरते खिलाड़ियों का करियर इसके जाल में फंसने के बाद खत्म या बरबाद हो चुका है। इसके बावजूद अब क्रिकेट का शायद ही कोई मैच ऐसा होता हो, जिसमें सट्टेबाजों के प्रभाव के बिना परिणाम सामने आता हो। क्रिकेट को असंभावनाओं का खेल कहना बंद कर देना चाहिए, क्योंकि अब इसमें कुछ भी असंभव नहींहै। कोई टीम शुरू से लेकर आखिर तक बेहद बुरा खेलती है, उसकी हार लगभग तय होती है, जीतने वाली टीम के समर्थकों का रोमांच बढ़ने लगता है, कि अचानक बाजी पलटती दिखाई देती है। आखिरी दो-तीन ओवरों में कोई खिलाड़ी असाधारण प्रतिभा का परिचय देते हुए ऐसा खेल खेलता है कि हारती हुई टीम खेल जीत जाती है, और जीतने वाली टीम हार जाती है। क्रिकेटीय भाषा में उस खिलाड़ी को गेम चेंजर कहा जाता है। यह सब पर्दे पर दिखाई देता है, लेकिन पर्दे के पीछे बाजी पलटने वाला कोई और ही होता है। वो, जो खेलप्रेमियों के साथ धोखा कर रहा है और इसमें उसका साथ दे रहे हैं, जनता के चहेते क्रिकेटर। अपनी गाढ़ी कमाई से सरकार को दिए जाने वाले टैक्स और उसके बदले समुचित सुविधाएं न मिलने पर जनता को कुढ़ते, बड़बड़ाते कई बार देखा गया है। अपेक्षित सुविधाओं, संसाधनों के ना मिलने पर नाराज होना उसका हक है। यही हक उसका तब भी बनता है, जब वह सैकड़ों, हजारों रुपयों की टिकट खरीदकर मैच देखने जाती है। अपने वक्त और रुपयों के बदले उसे स्वस्थ खेल देखने मिलना चाहिए, लेकिन सट्टेबाज ऐसा नहींहोने देते। वे तय करते हैं कि कब किस ओवर में कितने रन बनने हैं, किस खिलाड़ी को अपना आसान कैच दे देना है, किसे रन आउट होना है, किसे नो बाल कर सामने वाली टीम को मैच जीतने देना है आदि, आदि। 
कुछ साल पहले जब पाकिस्तान के तीन खिलाड़ियों मोहम्मद आमिर, मोहम्मद आसिफ और सलमान बट को इंग्लैंड में स्पाट फिक्सिंग के आरोप में गिरफ्तार किया गया था, तो क्रिकेट प्रेमी स्तब्ध रह गए थे कि उनके चहेते खेल के साथ कैसा घिनौना खेल हो रहा है। स्पाट फिक्सिंग का ऐसा ही नमूना आईपीएल के मैचों में देखने मिला है। दिल्ली पुलिस पिछले कुछ समय से सट्टेबाजों और कुछ खिलाड़ियों पर निगाह रखी हुई थी, उनकी फोन टैपिंग हो रही थी, और 16 मई को राजस्थान रायल्स के तीन खिलाड़ियों एस श्रीसंत, अजीत चंदेला और अंकित चव्हाण के साथ-साथ 11 सट्टेबाजों को गिरफ्तार किया गया है। पुलिस ने इस बात का बाकायदा खुलासा किया कि किस तरह खुफिया संकेतों के जरिए स्पाट फिक्सिंग की जाती है। खिलाड़ी अपनी टी शर्ट ऊपर कर रहे हैं, घड़ी घुमा रहे हैं, तौलिया जेब से निकाल रहे हैं, क्षेत्ररक्षण के लिए मैदान सजा रहे हैं, ये तमाम क्रियाएं खेल के दौरान सहज-स्वाभाविक लगती हैं, लेकिन यह सब सट्टेबाजों के लिए खिलाड़ियों के संकेत हैं, कि अब हम आपके निर्देश के मुताबिक खेल खेलने जा रहे हैं और आप दांव लगवाना शुरु कर दें। पुलिस के मुताबिक क्रिकेट में यह गोरखधंधा बाहर बैठे किसी व्यक्ति के निर्देश पर चल रहा है, जिसके तार अंडरवर्ल्ड से जुड़े हैं। आईपीएल में बीस ओवरों के क्रिकेट, चीयर लीडर्स, फिल्म व उद्योग जगत की बड़ी हस्तियों के कारण काफी रोमांचक माहौल बना दिया गया है, लेकिन इस चमक के पीछे अपराध की घिनौनी कालिख छिपी है, जिसका आवरण हटना ही चाहिए। पुलिस ने अपनी ओर से कार्रवाई की है, लेकिन यह वक्त सरकार की ओर से सख्ती दिखाने का भी है। अंडरवर्ल्ड और काले धन के कारोबारी आईपीएल के रूप में परोक्ष धंधा चला रहे हैं। जिन राज्यों में आईपीएल के मैच होते हैं, वहां की सरकारों और केंद्र सरकार को विचार करना चाहिए कि आईपीएल को किस हद तक सहयोग या बढ़ावा दिया जाए। यही बात उन राजनीतिक व्यक्तियों पर भी लागू होती है, जो क्रिकेट की राजनीति में सक्रिय हैं। आईपीएल की यह नदी आखिर तो अंडरवर्ल्ड के समुद्र में ही जाकर मिल रही है, तब क्या उसमें हाथ धोना सही है।



वायदे और हकीकत

लगता है कि चीन के प्रधानमंत्री ली केकियांग महज नब्ज टटोलने के इरादे से यहां आए हैं। ली की यात्रा को उनका देश ऐसे प्रचारित कर रहा था मानो वह रिश्तों का नया आयाम रचने की तैयारी में हो। लेकिन जब दोनों प्रधानमंत्री दुनिया के सामने बातचीत का ब्योरा लेकर आए तब इनमें सपाट बयानबाजी से अधिक कुछ नजर नहीं आया। बेशक, चंद समझौतों पर हस्ताक्षर हुए और दुनिया की दो सबसे बड़ी आबादियों को नेतृत्व देने वाले दोनों राजनेताओं ने शांति और सद्भाव के रास्ते विकास के वायदे भी दोहराए। लेकिन इस अत्यंत महत्त्वपूर्ण मुलाकात का लंबित विवादों के संदर्भ में नतीजा क्या रहा? क्या हम चीन को सहमत कर पाए कि सीमा विवाद को समयसीमा में बांधते हुए इसका स्थायी समाधान निकालने की गंभीर पहल की जाए? क्या हमारे पड़ोसी को घुसपैठ की गलती समझ में आई? प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने तो जरूर कहा कि इस घटना से दोनों देशों ने सबक ली है और पुनरावृत्ति न हो इसके लिए विशेष प्रतिनिधि स्तरीय वार्ता पर सहमति बनी है। लेकिन ऐसी सहमतियां तो पहले भी बनीं थीं और समाधान के तरीके भी निकाल लिए गए थे। फिर वे क्यों फेल हो गए और नया तरीका सफल रहेगा, इसकी क्या गारंटी है? हर बार की तरह इस बार भी चीन की तरफ से सीमा विवाद को ऐसी ऐतिहासिक समस्या बता दिया गया, जिसका हल निकालना मानो किसी तिलस्मी किले को फतह करना जैसा पेचीदा है। संतोष इस बात का है कि मनमोहन सिंह ने सपाट तरीके से चीन को भारत की चिंताओं से अवगत करा दिया है। मामला सिर्फ सीमा का ही नहीं है। चीन ब्रह्मपुत्र नदी को बांध कर भारत के बड़े हिस्से में तबाही का इंतजाम कर रहा है। भारत बार-बार चीन से अपनी चिंता के निराकरण की मांग कर रहा है। भारत का कहना है कि दोनों देशों के विशेषज्ञ नदी को बांधने और इससे पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों का मिलजुल कर अध्ययन करें। मनमोहन सिंह ने प्रेस-कांफ्रेंस में इसका जिक्र जोर-शोर से किया। लेकिन ली के जवाब हमारी चिंता का निराकरण नहीं कर पाए। चीन की नीयत की यह अग्निपरीक्षा है। हमें भी इस सिलसिले में दूसरे विकल्पों को गंभीरता से ढूंढना चाहिए। तीसरा गंभीर मामला सीमा पर हमारी रक्षा तैयारियों का है। चीन डेढ़ दशक से सीमा पर सड़कों, रेल और एयरपोर्ट के जाल बिछा रहा है। अपने सैनिकों और भारी हथियारों को वह पलक झपकते हमारी सीमा तक पहुंचा सकता है। जब हमने जवाबी तैयारी शुरू की है, तब वह आंखें तरेर रहा है। इस संवेदनशील मसले पर भी हमें चीन से प्रत्युत्तर की आशा थी, जो निराशा में बदल गई। हमें उम्मीद थी कि चीन का नया नेतृत्व भारत से रिश्ते सुधारने में साहसिक फैसले लेगा और हमारे जायज हितों के प्रति गंभीर दिखेगा। तब क्या केवल चीन के आर्थिक हित ली की इस यात्रा के सबब हैं? चीन की आर्थिक रफ्तार में मंदी के संकेत दिखने लगे हैं और वह शिद्दत से बड़े बाजारों की तलाश में है। वह जोर-शोर से भारत में संभावनाएं टटोल रहा है और हमारा दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार बनने में सफल भी रहा है। लेकिन पिछले साल की तुलना में यह भागीदारी भी झटके खा रही है क्योंकि इसमें भी मलाई तो चीन के हिस्से जा रही है और भारत भारी घाटा उठाने को मजबूर है। यहां भी ली हमारी चिंता दूर नहीं कर पाए।



किस पर करें विश्वास 

एक वक्त था जब कहा जाता था आप विश्वास करें यह अवश्य हो जायेगा और लोग एक दुसरे की जुबान पर विश्वास  करते थे, वक्त बदलता गया जुबान के बाद लिखा पढ़ी का जमाना आ गया और लोग कहने लगे हमने लिख दिया यह ब्रह्म सत्य है। समय फिर बदला और स्टाम्प पेपर का जमाना आ गया, रेवन्यू टिकट का जमाना आ गया, लेकिन तेलगी कांड ने स्टाम्प को भी जली करार दिया और अब जाली नोट ने रिज़र्व बैंक के गवर्नर  के हस्ताक्षेर पर भी प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। एक वक्त था जब लोग कहते थे यह कागज का टुकड़ा नही सौ के नोट हैं , इसपर रिज़र्व बैंक के गवर्नर के हस्ताक्षर है लेकिन आज हज़ार का नोट भी आपके पाकिट में क्यों न हो हमेशा खतरा बना रहता है की कब कौन कह देगा भाई यह नोट सिर्फ कागज का टुकड़ा है , क्यों की यह नकली  है। 

क्या हो रहा है हमारे इस महान देश में आज विश्वास क्यों खंडित होता जा रहा है आज भाई को भाई पर विश्वास नही रहा, गुरु को शिष्य पर शिष्य को गुरु पर विश्वास नही रहा है। सत्ता पक्ष को विपक्ष पर विपक्ष को सत्ता पक्ष पर विश्वास की बात तो दूर आज एक सहयोगी दल को दुसरे सहयोगी दल पर विश्वास नही रहा। रोगी को चिकित्सको पर ,चिकित्सकों को रोगी पर विश्वास नही रहा, एक ऐसा वातावरण जिसमे कहा जाये की लोगो को अपने आप पर विश्वास नही रहा तो अनुचित नही होगा। विश्वास करने का अर्थ आज के समय में सिर्फ धोखा मन जाने लगा है जबकि उसी देस में विश्वास के खातिर लोग जान दे देते थे, लेकिन विश्वास भंग नही होने देते, इसके एक नही अनेको उदाहरण हैं। भारत  आज आर्थिक रूप से विकशित राष्ट्र की श्रेणी में पहुच चूका है। अन्तराष्ट्रीय स्तर पर भारत ने अपना झंडा लहराया है। परमाणु करार के मुद्दे पर भी भारत की छवि राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय स्तर अच्छी बनी है लेकिन इस अवधि में हमने क्या कुछ ही खोया यह भी एक मुद्दा  है। संसद के अंदर और संसद के बाहर सत्ता पक्ष और विपक्ष ने जो तश्वीर पेश की वह भारतीय इतिहास के लिए कला अध्याय की कहा जा सकता है। 
सरकार बनती है गिरती है, कई मुद्दे उठाये जाते लेकिन  संसद में पास नही होते, कई कानून आज भी ऐसे हैं जो अब तक विरोध के कारन संसद में पास नही हो सके हैं लेकिन जिस तरह से परमाणु करार के मुद्दे पर संसद के अंदर और बाहर खेल खेला गया उसे शर्मनाक ही कहा जा सकता है।
सरकार बनती है गिरती है, कई मुद्दे उठाये जाते लेकिन  संसद में पास नही होते, कई कानून आज भी ऐसे हैं जो अब तक विरोध के कारन संसद में पास नही हो सके हैं लेकिन जिस तरह से परमाणु करार के मुद्दे पर संसद के अंदर और बाहर खेल खेला गया उसे शर्मनाक ही कहा जा सकता है।
सत्य क्या है, झूट क्या है यह तो संसद की जाँच कमिटी तय करेगी लेकिन संसद को जिस प्रकार मछली बाज़ार से भी बदतर हालत में माननीय सांसदों ने पहुचाया उसे देखकर एक नौ वर्षीय चतुर्थ वर्ग के बच्चे ने कहा की क्या यही लोग हमारे संबिधान के रक्षक हैं जिन्हें खुद पता नही कि संबिधान के तहत उन्हें क्या आचरण अपनाना चाहिए।
माननीय न्यायालय नें जिस प्रकार कहा है कि इस देश को भगवन चला रहा है और दुसरे न्यायाधीस ने कहा कि बगैर हांके यहाँ की सरकार नही चल सकती यह उसी अविश्वास का प्रतीक है। अगर हमारी सरकार चाहती है कि भारत महान राष्ट बने तो सबसे पहले हमें अपने खोये नैतिकता की खोज करनी होगी, विश्वास जागृत करना होगा अन्यथा सच में  इस देश का मालिक भगवन ही है। 


आखिर समाज कहाँ जा रहा है

शायद ही ऐसा कोई दिन हो जब अखबार और न्यूज़ चैनलों में दुष्कर्म या छेड़खानी की कोई घटना न हो !आखिर ऐसा क्यूँ हो रहा है ? दिल्ली के उस आंदोलन के बाद भी ये घटनाये रुक क्यूँ नही रही है? आखिर समाज कहाँ जा रहा है?कहीं ये वो तथाकथित विनाश की शुरुआत तो नहीं है जिसका जिक्र माया सभ्यता में किया गया है क्यूंकि मानवीय मूल्य समाप्त हो रहे है ..ये विनाश ही है शायद ?यदि मानवता ही नहीं रहेगी तो क्या मानव जाति का कोई औचित्य है?अगर हमारी किसी प्यारी चीज को कोई छुए तो हमे बुरा लगता है फिर चाहे वो “कोई” अपना करीबी ही क्यूँ न हो..फिर हम किसी इंसान को उसकी मर्ज़ी के बगैर कैसे छु सकते है या कोई अशोभनीय हरकतें कर सकते है ?अक्सर हमे ये सुनने में आता है कि आजकल के बच्चे टीवी देख-देख के बिगड़ गए है!…बहुत आम जुमला है जो लगभग हर बड़े के मुह पर रखा होता है और हम बड़े भी खुद ये जुमले अपने बड़ो से सुनकर बड़े हुए है! क्या हमारे दिमाग में कभी ये प्रश्न आया की ये जुमला क्या वाक़ई सच है? क्या वाक़ई टीवी बच्चो को बिगाड़ता है? अगर हाँ तो इस टीवी को कौन बिगाड़ता है ?तुरंत जो दिमाग में सबसे पहली बात आती है वो ये की इस टीवी को हम बड़े ही बिगाड़ रहे है !बच्चे तो वही देखेंगे जो हम दिखायेंगे ! तो गलती किसकी है ?टीवी की?बच्चो की?या हमारे जैसे कुछ बड़ो की? कोई भी समझदार व्यक्ति यही कहेगा की गलती बड़ो की है ! बच्चे बचपन से लेके किशोरावस्था तक बस यही देख रहे है की स्त्री एक वस्तु है इससे अधिक कुछ नहीं फिर चाहे वो किसी अन्तःवस्त्र का प्रचार हो या डियो का! एक डियो के प्रचार के मुताबिक अगर आप उनकी कंपनी का डियो प्रयोग करते है तो आप चन्दन की लकड़ी बन जाते है और तुरंत ही युवतियां सांप की तरह आपसे लिपटने लगती है और न जाने क्या क्या! इस तरह के कुछ और विज्ञापन और आज का सिनेमा महिलाओ के इस वस्तुकरण से भरा हुआ है और जब कोई बच्चा बचपन से ही महिलाओ को उपभोग की वस्तु के रूप में देख कर बड़ा होता है तो उसके मन में उपभोग की लालसा भी आएगी और ये प्राकृतिक है जैसे जब हम किसी वस्तु का प्रचार देखते है तो उसे प्राप्त करने की इच्छा प्रबल हो जाती है !टीवी हमारे समाज का आइना होता है अब आइने में हम जैसे चित्र दिखायेंगे बच्चे उन्हें ही सच मानेगे ! अब अकसर इस मुद्दे पर बहस होने पर ये बात सामने आती है की इस तरह के कुक्र्त्य करते वक़्त हम स्त्रियों को इंसान क्यूँ नहीं समझते ?तो बात ये है की इंसान समझे तो कैसे? आपने शुरुआत से ही उसे वस्तु बनाया हुआ है और वस्तुओ के उपयोग के पहले क्या हम उनकी मर्ज़ी पूछते है, कि डियो जी आप हमे महकाना चाहते है या नहीं ?नहीं पूछते बस उठाया और इस्तेमाल कर लोया तो उसी तरह महिलाओ की मर्ज़ी मायने ही नहीं रखती ऐसे लोगो के लिए ?महिला सुरक्षा के लिए कड़े कानून बन रहे है जो बिलकुल सही है पर क्या ये कड़े कानून बच्चो के मन में नैतिकता या स्त्रियों के लिए सम्मान पैदा कर सकते है ?जवाब है बिलकुल भी नहीं ! अक्सर कुछ लोग लडकियों के कपड़ो की दोष देते है पर प्रश्न से है की तब ३ साल,५ साल की अबोध बच्ची और ६० साल की वृद्ध महिला वाले केस में हम क्या कहेंगे? मतलब साफ़ है की यहाँ बात बस नैतिकता की है ,मानवीय मूल्यों की है! जिन्हों ने अपराध किया है वो सजा के हक़दार है और कानून उन्हें सजा देगा भी पर क्या सजा देने से बात ख़त्म हो जाती है ?क्या सज़ा देने महिलाओ को सम्मान मिलने लगेगा जिसकी वो हकदार है?महिला सशक्तिकरण हो जायेगा?महत्वपूर्ण बात है की ऐसी घटनाये हो ही न !मुद्दे की बात ये है की हम आने वाले युवा समाज को नैतिकतापूर्ण देखना चाहते है या नहीं?और हमे ये जानते है की दोषी कहीं न कहीं हम भी है !हम स्कूल में सेक्स शिक्षा पाठ्यक्रम में शामिल कर भी लेंगे तो क्या इससे नैतिकता बढ़ेगी?ताज़ा घटनाये जो अनैतिकता का परिचय देती है वो सधे तौर पर महिलाओ के वस्तुकरण से जुडी है जो बच्चो युवाओ तक सिनेमा और टीवी पहुचा रहा है!ये ही इसतरह के अपराधो की जड़ है..और अगर अपराध के इस वृक्ष का समूल विनाश करना है तो हमे इसकी जड़ महिला वस्तुकरण को नष्ट करना होगा, आवाज़ उठानी होगी और हम ये कर सकते है इस तरह की सिनेमा या विज्ञापनों को न देखे न खरीदे ये इतना मुश्किल नहीं है !जितना ज़रूरी बच्चो को नैतिकता की शिक्षा देना है उतना ही ज़रूरी इस वस्तुकरण को बंद करना है !हम कहते है की आजकल बड़ी अश्लील फिल्मे बनती है मगर हमे समझना होगा की वो दिखा रहे है इसलिए हम नहीं देख रहे बल्किल हम देख रहे है इसलिए वो दिखा रहे है !इस लिए बात बस इतनी है की कल के आने वाले समाज को सुधारने के लिए हमे आज को सुधारना होगा !हमे खुद सुधारना होगा !ये बिलकुल  भी मुश्किल नहीं बस थोड़ी प्रतिबद्धता की ज़रूरत है और हमे ये करना होगा क्यूंकि आने वाले समाज की ज़िम्मेदारी हमपर है !आगे के समाज को सुरक्षित और रहने लायक बनाना हमारा कर्तव्य है! आखिर बात हमारे और आपके अपने बच्चो की है!उनके खुशहाल और भयमुक्त जीवन की है जो वो हमसे उम्मीद करते है !

 आखिर बदलाव हो तो कैसे???क्या सरकार जो नए कानून के लिए बधाई की पात्र है मगर उसे इन बातो पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है ??क्या हमारे टीवी और सिनेमा पर कुछ लगाम नहीं कसनी चहिये?और सबसे बड़ा प्रश्न क्या सरकार चुनने के बाद हमारी ज़िम्मेदारी समाप्त हो जाती है?क्या समाज़ को अछ्हा बनाए की जिम्मेदारी बस सरकार की है?



चीन की भारतीय सीमा में घुसपैठ 

चीन की सेना पिछले दिनों जम्मू कश्मीर में लद्दाख के दौलत बेग ओल्डी में दस किलोमीटर भारतीय सीमा के अन्दर घुस आई और उसने वहाँ तम्बू लगा कर अपनी एक चौकी स्थापित कर ली । इस क्षेत्र में उसने अक्साई चिन क्षेत्र पर १९५० के आस पास ही क़ब्ज़ा कर लिया था , लेकिन तब भी भारत सरकार ने चीन की इस हरकत को गम्भीरता से नहीं लिया था और चीन से मैत्री बढ़ाने के अपने प्रयास निरन्तर जारी रखे थे । लेकिन आख़िर देश में इस बात की चर्चा तो हो ही रही थी कि चीन ने भारत के अक्साई चिन क्षेत्र पर क़ब्ज़ा कर लिया है और भारत सरकार क्या कर रही है ? उस समय के प्रधानमंत्री ने देश के लोगों को समझाने की कोशिश की थी कि उन्हें इस मामूली घटना पर बहुत ज़्यादा उत्तेजित नहीं होना चाहिये , क्योंकि जिस ज़मीन पर चीन ने क़ब्ज़ा किया है , वहाँ घास का तिनका तक नहीं उगता । कम्युनिस्ट पार्टी थोड़ा इससे भी आगे गई । उसने कहा , यह क्षेत्र ही चीन का है , इसलिये लोगों को उत्तेजित होने की ज़रुरत नहीं है । चुनांचे दोनों ने देश को यह समझाने की कोशिश की , कि चीन से मैत्री ज़्यादा ज़रुरी है , इसलिये इन छोटी मोटी घटनाओं को नज़रअन्दाज़ कर देना चाहिये । लेकिन सरदार पटेल , संसार त्यागने से पहले नेहरु को भी और देशवासियों को भी बता गये थे कि चीन पर विश्वास करना उचित नहीं होगा ़ वह समय पाकर भारत पर आक्रमण करेगा । साम्यवादियों को कुछ समझाने की ज़रुरत ही नहीं थी क्योंकि उनकी दृष्टि में तो सरदार पटेल प्रतिक्रियावादी और पूँजीपतियों के एजेंट थे । नेहरु पर सरदार पटेल के समझाने का कोई असर नहीं होने वाला था , क्योंकि वे ज़िन्दा पटेल को ही इन मामलों में दख़लन्दाज़ी का अधिकार देने को तैयार नहीं थे , उनके मरने के बाद उनकी सलाह मानेंगे , यह आशा करना व्यर्थ ही था । उसका जो परिणाम निकल सकता था वही निकला । १९६२ में चीन ने भारत पर हमला कर दिया और बहुत सा इलाक़ा जीत कर अपने क़ब्ज़े में कर लिया । अलबत्ता स्टैंड चीन का तब भी वही था और अब २०१३ में भी वही है कि भारत और तिब्बत के बीच सीमा का निर्धारण अभी नहीं हुआ है । भारत का उस समय यह कहना था कि मैकमोहन रेखा से सीमा निर्धारण हो चुका है । चीन उस समय भी और अब भी भारत तिब्बत सीमा को भारत चीन सीमा कहता है । उसने १९५० में ही तिब्बत पर क़ब्ज़ा कर लिया था । पटेल ने उस समय भी नेहरु को लिखा था कि तिब्बत की सहायता करनी चाहिये क्योंकि यदि चीन ने तिब्बत पर क़ब्ज़ा कर लिया तो वह हमारा पड़ोसी बन जायेगा । चीन जैसे देश के पड़ोसी बन जाने का क्या परिणाम होता है , यह हम १९६२ से अब तक भोग ही रहे हैं ।

चीन ने आज पहली बार भारत की सीमा का अतिक्रमण किया हो , ऐसा नहीं है । अरुणाचल प्रदेश में तो वह , वहाँ के दिवंगत मुख्यमंत्री दोर्जी खांडू के अनुसार साल में सैकडों बार चीन सीमा का अतिक्रमण करता है । लद्दाख में पिछले कुछ अरसे से वह सक्रिय हुआ है । अग्रिम क्षेत्रों में वह सड़क बना रहे मज़दूरों को पीटता है । वहाँ किसी प्रकार का विकास कार्य नहीं होने देता । मीडिया और राज्य सरकार जब केन्द्र सरकार का इस ओर ध्यान आकर्षित करती है तो केन्द्र सरकार का यही कहना होता है कि यह स्थानीय मामला है , इसको तूल देने की ज़रुरत नहीं है ।

लेकिन इस बार स्थिति में एक परिवर्तन देखा जा सकता है । अब भारत सरकार ने भी वही भाषा बोलनी शुरु कर दी है , जो चीन बोलता है । विदेशमंत्री सलमान ख़ुर्शीद आलम ने भी कहा है कि दोनों देशों के बीच सीमा निर्धारण नहीं हुआ है , इस लिये कई बार भ्रम हो जाता है । अब ख़ुर्शीद साहिब से कोई पूछे कि भारतीय सेना को तो कभी भ्रम नहीं होता , बार बार चीन की सेना को ही भ्रम क्यों होता है । और भी , यह सफ़ाई तो चीन के विदेशमंत्री को देनी चाहिये , आप किस ख़ुशी में यह सफ़ाई दे रहे हैं ? आप विदेश मंत्री भारत के हैं , और सफ़ाई चीन की दे रहे हैं । लेकिन चीन ने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी । उसने कहा कि उसकी सेना को कोई भ्रम नहीं हुआ है । यानि चीन पूरी योजना और लम्बी रणनीति के तहत दौलत बेग ओल्डी में आया है । इतना ही नहीं बल्कि उसने उस क्षेत्र में दो दिन पहले भारत की वायु सीमा का भी उल्लंघन करके अपने भविष्य के इरादे भी साफ़ कर दिये हैं । जिस तरह पिछले कुछ अरसे से चीन ने सभी प्रमुख राजनैतिक पार्टियों के प्रतिनिधि बीजिंग बुलाने शुरु किये थे और उन प्रतिनिधि मंडलों के सदस्यों ने वापिस आकर चीन की प्रगति का आल्हा ऊदल गा गाकर देश में चीन का आतंक ज़माने का प्रयास शुरु कर दिया था , उससे ही चीन की रणनीति समझने वालों को अंदेशा होने लगा था । दिल्ली में दक्षिण ब्लाक में जब चीन की मैत्री भारत के लिये कितनी ज़रुरी है और उसके लिये क्या क्या प्रयास किये जाने चाहिये , इसकी धुन बजनी शुरु हो जाये , जो पिछले कुछ अरसे से बाकायदा बज रही थी , तो समझ में आ जाना चाहिये था कि चीन कुछ शरारत करने बाला है । १९६२ में उस समय के रक्षा मंत्री कृष्णा मेनन और बीजिंग में भारत के राजदूत सरदार के एम पणिक्कर इसी प्रकार की हरकतें करते देखे गये थे और चीन ने हमला कर दिया था ।

लद्दाख में भारत के भीतर आकर चीन की मुक्ति सेना द्वारा अपनी चौकी स्थापित कर लेने की घटना से दो प्रश्न उत्पन्न होते हैं । पहला यह की क्या भारत की सेना चीन को वह चौकी हटा लेने के लिये विवश करने में सक्षम है ? यदि है तो यह प्रसन्नता की बात है और उसे उसके लिये सभी राजनैतिक व कूटनीतिज्ञ प्रयास कर लेने चाहिये । उन में एक महत्वपूर्ण तरीक़ा सलमान ख़ुर्शीद की चीन यात्रा रद्द करना भी हो सकता है । चीन के प्रधानमंत्री भी भारत में सद्भावना यात्रा पर आने वाले हैं । यह भी हो सकता है कि चीन सरकार ने भारतीय सीमा के भीतर जन मुक्ति सेना भेजने के लिये समय का चयन अपने प्रधानमंत्री की भारत यात्रा को ध्यान में रखकर ही चुना हो । भारत से सद्भावना बढ़ाने का यह चीन का पुराना तरीक़ा है । और भारत ने कभी इस पर आपत्ति भी नहीं की । लेकिन भारत सरकार को इस बार इस चीनी तरीक़े पर आपत्ति दर्ज करवानी चाहिये और चीनी प्रधानमंत्री की यात्रा स्थगित कर देनी चाहिये ।

लेकिन इस घटना से जुड़ा दूसरा प्रश्न ज़्यादा महत्वपूर्ण है । क्या भारत की सेना चीनी सेना की इस प्रकार की आक्रामक गतिविधियाँ रोकने में सक्षम नहीं है ? यदि इस प्रश्न का उत्तर हाँ में है तो यह सचमुच चिन्ता का विषय है । ख़ासकर तब जब १९६२ में चीन ने सीमा को लेकर अपने इरादे ही नहीं बल्कि अपने तरीक़ों की भी सार्वजनिक रुप से घोषणा कर दी थी । तब भी भारत सरकार ने चीन का सामना करने के लिये तैयारी क्यों नहीं की ? चीन ने गोर्मों से लेकर ल्हासा तक रेलमार्ग का निर्माण कर लिया और दिल्ली अभी भी हिमाचल से होते हुये लेह तक रेलमार्ग बनाने में हिचकचाहट दिखा रही है । चीन वह रेलमार्ग भारत की सीमा तक ला रहा है और भारत सरकार पिछले दस साल में भी तेज़पुर से तवांग तक के सड़क मार्ग को चौड़ा नहीं कर सकी । यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि देश के प्रति आपराधिक लापरवाही है । इसका उत्तर सरकार को हर हालत में देना होगा । दौलत बेग ओल्डी ने यह प्रश्न उठा दिया है । इसका उत्तर दिये बिना बचा नहीं जा सकता । यह उत्तर उन को तो अवश्य देना होगा जो कल तक दक्षिण ब्लाक में बैठ कर सरकारी खर्चे पर पंचशील की जयन्तियां मना रहे थे चीन की दोस्ती के नाम पर जाम छलका रहे थे । भारत की सेना भी दौलत बेग ओल्डी में चीन की सेना के सामने आ डटी है । लेकिन इस यक्ष प्रश्न का उत्तर दिये बिना सत्ता की गद्दी पर बैठे कर्णधार अब की बार पानी नहीं पी सकेंगे । यह प्रश्न राजनीति का नहीं बल्कि देश की सुरक्षा का है । सरकार को भी इसे राष्ट्रीय समस्या मान कर सभी को विश्वास में लेकर रणनीति बनानी चाहिये । चीन का इतिहास गवाह है कि वह शक्ति की ही भाषा समझता है । दिल्ली को भी इस भाषा का अभ्यास कर लेना चाहिये ।



पत्रकारिता के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य हेतु ललित सुमन को मिला गौरव अवार्ड-2012। हिन्दी पत्राकारिता व निर्भीक, निष्पक्ष प्रकाशन के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर ललित सुमन का नाम आज सम्मान पूर्वक लिया जाता है। दैनिक इंडिया दर्पण समाचार पत्र, मदर इंडिया पत्रिका, डी.आई.डी टी.वी डॉट इन व जी आई एल टी.वी डॉट इन ग्रूप के प्रधान संपादक ललित सुमन को अब तक पत्राकारिता के क्षेत्र में निर्मीक व निष्पक्ष पत्राकारिता के लिए अनेक बार सम्मानित किया जा चुका है। इसी कड़ी में हिमालय और हिन्दुस्तान फाउंडेशन व न्यूज पेपर्स एण्ड मैगजीन फैडरेशन ऑफ़ इंडिया के राष्ट्रपति अध्यक्ष डा रवि रस्तोगी ने हृषिकेश, देहरादूनद्ध उत्तराखंड में आयोजित 9वें राष्ट्रीय ज्योतिष-आयुष, प्राकृतिक चिकित्सा-मीडिया महासम्मेलन एवं सम्मान समारोह-2012 के अवसर पर ललित सुमन को हिमालय और हिन्दुस्तान गौरव एवार्ड-2012 सम्मान से अलंकृत किया गया। आल इंडिया स्माल एण्ड मीडियम न्यूज पेपर्स फेडरेशन के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष व लापा मीडिया ग्रूप के ग्रूप एडीटर ललित सुमन ने हिमालय और हिन्दुस्तान फाउन्डेशन के निदेशक को यह आवार्ड प्रदान करने के लिए धन्यवाद देते हुए कहा है कि आप धन्यवाद के पात्र हैं क्योंकि एक फेडरेशन दूसरे फेडरेशन को अपना प्रतिद्वन्दी मानता है लेकिन आपने मानवता का जो उत्कृष्ट उदाहरण कि प्रस्तुत है इसके लिए हम दिल से आपका आभार व्यक्त करते हैं। आज से पैंतीस वर्ष पहले हमने जब पत्राकारिता के क्षेत्र में पहला कदम रखा था उस वक्त हमारी यही इच्छा थी कि हम निर्भीक व निष्पक्ष होकर सत्यमेव जयते लिख सके। अपने पत्राकारिता के इन 35 वर्षों में हमने कई उतार चढ़ाव देखें हैं लेकिन आज भी हमारा यही प्रयास है कि सत्यमेव जयते ही कलम लिखे। जिन-जिन महानुभावों ने अब तक कलम के इस सिपाही को प्यार व स्नेह के साथ सम्मान दिया है उनका हम आभारी ह और जिन लोगों ने कलम पर प्रहार कर सत्यमेव जयते के रास्ते में बाध उत्पन्न किया उन सभी को हम दिल से सम्मान करते हैं। क्योंकि हमें उस विरोध व प्रहार से आत्मज्ञान हुआ और स्वामी विवेकनंद की वह पंक्ति बार-बार मेरे दिल व दिमाग में कौंध, हर काम को तीन अवस्थाओं से गुजरना पड़ता है, उपहास, विरोध् व स्वीकृति । साथ ही उनका यह कथन पवित्राता, धैर्य और कोशिश के द्वारा सारी बाधाएँ दूर हो जाती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि सभी महान कामों को पूरा होने में वक्त तो लगता ही है।


उल्टी पड़ी चाल

 अफगानिस्तान को निशाना बना कर चली गई पाकिस्तान की हर चाल उल्टी पड़ने लगी है। उसने अगर सोचा होगा कि अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति और बेहद लोकप्रिय नेता बुहरानुद्दीन रब्बानी की हत्या करवा कर वह अफगानिस्तान में दहशत भर देगा और उसे तालिबान आतंकियों को सत्ता में हिस्सेदारी देने के लिए मजबूर कर देगा तो वह साजिश उसे दगा दे गई लगती है। अफगानिस्तान ने इस हत्या का सीध दोष पाकिस्तान पर मढ़ते हुए कहा है कि यह साजिश उसके क्वेटा शहर में रची गई। इसके साथ ही अफगानी राष्ट्रपति हामिद करजई ने घोषणा कर दी है कि उनकी सरकार अब तालिबानियों से कोई बात नहीं करेगी। करजई की दूसरी घोषणा तो पाकिस्तान का सीना ही चाक कर देगी जिसमें कहा गया है कि अफगानिस्तान अपने भविष्य के पुनर्निर्माण में भारत, अमेरिका और ‘नाटो’ देशों को ही साझीदार बनाएगा। करजई की यह घोषणा पाकिस्तान के उन इरादों पर पानी फेरने वाली है जिसमें वह चीन की मदद से अमेरिका को अफगानिस्तान से बेदखल की साजिश रच रहा था और हक्कानी जैसे आतंकियों को वहां की सत्ता का दावेदार बना रहा था। अब हालात हैं कि पाकिस्तान ने अमेरिका से खुली दुश्मनी मोल ले ली है जिसका खामियाजा उसे आज नहीं तो कल चुकाना ही है। अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने फिर चेताया है कि पड़ोस को काटने के लिए पाकिस्तान ने जो आतंकी ‘भेडि़ये’ पाल रखे हैं उन्हें वश में रखे। जाहिर है कि अमेरिका हक्कानी सहित तमाम आतंकी गुटों के सफाए से कम पर मानने वाला नहीं। आश्चर्य है कि पाकिस्तान अभी भी हालात की गंभीरता को समझने के लिए तैयार नहीं है।
अभी पिछले दिनों वहां सरकार और राजनीतिक पार्टियों की सेना के साथ घंटों बैठक चली लेकिन इसमें भी अमेरिका को बंदरघुड़कियां देने और ‘अपने लोगों’ यानी आतंकियों से दोस्ती बनाए रखने के फैसले ही लिए गए। पाकिस्तान का यह चेहरा देख लेने के बाद अफगानिस्तान ने तय कर लिया है कि वह अपना पहला सामरिक साझीदार भारत को बनाएगा और इसके लिए करजई यहां आकर एक ऐतिहासिक संधि की घोषणा करने वाले हैं। आतंकियों ने इस खूबसूरत देश को तहस-नहस कर दिया है और इसे तमाम क्षेत्रों में पुनर्निर्माण की जरूरत है। पाकिस्तान की शह पर आतंकियों के निशाने पर होने के बावजूद भारत वहां सड़क, अस्पताल जैसी बुनियादी सुविधओं के निर्माण में लगा हुआ है। भारत की दिलेरी और दरियादिली ने अफगानियों का दिल जीत रखा है। उसकी आज की पहली जरूरत है देश में कानून का राज्य स्थापित करना। अफगानिस्तान को न केवल सेना बल्कि आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था को भी चुस्त दुरूस्त करना है। इसमें सबसे बड़ी सहायता उसे भारत से ही मिल रही है जिसके प्रशिक्षण स्कूलों में इन दिनों अपफगानी ट्रेनी बढ़ते ही जा रहे हैं। भारत की मदद से अफगानिस्तान भविष्य की चुनौतियों से निबटने की तैयारी में जुटा हुआ है।



समझनी होगी चीन की चाल

 हाल के वर्षो में भारत ने जिस तरह से अपना रक्षातंत्रा मजबूत किया है, और साथ ही तमाम अंतरराष्ट्रीय मामलों-मंचों पर महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है, उससे सही मायने में कोई हैरतजदा है, तो वह है चीन! यही कारण है कि हमारे इस बड़े पड़ोसी ने भारत के साथ द्विपक्षीय सम्बंधें को खासी अहमियत दी है तथा ब्राजील, रूस जैसे देशों के साथ भारत को मिलाते हुए ‘ब्रिक’ जैसा ताकतवर संगठन खड़ा किया जिसमें अब दक्षिण अप्रफीका भी है। परंतु हकीकत यह भी है कि मार्क्सवाद की नई व्याख्या के साथ अर्थ जगत से आकाश तक निरंतर तरक्की की ओर बढ़ता चीन अमेरिका की बनिस्वत भारत की सामथ्र्य से कहीं अध्कि सशंकित है। इसी से वह बीच-बीच में ‘ऐसा वैसा’ कुछ करते हुए कोई मौका नहीं बनने देना चाहता कि भारत अपना ध्यान एक बिंदु पर केंद्रित कर अपनी शक्ति को रक्षा से लेकर आर्थिक क्षेत्र तक में कहीं दुर्जेय बना सके। अलबत्ता, उसकी नीति लगातार ऐसी रहती है कि भारत किसी दिशा में एक कदम आगे निकल जाये तो उसे दूसरी ओर दो कदम पीछे लौटना पड़े। सीमा पर सैन्य ढांचे में बढ़ोतरी का उसका कदम ऐसा ही है। पिछले हफ्रते दक्षिणी चीन सागर में भारत की वियतनाम के साथ बढ़ी गतिविधियो के बाद स्वयं को ‘पिछड़ा’ महसूस कर रहे चीन ने पहले तो हमें ‘अलार्म’ किया। मगर जब भारत ने अंतरराष्ट्रीय कानूनों व संधियो के हवाले से टका सा जवाब दे दिया तो उसे मन मसोस कर रह जाना पड़ा। वियतनाम के साथ दक्षिणी चीन सागर में भारत की गतिविधियो पर आपत्ति कर चीन ‘अपनी सीमाओं’ का अतिक्रमण कर भी रहा था। इसी कारण उसको कोई समर्थक नहीं मिला। चीन स्वार्थां के तईं पाकिस्तान को सीधे वित्तीय मदद से लेकर रक्षा क्षेत्र तक में सहयोग करते हुए हर तरह से साधने की कोशिश में है लेकिन खुद पाकिस्तान अभी पूरी तरह से उसको बहुत भरोसे वाला नहीं देख रहा है। इसकी एक वजह शायद पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था का बहुत हद तक अमेरिका आधरित होना है जिसकी तुलना में उसे चीन की अभी तक की प्रत्यक्ष मदद कहीं नहीं ठहरती।
उध्र हक्कानी नेटवर्क के बारे में हालिया खुलासों के बाद पाकिस्तान-अमेरिका में उभरी तल्खी बढ़ती जा रही है। इन ‘फेवरेबुल’ स्थितियों के बावजूद भारत को चीन से लगातार सतर्क रहने की जरूरत है। पास्परिक कारोबार से लेकर किसी मामले में हमें उस पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं करना है क्योंकि उसकी सबसे पैनी नजर हमारे अर्थ तंत्रा पर है। यों, चीन की हिम्मत अब भारत पर सीधे हमला कर देने की नहीं है। इसका कारण हमारी रक्षा शक्ति का बढ़ना और तैयारियां ही नहीं हैं, वैश्विक आधर पा चुके अंतरराष्ट्रीय कारोबारी सम्बंध् भी इसके लिए सुरक्षा कवच बनाते हैं। इसीलिए वह हमें उलझाने और उलझावे में रखने के लिए बार-बार कदम और कोशिशें जारी रखता है। कहना न होगा कि यही उसकी सुरक्षात्मक नीति हो गयी है। पुनः धीरे-धीरे बढ़ना शुरू हुई ग्लोबल आर्थिक सुस्ती की मार भारत के साथ चीन को भी प्रभावित कर रही है। पिछले हफ्रते आये चीन के औद्योगिक विकास के आंकड़े निराशाजनक हैं। इससे वह बेचैन हो उठा है। भारत को इसे ध्यान में रखकर एहतियात भी बरतनी होगी!



 जमीन की नई सीमारेखा

 भारत को दुनिया भले गांवों का देश मानती हो और इसकी अर्थव्यवस्था कृषि प्रधान कहलाती हो लेकिन इस तल्ख हकीकत से मुंह नहीं चुरा सकते कि इस देश में सबसे उपेक्षित कोई वर्ग अगर है तो वह किसान ही है। अगर किसी को इस बात पर एतराज है तो उसके सामने बखूबी ‘राष्ट्रीय भूमि सुधर परिषद’ का उदाहरण रख सकते हैं जिसका गठन मनमोहन सिंह सरकार की पहली पारी में हुआ था और जिसे हथियार बना कर किसानों और ग्रामीण इलाकों की तकदीर बदलने के जोर-शोर से वायदे किए गए थे। हकीकत यह है कि गठन के बाद से साढ़े तीन साल बीत चुके हैं लेकिन इस परिषद की एक भी बैठक आज तक नहीं हुई। ऐसा उस कमेटी के साथ हो रहा है जिसके अध्यक्ष खुद प्रधानमंत्री हैं और योजना आयोग के उपाध्यक्ष समेत पांच असरदार केंद्रीय मंत्री और दस मुख्यमंत्री जिसके सदस्य हैं।
पिछले दिनों भूमि अध्ग्रिहण के मुद्दे पर जबरदस्त बवाल के बाद केंद्रीय मंत्रिपरिषद ने आनन-फानन में इस मसले पर विधेयक पारित कर दिया लेकिन उस वक्त भी किसी को इस परिषद की याद नहीं आई। पिछले तीन केंद्रीय ग्रामीण मंत्रियों की विफलता के बाद अब वर्तमान मंत्री जयराम रमेश इसकी पहली बैठक करवाने जा रहे हैं जो प्रधानमंत्री की विदेश से वापसी के बाद कभी भी हो सकती है। लेकिन इस उद्घाटन बैठक का एजेंडा ही इतना विस्फोटक है कि इस पर अभी से सवाल उठने लगे हैं। परिषद को दो अहम मसलों पर फैसला देना है-खेतिहर जमीन रखने की सीमा को और घटाना तथा सभी राज्यों में एकरूपता के साथ इस सीमा को लागू करना। अनुमान है कि इस फैसले के तहत किसान अब पांच से पंद्रह एकड़ जमीन तक ही अपने पास रख पाएंगे, फालतू जमीन सरकार के कब्जे में चली जाएगी जो या तो भूमिहीनों के बीच वितरित की जाएगी या विकास कार्या में इस्तेमाल होगी। ग्रामीण इलाकों में व्याप्त भारी आर्थिक असमानता और गरीबी को देखते हुए इस क्रांतिकारी विचार को नकारा नहीं जा सकता। सवाल ये हैं कि क्या सरकार ऐसा फैसला लेने में और उसे कार्य रूप देने में सक्षम है ? वर्तमान केंद्र सरकार जिस प्रकार चारों ओर से घिरी हुई है उसमें क्या वह ऐसा गंभीर कदम उठा सकती है? कृषि और खेतिहर जमीन का मामला राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आता है लेकिन केंद्र सरकार कानून के जरिए जमीन की न्यूनतम सीमा का निर्धरण तो कर ही सकती है बशर्ते इसके लिए उसके पास दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति हो। वोट बैंक की राजनीति क्या इस इच्छाशक्ति को सिर उठाने का मौका देगी?
जिनकी जमीन कटेगी उनके गुस्से का सामना तो करना होगा। फिर, उन भूमिहीनों की अपेक्षाओं पर भी सरकार को खरा उतरना होगा जो जमीन के मालिक बनने के सपनों में जी रहे हैं। इस मसले पर पुराने अनुभव हौसला बढ़ाने वाले नहीं हैं। आचार्य विनोबा भावे ने देशभर में अभियान चला कर चालीस लाख एकड़ जमीन इकट्ठी की थी जो भूमिहीनों में बंटनी थी। आंकड़े बताते हैं कि इसमें से केवल बीस लाख एकड़ जमीन भूमिहीनों तक पहुंच पाई। बाकी जमीन कहां है, इसका पता नहीं लग पाया है। जरा उन भूमिहीनों के हाल पर सोचिए जिन्हें सरकार ने जमीन देने का वायदा करते हुए पट्टा दे दिया लेकिन वे सालों से इस पट्टे को लेकर दर-दर भटक रहे हैं। यही हाल जमीनों से जुड़े आंकड़ों का है जिसकी पर्याप्त जानकारी तक सरकार के पास नहीं है। अफसोस,आज के डीजीटल युग में भी हम जमीन की जानकारी कम्प्यूटर तक नहीं पहुंचा पाए हैं।



टोपी से क्यों परहेज

 गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी अपने ‘सद्भावना उपवास’ के मिशन में किस हद तक सफल रहे, इस सवाल पर हर किसी के अपने निष्कर्ष होंगे। लेकिन इतना तय है कि तीन दिनों के इस अभियान में मोदी पूरे देश की निगाहों के केंद्र बने रहे-समर्थक उन पर पुष्प वर्षा करने में जुटे रहे तो विरोधियो ने पत्थरबाजी में कोई कसर नहीं छोड़ी। इस दौरान दंगा पीडि़त प्रदर्शनकारियों की गिरफ्रतारी और मोदी का सार्वजनिक तौर पर ‘मुस्लिम टोपी’ पहनने से इंकार करने जैसी दो घटनाएं ऐसी भी हुई जो ‘सद्भावना’ के खिलाफ जाती दिखीं। इन सबके बावजूद मोदी का अभियान अपने दो राजनीतिक लक्ष्यों को साधने में कामयाब दिख रहा है।
गुजरात में लगातार सफलता का स्वाद चखने के बाद मोदी अब ‘राष्ट्रीय जिम्मेदारी’ का दायित्व संभालने के लिए पार्टी के अंदर जगह बनाने में कामयाब लग रहे हैं। उपवास के दौरान तमाम भाजपा दिग्गज जिस प्रकार मोदी के आगे लाइन लगा कर स्तुति गान कर रहे थे उससे दिख रहा था कि 2014 में होने वाले आम चुनाव में पार्टी किसे प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी बना कर पेश करने वाली है। बेशक इसके लिए मोदी को पार्टी के अंदर अभी कई लड़ाइयां लड़नी होंगी लेकिन वर्तमान दौर में तो समय उनके साथ ही दिख रहा है। राजनीतिक, प्रशासनिक अनुभव और दावपेंच के मामले में मोदी पार्टी के अपने उन प्रतिद्वंद्वियों से इक्कीस दिखते हैं जिनमें प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनने की क्षमता है। मोदी की असल मुश्किल उन पर मुस्लिम विरोधी होने का टैग लगना है। इसी दाग को धेने की कोशिश में उन्होंने अपने उपवास को ‘सद्भावना मिशन’ का नाम दिया था और इस दौरान खुद को मुसलमान हितैषियों से घिरा भी दिखाया। लेकिन एक चतुर राजनेता होने के नाते वह अपनी हदें भी जानते हैं।
शायद यही कारण होगा कि उन्होंने एक मौलाना की दी हुई पारंपरिक मुस्लिम टोपी पहनने से इंकार कर दिया। इसकी सफाई हालांकि उन्होंने यह दी है कि वह वोट बैंक की राजनीति में यकीन नहीं रखते लेकिन असलियत में इसके पीछे यह आशंका रही होगी कि इस टोपी का गलत संदेश उनके प्रखर हिंदुत्व समर्थकों को कहीं भ्रमित न कर दे।बेशक वोट बैंक और तुष्टिकरण की राजनीति ने अपने देश को बड़ा नुकसान पहुंचाया है लेकिन मोदी के इंकार के पीछे उनके अपने कारण हैं। इस इंकार के जरिए उन्होंने देश के उस बड़े मतदाता वर्ग का ध्यान खींचने की कोशिश की है जो वोटबैंक की राजनीति से ऊब चुके हैं। दो बार से लगातार सत्ता में चल रहे मोदी को राज्य में चुनावी आहट का अहसास भी है। लगातार सत्ता में बने रहने से उत्पन्न होने वाली मतदाताओं की ऊब यानी ‘एंटी इंनकंबेंसी’ के खतरे का अहसास भी उन्हें बखूबी है।
इसलिए इस उपवास के जरिए मोदी ने अगले चुनाव की तैयारी भी शुरू कर दी है। अब वह हर जिले में ऐसे एक दिनी उपवास की तैयारी कर रहे हैं। मोदी को मालूम है कि राष्ट्रीय परिदृश्य का सपना देखने के लिए जरूरी है कि गुजरात में उनकी सत्ता अक्षुण्ण रहे। हालांकी, मोदी की सफलता के पीछे केवल वह खुद या उनकी पार्टी ही नहीं है। कांग्रेस जैसी उनकी सबसे बड़ी प्रतिद्वंद्वी पार्टी भी हताशा या प्रतिक्रिया में ऐसी हरकतें कर रही है जो मोदी के लिए फायदे का कारण बन सकती है। मोदी के उपवास को जवाबी उपवास से साधने  की कांग्रेस की कोशिश एक बचकाना हरकत से अधिक कुछ नहीं थी। कांग्रेस सांगठनिक स्तर पर वहां खुद को दुरुस्त करे, यह बेहतर होगा।



संसद ही निर्णायक

 अपराध् की सजा का तर्क आखिरकार क्या है ? आज जबकि मानवाधिकारवादी कार्यकर्ता फांसी जैसी सजा को एक बर्बर कार्रवाई ठहराते हैं तो यह बुनियादी सवाल कहीं न कहीं जरूर खड़ा होता है। क्या सजा ‘जैसे को तैसा’ के तर्क पर तय होनी चाहिए या न्याय की यह कसौटी ज्यादा औचित्यपूर्ण है कि सजा अपराधी के चारित्रिक सुधर की अंतिम गुंजाइश तक पर विचार करते हुए तय होनी चाहिए। दिलचस्प है कि आज गांधीवादी ध्ज के समाजसेवी अन्ना हजारे तक यह मांग करते हैं कि देश की अस्मिता और सुरक्षा के खिलाफ आतंकी जुर्रत दिखाने वालों को सरेआम फांसी पर लटका देना चाहिए। वहीं न्याय और समाज के रिश्तों का अध्ययन करनेवाले ज्यादातर अध्येताओं और मानवाधिकार के हिमायतियों की नजर में फांसी जैसी सजा का एक प्रतिक्रियात्मक असर संबंधित देश और समाज पर पड़ता है। लिहाजा एक पफौरी इत्मीनान का भविष्य में बड़ा खमियाजा भी भुगतना पड़ सकता है। सापफ है कि पफांसी जैसी सजा को बहाल रखने या उसे समाप्त करने पर फैसला लेना बहुत आसान नहीं है।
 इसके लिए हमें मौजूदा दौर में प्रभावी तमाम तर्कां और पक्षों पर गौर करना होगा। पर दुर्भाग्य से इस मुद्दे पर जितने ध्र्य और आग्रहरहित होने की जरूरत है, हम उतने ही अध्ीर और आग्रही होकर इस पर विचार करने या फैसला लेने को उतावले हैं। जो उतावलापन समाज में, वही हड़बड़ाहट राजनीतिक बिरादरी के भीतर भी है। नहीं तो ऐसा कभी नहीं होता कि किसी प्रदेश की विधनसभा सुप्रीम कोर्ट के निर्णय और राष्ट्रपति की माफी गुहार को खारिज कर देने के बाद एक तयशुदा फांसी को रोकने के लिए प्रस्ताव पास करती। एक ऐसे समय में जब सरकारी भ्रष्टाचार और अपराध् के खिलाफ मामलों की अदालतों में भरमार हो और समाज में भी अपराध् को कहीं न कहीं एक चारित्रिक स्वीकृति मिलती जा रही हो, अपराध् के खिलाफ कठोरतम कार्रवाई के तौर पर फांसी की सजा की दरकार और इनकार का आधर स्थिर कर पाना वाकई आसान नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने हालिया एक मामले में साफ किया है कि जब तक फांसी की सजा का कानूनी प्रावधन बहाल रहता है, अदालतें वीभत्स अपराध् के खिलाफ यह सजा सुनाती रहेंगी। शीर्ष न्यायालय ने अपनी तरफ से यह हवाला जरूर रखा कि अब तक 96 मुल्क फांसी की सजा को समाप्त कर चुके हैं। 34 देश ऐसे हैं जिसने लंबे समय से इसका इस्तेमाल नहीं किया है जबकि 58 देश आज भी ऐसे हैं जहां गुनहगारों को सजा-ए-मौत दी जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने फांसी के खिलाफ या हक में किसी राय को जाहिर करने के बजाय साफ तौर पर कहा कि अगर फांसी की सजा को समाप्त करना है तो इसके लिए संसद को कानूनी पहल करनी होगी। शीर्ष न्यायालय ने वैसे यह कोई नई बात नहीं कही है।
हमारी संवैधनिक व्यवस्था में कानून बनाने और बदलने की जवाबदेही संसद की ही है। पर जरूरी सवाल यह है कि फांसी की सजा जैसे संवेदनशील मुद्दे पर राजनीतिक फायदा-नुकसान की परवाह किए बगैर क्या हमारी संसद इस पर एक ऐसा मन बना सकती है, जिसमें समय और समाज का हित और दरकार का अक्स जाहिर हो।



9/11 के सबक

 ग्यारह सितंबर, 2001 के बाद दुनिया ही नहीं रही, जैसी वह पहले थी। 9/11 के पहले की दुनिया में पश्चिमी देशों और बाकी दुनिया के बीच एक मजबूत दीवार थी। यह न मानें कि 9/11 से यह दीवार टूटनी शुरू हुई, शायद उसमें दरारें आनी पहले ही शुरू हो गई थीं, लेकिन 9/11 उस दीवार में लगी पहली बड़ी सेंध् थी। इसके पहले आतंकवाद और उससे जुड़ी समस्याएं पश्चिमी दुनिया को प्रभावित नहीं करती थीं। पश्चिम ने विकासशील दुनिया की तमाम समस्याएं पैदा की थीं, लेकिन उनके अपने घरों में शांति थी। उस शांति और सुरक्षा में वे आतंकवाद को बढ़ाने, पालने-पोसने और उसका शिकार होने वालों को एक ही नजर से देख सकते थे, वे फलस्तीनियों को आतंकवादी मान सकते थे, लेकिन तालिबान या कश्मीर के आतंकवादियों के प्रति उदार रह सकते थे। भारत जैसे आतंकवाद के शिकार देश के प्रति कोई खास सहानुभूति पश्चिम में नहीं थी।
9/11 ने आतंकवाद को पश्चिम के घर के अंदर पहुंचा दिया। उन्हें आतंकवाद के प्रति अपना नजरिया बदलना पड़ा। अमेरिका 9/11 के पहले दुनिया का सबसे उदार और खुला समाज था, अब वह तरह-तरह की सुरक्षा जांचों से जकड़ा हुआ समाज हो गया, जहां मामूली शक पर किसी व्यक्ति को सुरक्षा एजेंसियां गिरफ्रत में ले लेतीं। अचानक अमेरिका और यूरोपीय देशों ने भारत जैसे देशों के दर्द को समझना शुरू किया, भले ही यह समझदारी बुरी तरह खंडित और आधी-अधूरी थी। बची-खुची कसर अमेरिका की रिपब्लिकन सरकार ने पूरी कर दी, जिसने अफगानिस्तान की लड़ाई में पाकिस्तान को साथ लिया, और लगे हाथ इराक पर भी हमला बोल दिया। इस तरह जार्ज बुश ने यह सुनिश्चित कर लिया कि यह लड़ाई जल्दी नहीं खत्म होने वाली और आतंकवाद जहां-जहां नहीं पैफला था, वहां-वहां भी फैल गया। युद्ध के दौरान देशभक्ति के ज्वार का फायदा लेकर बुश ने ऐसी आर्थिक नीतियां लागू कर दीं, जो रिपब्लिकनों को प्रिय थीं, मसलन बड़े पैमाने पर अमीरों को टैक्स में राहत दी गई, इससे अमेरिका पर आर्थिक बोझ बढ़ता गया।
9/11 से दुनिया की सुविधजनक सीमाएं और घेराबंदी टूटने लगी। अगर पिछले तीन वर्षों की विराट आर्थिक मंदी और अरब देशों में चल रहे आंदोलनों को भी शामिल किया जाए, तो पिछला दशक इसलिए महत्वपूर्ण है कि इसमें वे सारी समस्याएं पश्चिम का दरवाजा खटखटाने लगीं, जिनके निर्माण में पश्चिम की बड़ी भूमिका थी। शायद जार्ज बुश इराक पर हमला नहीं करते, तो स्थिति में कुछ पफर्क आता। अमेरिकी सरकार अपनी अर्थव्यवस्था को ठीक से संभालती, तो परिस्थिति कुछ  अलग होती। लेकिन संभवतः यह फर्क थोड़ा-बहुत ही होता। 9/11 से आतंकवाद ने जो चुनौती दी थी, वह सिर्फ अफगानिस्तान से तालिबान की सरकार के हटने या अल कायदा के ध्वस्त हो जाने से खत्म नहीं होता। आतंकवाद एक जहरीली विचारधरा से धीरे-धीरे उपजा था, जिसे पश्चिमी देशों ने अवसरवादी स्वार्थों की वजह से खाद-पानी दिया था। भारत में आतंकी वारदात करने वालों को गिरफ्रत में लेने के लिए अमेरिका कितनी कोशिशें कर रहा है? अब भी आतंकवादी हमारे देश में विस्फोट कर रहे हैं और उनके खिलाफ हमारी लड़ाई हम अकेले ही लड़ रहे हैं। पश्चिम का पूरा ध्यान किसी तरह से अफगास्तिन से निकलने में है। 9/11 के बाद का असली सबक अमेरिका और उसके साथियों ने नहीं सीखा है कि लोकतंत्रा, ध्र्मनिरपेक्षता, शांतिपूर्ण सहअस्तित्व वगैरा सार्वभौमिक मूल्य हैं और पूरी दूनिया में इन्हें मजबूत करके ही मानवता जीत सकती है।



मनमाना फैसला

 बीजिंग ओलंपिक के लिए क्वालिफाई नहीं करने के बाद से ही भारतीय हाकी ढर्रे पर नहीं चल रही है। खेल मंत्रालय इसे ढर्रे पर लाने के लिए प्रयासरत है लेकिन इन प्रयासों को उस समय करारा झटका लग गया, जब अंतरराष्ट्रीय हाकी फेडरेशन ने दिल्ली में तीन से 11 दिसम्बर तक होने वाली चैंपियंस ट्राफी की मेजबानी छीन ली। इसकी वजह यह बतायी गई कि ओलंपिक चार्टर के हिसाब से एक देश में एक खेल के संचालन के लिए एक ही खेल फेडरेशन हो सकता है जबकि भारत में हाकी इंडिया और भारतीय हाकी फेडरेशन के रूप में दो संगठन काम कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय हाकी फेडरेशन की यह दलील विरोधभासी और लचर है क्योंकि पिछले साल देश में विश्वकप हाकी के आयोजन के समय भी कमोबेश यही स्थिति थी। उस समय ऐसी कार्रवाई की सुध् क्यों नहीं आई? इस विकल्प में मालामाल होने की वजह से ही एफआईएच ने भारत को चैंपियंस ट्राफी और ओलंपिक क्वालिफाइंग टूर्नामेंट की मेजबानी सौंपी थी। वैसे भी उनकी यह दलील इसलिए मायने नहीं रखती है क्योंकि हाकी इंडिया ही लगातार उनसे संपर्क करने वाला संगठन है और वही उनके टूर्नामेंटों में टीम उतारता है, इसलिए भारतीय हाकी फेडरेशन के अस्तित्व का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है।
असल में एफआईएच के इस फैसले के पीछे कुछ अन्य कारण नजर आते हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो एफआईएच अध्यक्ष लिएंड्रो नेग्रे की अगले हफ्रते खेल मंत्री अजय माकन से बातचीत होनी है और उस समय तक इस फैसले को टाला जा सकता था। इससे संकेत मिलते हैं कि चैंपियंस ट्राफी को अब तक टाइटल स्पांसर न मिल पाना और विश्वकप के आयोजन के समय के बकाया पांच लाख डालर का भुगतान नहीं होना इसकी वजह हो सकती है। इस बकाया राशि को भारतीय रिजर्व बैंक ने रोका हुआ है और यह ऐसा मसला नहीं है कि जिसका हल नहीं निकल सकता हो। नेग्रे से जब मीडिया ने संपर्क किया तो उन्होंने कहा कि वह खेल मंत्री से मुलाकात के बाद ही जानकारी दे सकेंगे। इससे लगता है कि यह एफआईएच की दबाव बनाने की रणनीति हो सकती है। इससे संभावना यह भी बन रही है कि हो न हो नेग्रे इस मुलाकात में सरकार से चैंपियंस ट्राफी के लिए वित्तीय गारंटी लेने के बाद भारत को फिर इसकी मेजबानी सौंप दें।
 इस संभावना की एक वजह यह भी है कि एफआईएच ने मेजबानी छीनने की घोषणा के साथ यह नहीं बताया कि यह चैंपियनशिप कहां होगी। यही नहीं, उसे इतना तानाशाह भी नहीं बनना चाहिए था कि हाकी इंडिया से इस बारे में संपर्क करना भी उचित नहीं समझा। लेकिन तय है कि भारत में चैंपियंस ट्राफी न होने पर देश की हाकी को नुकसान होगा। एक तो देश के हाकी प्रेमियों को उच्चस्तरीय हाकी देखने से वंचित होना पड़ेगा। दूसरे भारतीय टीम को ओलंपिक क्वालिफायर से पहले उच्च स्तरीय टीमों से खेलने का मौका न मिलने से उसकी तैयारियों को करारा झटका लगेगा। इससे सबक लेकर भारतीय हाकी के रहनुमाओं को दोनों एसोसिएशनों को एकजुट करना चाहिए अन्यथा भविष्य में देश की हाकी को और झटके झेलने पड़ सकते हैं।



दिल्ली में दहशत

 चार महीने से भी कम समय के भीतर राष्ट्रीय राजधनी में हाईकोर्ट के गेट पर हुए दूसरे धमाके के बाद दिल्ली पुलिस की कार्यक्षमता, मुस्तैदी, चौकसी आदि सब कुछ सवालों के घेरे में आ गयी है। पिछली बार का धमाका गेट नम्बर सात के पास हुआ था। उसमें कोई हताहत नहीं हुआ था। किंतु इस बार हाईकोर्ट में प्रवेश के लिए पास बनाये जाने वाले गेट नम्बर पांच के निकट भीषण बम विस्फोट दर्जनों लोगों को हताहत करने वाला साबित हुआ। सचाई यह है कि सुरक्षा कमजोरियों के चलते हुए इस तरह के हादसे से क्षति का न तो वास्तविक आकलन किया जा सकता है और न उसकी भरपाई की जा सकती है। पिफर भी उठने वाले सवालों से मुंह मोड़कर नहीं रहा जा सकता।
 इस घटना का भी ताल्लुक आने वाले दिनों में भले ही किसी तरह के आतंकवाद- मसलन घरेलू या वैश्विक से स्थापित हो, लेकिन क्या यह महज संयोग है कि एक तरफ जब देश की सम्प्रभुता और सत्ता को सीधे चुनौती देने वाले आतंकवाद के गुनहगारों को उनके किए की आखिरी परिणति तक पहुंचाने का वक्त आ खड़ा हुआ है, तो उस पर ऐसी सियासत की जा रही है जो समूचे ‘राष्ट्र के लिए आत्मघाती’ है। इन हालात के लिए क्या देश का राजनीतिक नेतृत्व सुदृढ़ न होना दोषी है ?जिसके चलते देश की गृह नीति तो विश्वभ्रम का शिकार है ही, विदेश नीति को भी जाने-अनजाने इसके प्रभाव में लाकर किसको दंश देने की कोशिश हो रही है? पाकिस्तान, चीन, नेपाल, म्यांमार, बांग्लादेश, श्रीलंका में से किसके साथ हमारी नीतियां सहज अवस्था में हैं? क्या यह सब घरेलू मोर्चे पर चुनौती देती स्थितियों के गहराने की वजह नहीं बन रही हैं? मौजूदा गृह और विदेशमंत्री इस बात पर सहमत हो सकते हैं कि बांग्लादेश के परिप्रेक्ष्य में विदेश नीति पर अपने किसी राज्य की मंजूरी या असहमति का असर नहीं पड़ता, लेकिन क्या पाकिस्तान के बारे में जम्मू-कश्मीर, पंजाब और गुजरात तथा श्रीलंका के सम्बंध् में तमिलनाडु को नजरअंदाज किया जा सकता है ? यही दोहरे मानदंड और उनके आग्रह हमारे राष्ट्रीय राजनीतिक नेतृत्व को सबल नहीं बनने दे रहे हैं! अफसोस यह भी है कि हम अपने पूर्व के अनुभवों से सबक लेते नहीं दिखते! फिर केंद्रीय राजनीति की बिसात पर पलने वाली दिल्ली पुलिस से ही इस तरह के सबक की अपेक्षा क्यों ?
लेकिन यह कहने में हमें कोई गुरेज नहीं कि बुधवार को दिल्ली के राजनीतिक हृदय स्थल की परिधि में स्थित हाईकोर्ट के गेट पर हुआ बम धमाका शायद रोका जा सकता था, यदि पुलिस ने 25 मई को हाईकोर्ट के ही गेट नम्बर सात की पार्किग में आतंकवादियों द्वारा किये गये ‘बम विस्फोट के बड़े पूर्वाभ्यास’ से कोई सबक लिया होता! अफसोस कि उसे किसी खास व्यक्ति की जान लेने के लिए प्लांट किया गया कहकर भुला दिया गया! किसी भी राजनीतिक व्यवस्था में पुलिस की अपनी सीमाएं होती हैं। फिर हमारी पुलिस लंदन या स्काटलैंड यार्ड पुलिस जैसी नहीं है। न कौशल में और न ही संसाधनो की दृष्टि से! संसद का सत्रा चल रहा है। इस दौरान पूरी दिल्ली ‘हाई अलर्ट’ पर रहती है! फिर संसद भवन के कुछ किलोमीटर दूर ही यह विस्फोट कैसे हो गया ? मगर इसे केवल पुलिस या सुरक्षा एजेंसियों की लापरवाही कहना ठीक नहीं होगा। दरअसल, यह हमारी राजनीति-प्रशासित व्यवस्था की नाकामी है।



 मनमोहन ढाका में

 भारत-बांग्लादेश संबंध् में स्थायी भरोसा, परिपक्वता और निरंतरता लाने के लिए प्रधनमंत्री मनमोहन सिंह ढाका में हैं। दशक बाद किसी भारतीय प्रधनमंत्री की यह बांग्लादेश यात्रा है। इतने अंतराल में द्विपक्षीय संबंधें और अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक तकाजों में अभूतपूर्व परिवर्तन हुए हैं। शेख हसीना के नेतृत्व में बांग्लादेश ने अलगाववाद-उग्रवाद को पनाह देने की शिकायतों को परिणामदायक कार्रवाई से लगभग दूर कर दिया है। सीमा पर चौकसी बढ़ाकर घुसपैठ को शून्य पर ला दिया है तो भारत को दक्षिण-पूर्व एशिया में प्रवेश के लिए रास्ता देने को तैयार है। निश्चित रूप से यह एकतरफा सद्भावना नहीं है।
 भारत भी कमोबेश उसी रूप में सदाशयी रहा है। किंतु हर गतिशील द्विपक्षीय संबंध् की तरह इसे भी बृहत्तर आयाम की आकांक्षा है। बांग्लादेश भारत की मजबूत अर्थव्यवस्था से अपने लड़खड़ाते सकल घरेलू उत्पाद को सहारा दिलाना चाहता है। उसकी अपेक्षा है कि भारत उसकी 480 वस्तुओं को भारतीय बाजारों में शुल्क रहित प्रवेश की इजाजत दे दें। इन्हें भारत ने फिलहाल नकारात्मक सूची में डाल रखा है। मनमोहन-हसीना वार्ता में यह भी एक एजेंडा है। हालांकि गोता खाते विकास की दर वाले मौसम में भारत इसे एकमुश्त मानने की स्थिति में नहीं है। पिफर भी वह इनमें से कुछ को शुल्क रहित कर बांग्लादेश में भारतीय निवेशकों के न्योते का फायदा उठा सकता है। बाकी की क्षतिपूर्ति दक्षिण-पूर्व एशिया के बाजारों में पहुंच से की जा सकती है, जिसका रास्ता बांग्लादेश दे रहा है। निश्चित रूप से भारत-बांग्लादेश संबंधें में व्यापकता और गहराई देने का अवसर है। भारत के घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर दोनों के लिए मुपफीद हैं। पाकिस्तान से लगी सीमा के अशांत होने, वहां चीन का दखल बढ़ते जाने तथा चीन से लगी सीमा पर होने वाले घटनाक्रमों के बीच हम अपनी दूसरी सीमा को असुरक्षित करने का जोखिम नहीं ले सकते। फिर बांग्लादेश ने तो अपनी सरकार के ‘भारत की पिठ्ठू’ कहे जाने की परवाह न करते हुए भी दिल्ली को निनिश्चिचत करने वाले कुछ कड़े फैसले लिए हैं। इनमें उल्फा उग्रवादियों के कैंपों को उखाड़ते जाना और उनके नेताओं को भारत को सौंपना प्रमुख है।
 ‘पाकिस्तान केंद्रित विदेश-रक्षा नीति’ रखने के बावजूद भारत इस्लामाबाद से इतना सहयोग कभी नहीं पा सका। हालांकि एक अंतर है। पड़ोसी बांग्लादेश से भारत का संबंध् सत्ता परिवर्तन के साथ उदार और कट्टर होता रहता है। संधियो के पालन में सक्रियता और आदर का अनुपात भी उसी मुताबिक रहता है। इसलिए भारत में एक वर्ग की यह शंका भी रहती है कि उसकी उदारता का हश्र जाने क्या हो! आखिर भारत द्वारा बांग्लादेश मुक्ति संग्राम जैसी ऐतिहासिक और निर्णायक भूमिका निभाने के बाद भी शेख हसीना की अवामी लीग की प्रतिपक्षी पार्टियों की सरकारों ने कैसा प्रतिदान दिया- अशांत सीमा क्षेत्रा और हिंसक अलगाववाद-उग्रवाद। लेकिन राजनयिक संबंध् अतीत के कैदी नहीं होते।
 हां बाखबर जरूर रहते हैं। तीस्ता-फेनी नदियों के जल बंटवारे पर उदारता दिखाने की भारत की मंशा इसी से प्रेरित थी। ममता के कड़े विरोध् के कारण इस पर फिलहाल विराम लग गया है। अगर व्यावहारिक हल निकला तो फरक्का के समय से भारत की तरफ से हो रहे कथित अन्याय को न्याय में बदला जा सकेगा। यह तात्कालिक तौर पर भले शेख हसीना की राजनीतिक आवश्यकता हो पर भली भांति भरोसा जीता गया पड़ोसी होना भारत के लिए संभावनाओं के द्वार खोलने वाला होगा।



 इसके आगे अन्ना

 भ्रष्टाचार और इस पर अंकुश के उपायों पर देश के जनमत को जागृत करने के बाद बुजुर्ग गाँधीवादी अन्ना हजारे का अगला अभियान क्या होगा! खुद अन्ना ने रामलीला मैदान में अपना अनशन तोड़ते वक्त इसका काफी कुछ संकेत दे दिया है। अन्ना अब चुनाव प्रक्रिया में व्यापक सुधर तथा ग्रामीण इलाकों के सशक्तिकरण की दिशा में अभियान छेड़ेंगे। चुनाव सुधरों के लिए अन्ना जिन बिंदुओं का उल्लेख कर रहे हैं, उनकी चर्चा दशकों से हो रही है लेकिन पहल करने की हिम्मत आज तक नहीं की गई। उनका मानना है कि मतदाताओं को यह अधिकार होना चाहिए कि वे यदि अपने चुने गए सांसदों, विधयकों के कामकाज से संतुष्ट नहीं हैं तो उन्हें बर्खास्त कर सकें।
 आज जनप्रतिनिधियो से जनता की आम शिकायत है कि एक बार चुने जाने के बाद उनके दर्शन अगले चुनाव के वक्त ही होते हैं और चुनाव के बाद मतदाताओं या अपने क्षेत्रा की समस्याओं को वह तरजीह नहीं देते। अन्ना का मानना है कि यदि ऐसे हालात बदलने हैं और चुने गए जनप्रतिनिधियो को अपने मतदाताओं के प्रति सही अर्थों में जिम्मेदार बनाना है तो उनकी बर्खास्तगी का अधिकार भी जनता के पास होना चाहिए जो उन्हें चुनती है। ऐसा नहीं कि इस मुद्दे पर पहले चर्चा नहीं हुई हो, लेकिन अव्यावहारिक बता कर हमेशा इसे टालने की कोशिश की जाती रही है। इसी प्रकार, अन्ना का मानना है कि चुनाव के वक्त वोटर की यह मजबूरी नहीं होनी चाहिए कि उसे खड़े प्रत्याशियों में से किसी को चुनना ही है।
 इसलिए मतपत्रा में यह व्यवस्था भी रहनी चाहिए कि पसंद न आने पर वोटर तमाम उम्मीदवारों को रिजेक्ट कर सके। यह मांग नई नहीं है लेकिन इसे भी सिरे से खारिज करने की प्रवृत्ति देखी जा रही है। अन्ना इस मांग को खासकर उम्मीदवारों की आपराधिक और भ्रष्ट पृष्ठभूमि के संदर्भ में देखते हैं। आज चुनाव के दौरान तमाम पार्टियों की तलाश ऐसे उम्मीदवारों की होती है, जो अपने दमखम पर जीतने का माद्दा रखें। जाहिर है कि इस प्रतिस्पर्ध में ऐसे बाहुबलियों की बन आती है जो ताकत या धन के बूते अपना सिक्का मनवाने की कूवत रखते हों।यही कारण है कि चुनाव जीत कर आने वाले आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों की तादाद बढ़ती जा रही है जो लोकतंत्रा के भविष्य के लिए बड़े खतरे का संकेत है। संसद में मौजूद ऐसी पृष्ठभूमि वाले दर्जनों जनप्रतिनिधियो की ओर बार-बार संकेत कर अन्ना अपने इरादों के इजहार से नहीं चूकते। चुनाव सुधरों के साथ अन्ना का प्रिय विषय ग्रामीण इलाकों का सशक्तिकरण है जिसे वह अपने अभियान में शामिल करने के लिए छटपटा रहे हैं।
 उनकी नजर में गांवों की पंचायत या ग्रामसभा का रुतबा देश की संसद से कहीं कम नहीं है। इसीलिए अन्ना का मानना है कि देश में किसी भी कानून के बनने का काम ग्रामसभाओं में बहस से शुरू होना चाहिए।



 संवारना होगा लोकतंत्रा

 देश को लोकतंत्रा को जो लोग संसदीय सवोच्चता के मूल्य के साथ समझने के हिमायती हैं, उन्हें भी आज शायद ही इस बात को कबूलने में कठिनाई हो कि दलीय राजनीति के छह दशक के अनुभव ने इस मूल्य को बहुत मूल्यवान नहीं रहने दिया है। नहीं तो ऐसा कभी नहीं होता कि विचार और लोकहित की अपनी प्राथमिकताओं के आधर पर अलग-अलग नाम पर रंग के झंडे उड़ाने वाली पार्टियों और उनके नेताओं की विश्वसनीयता पर ही सबसे ज्यादा सवाल उठते। अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की बात करें तो इस आंदोलन को मिला अपार लोकसमर्थन कहीं न कहीं राजनीतिक विरादरी की जनता के बीच खारिज हुई विश्वसनीयता और आधर के सच को भी बयान करता है। एक गैरदलीय मुहिम का महज कुछ ही महीनों में प्रकट हुआ आंदोलनात्मक तेवर देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था की जमीन को नए सिरे से तैयार करने की दरकार सामने रखता है।
अच्छी बात यह है कि पिछले कुछ महीनों में इस तैयारी का न सिर्फ लोकसमर्थित तर्क खड़ा हुआ है, बल्कि इसके लिए राजनीतिक नेतृत्व पर दबाव भी बढ़ा है। कांग्रेस और भाजपा के कुछ संसदों ने  आज अगर अपने ही दलीय अनुशासन के खिलाफ जाने की हिमाकत दिखाई है तो यह इसलिए कि जनता से लगातार कटते जाने के खतरे को कुछ नेता अब समझने को तैयार हैं। पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रम में जनता का गुस्सा हर दल और उसके सांसदों के प्रति दिखा है। यह गुस्सा इसलिए है कि लोकतंत्रा को देश में एक दिन के चुनावी अनुष्ठान तक सीमित कर दिया गया है। लोकसंवाद की सनत प्रक्रिया पांच साल की मुंहजोही के लिए मजबूर हो गई है। एक सफल लोकतंत्रा जीवंत और प्रगतिशील भी होता है। समय और अनुभव के साथ उसमें संशोध्न जरूरी है। जनलोकपाल अगर आज की तारीख में जनता का बड़ा मुद्दा है तो इसके बाद सबसे जरूरी मुद्दा राजनीति के ढांचे और चुनाव प्रणाली में सुधर है। दिलचस्प है कि खुद अन्ना ने भी पिछले दिनों जनप्रतिनिध्त्वि तय करने वाली मौजूदा परंपरा और तरीकों पर सवाल उठाए हैं। यही नहीं, उन्होंने तो संसदीय सवोच्चता की दलील के बरक्स लोकतंत्रा की अपनी नई समझ भी रखी है। पंचायती राज का माॅडल प्रतिनिधिक के सामने प्रत्यक्ष और विकेंद्रित लोकतांत्रिक संस्था की अनोखी मिसाल है।
लोकसभा और विधनसभाओं के विशेषाधिकार का तर्क ग्रामसभाओं की अविघटनकारी विशेषता के सामने कमजोर मालूम पड़ते हैं। लिहाजा, अब वक्त आ गया है कि देश अपनी लोकतांत्रिक परंपरा को नए संदर्भ और समय के अनुरूप मांजने को तत्पर हो। अगर यह तत्परता राजनीतिक दलों के भीतर से अब भी स्वतः प्रकट नहीं होती है तो यह उनकी अदूरदर्शी समझ होगी। उम्मीद करनी चाहिए कि अपने लोकतांत्रिक अधिकारो और दायित्वों को लेकर जनता और उनकी नुमांइदगी करने वालों में साझी समझदारी प्रकट होगी। और पिछले साठ सालों की यात्रा के बाद देश एक बार अपने लोकतांत्रिक आधरों को पुष्ट करने के लिए तत्पर होगा। इस तत्परता का फलित भारतीय लोकतंत्रा के भविष्य को काफी हद तक तय करने वाला होगा।  



प्यासे पंछी

 राजस्थान में पानी की समस्या ने न केवल इंसानी समाज को चिंतित नहीं किया है बल्कि परिस्थितिकी तंत्रा पर भी इसका बुरा असर पड़ा है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अब अभयारण्यों में पानी की कमी के कारण पक्षियों के प्रजनन की स्थितियां संकट में पड़ती जा रही हैं। भरतपुर स्थित विश्व प्रसिद्ध केवलादेव अभयारण्य में हालत यह है कि तालाबों में पानी नहीं होने के चलते स्वदेशी पक्षियों ने अब तक अपने घोंसले नहीं बनाए हैं। जाहिर है, उनके प्रजनन के लिए अब भी स्थितियां प्रतिकूल हैं, जबकि यह मौसम उनके अंडे देने का होता है। इस साल मौसम का उतार-चढ़ाव काफी रहा, बरसात भी ठीक से नहीं हुई। नतीजतन, इस अभयारण्य में ज्यादातर तालाब सूखे पड़े हैं। दरअसल, देशी और प्रवासी पक्षी भरे तालाबों और उनमें पनपने वाले कीट-पतंगों से आकर्षित होकर ही आसपास स्थित पेड़ों पर अपने घोंसले बनाते हैं। लेकिन इस वर्ष इन तालाबों के खाली होने की वजह से वहां के लगभग सभी पेड़ सूने पड़े हैं। सवाल है कि पक्षियों के प्रजनन का समय और अनुकूल स्थितियों के बारे में जानकारी होने के बावजूद वन्यजीव विशेषज्ञ और दूसरे संबंधित महकमों को वहां स्थित पांचना बांध् से पानी छोड़ने के लिए पहल करना जरूरी क्यों नहीं लगा। जबकि कुछ समय पहले कोटा में राज्य के वन एवं पर्यावरण राज्यमंत्री की अध्यक्षता में प्रदेश स्तरीय वन्यजीव बोर्ड की बैठक में घना अभयारण्य में पानी के संकट को दूर करने के लिए पांचना बांध् से तुरंत पानी छोड़ने की मांग की गई थी। दरअसल, घना के झील या तालाबों के लिए पानी का मुख्य स्रोत गंभीर नदी रही है।
लेकिन इसे रोक कर करौली जिले में पांच नदियों का संगम बना कर पांचना बांध् बनाया गया। इस बांध् के तैयार होने के बाद से उसके पानी को घना अभयारण्य के लिए छोड़ने के मसले पर राजनीति होती रही है। पिछले साल संयुक्त राष्ट्र ने कहा था कि अगर पानी का इंतजाम नहीं किया गया तो यह अभयारण्य उजड़ जाएगा और विश्व ध्रोहर का मानक खो देगा। तब आखिरकार पांचना बांध् से पानी छोड़ा गया और पक्षियों की इस पनाहगाह को जीवनदान मिल गया था। गौरतलब है कि करीब उनतीस वर्ग किलोमीटर के दायरे में पैफले घना अभयारण्य को विश्व ध्रोहर का दर्जा मिला हुआ है और वहां बड़ी तादाद में सुदूर देशों से भी पक्षी आते रहे हैं। इनमें मध्य एशिया, रूस चीन और अफगानिस्तान जैसे मुल्कों से हजारों किलोमीटर की उड़ान भर कर सर्दियों के मौसम में इस अभयारण्य में बसेरा करने वाले पक्षी भी शामिल हैं। लेकिन लगभग सभी तालाबों के खाली होने की वजह से पक्षियों को इस प्राकृतिक चक्र से वंचित रहना पड़ा। घना अभयारण्य में रंग-बिरंगे पंछियों की क्रीड़ा देखने आने वाले हजारों विदेशी सैलानी वहां के स्थानीय लोगों के लिए रोजगार का अवसर उपलब्ध् कराते हैं। लेकिन जब से पानी का संकट खड़ा होना शुरू हुआ है, अभयारण्य वीरान रहने लगा है। साफ है, अगर हालात ऐसे ही रहें तो कोई चार सौ प्रजातियों के पंछियों की प्रणय-स्थली के रूप में मशहूर यह अनमोल ध्रोहर अपनी सबसे कीमती जायदाद, यानी पक्षियों को खो देगी। और पक्षियों के बिना घना अभयारण्य कैसा होगा, यह शायद बताने की जरूरत नहीं है।



घर नहीं, डाक बैंक

 भारत में डाकघरों का स्वरूप बहुत जल्द बैंकों जैसा होने वाला है। इसके लिए डाक घरों का अपना कोर बैंकिंग सोल्यूशन सीबीएस स्थापित किया जा रहा है, उसे अन्य बैंकों के सीबीएस से जोड़े जाने की प्रक्रिया चल रही है। अभी करीब डेढ़ लाख शाखाओं के साथ देश में डाकघर हर आम- ओ-खास के सबसे निकट, और रेलवे की तरह जनसुलभ सरकार का अहम एवं लोक कल्याणकारी उपक्रम है। बड़ी खासियत यह है कि व्यवस्था को इनके बारे में किसी बच्चे, बूढ़े, जवान को और बताने की जरूरत नहीं है। चिट्ठी-पत्री का प्रचलन बहुत कम होते जाने के बावजूद इनके कर्मचारियों की हर गांव-गली में पहचान है और इसका नेटवर्क मेट्रो शहरों से लेकर सीमावर्ती दूरदराज क्षेत्रों तक फैला है।
 राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय बैंकों के फैलते महाजाल के बावजूद डाक घर अब भी देश के सबसे बड़े बचत संगठन हैं जिनमें गत 31 मार्च तक 5,82,832 करोड़ रुपये जमा थे। इस बात को ध्यान में रखकर ही सरकार ने डाक घरों को बैंक जैसी कार्य क्षमता से लैस करने की योजना तो काफी समय से बनायी हुई है, पर अब इन पर अमल होने जा रहा है। इसके लिए डाक घरों के अपने एटीएम होंगे जिससे आम लोगों तक आधुनिक बैंकिंग सेवाएं पहुंच सकेंगी। भारतीय स्टेट बैंक के सबसे बड़ा बैंक होने के बावजूद सभी देशवासियों तक सहज उसकी पहुंच नहीं है। गांवों में अत्याधुनिक बैंकिंग सेवाओं की कमी है। ग्रामीणों को अपनी वित्तीय जरूरतें पूरी करने के लिए सम्पर्कियों, साहूकारों की मदद लेनी पड़ती है। इसके लिए बहुत बार उन्हें खाते में पैसा होने पर भी दूसरों की कड़ी शर्तं माननी होती हैं। धन जमा करने में भी दिक्कतें होती हैं। यही स्थिति सरकार की योजना को उत्साहजनक आधर देती है। यों, डाक घरों में सब ठीक ही होता रहा, ऐसा नहीं है। किसी का मनीआर्डर किसी और को दे देने से लेकर फर्जी पोस्टल आर्डर एवं डाक टिकटों की हेराफेरी जैसे अनेक छोटे- बड़े घपले इनके जरिये होते रहे। पत्रों के वितरण में इनकी लापरवाही की पराकाष्ठा के चलते कूरियर कम्पनियों को अपने पंख फैलाने में मदद मिली जो आज तुलनात्मक लिहाज से अधिक भरासेमंद हैं।
यही वजह है कि बाद में विभाग द्वारा शुरू की गयी पोस्टल स्पीड सेवा, सरकार के इतने बड़े नेटवर्क के सहयोग के बावजूद, उन्हें रिप्लेस नहीं कर पा रही है। डाक घरों को जब बैंकिंग सुविधओं से लैस करने की भारी-भरकम तैयारी हो रही है तो उन्हें सही मायने में कमर्शियलाइज करना होगा, साथ ही इनके कर्मचारियों को पेशेवर तेवर देने होंगे। नहीं तो उनकी सेहत सुध्रने से रही। इस तरपफ पर्याप्त ध्यान देने की जरूरत इसलिए भी है क्योंकि बचत बैंक, डाक जीवन बीमा, पेंशन का भुगतान व ध्नादेश आदि लोकप्रिय सेवाओं के रहते हुए भी डाकघर लाभदायक स्थिति में नहीं हैं। कुछ सर्किल में निगेटिव ग्रोथ से विभाग का घाटा 6,625 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। यह राशि इसके सालाना राजस्व 6,954 करोड़ रुपये के लगभग बराबर है। इसमें उत्साहजनक है तो यह कि कुल राजस्व गत वर्ष के 6,266.70 करोड़ से लगभग 687 करोड़ रुपये अध्कि है। लिहाजा, सरकार को यह भी देखना होगा कि डाक घर आधुनिकता के नाम पर बैंकों की नकल न बन जायें, जिनके लिए किसी भी मामले में लोकोकारी दृष्टिकोण के बनिस्वत अपना लाभ प्रतिशत बढ़ाना पहला लक्ष्य हो गया है। 
 



 दृष्टिकोण में भटकाव

 एक तरपफ देश के मौजूदा सकल घरेलू उत्पाद में आठ फीसद वृद्धि के भी लाले पड़े दिखते हैं दूसरी ओर हमारे प्रधानमंत्री बारहवीं पंचवर्षीय योजना में नौ फीसद से अधिक वृद्धि हासिल करने का लक्ष्य निर्धरित करना चाहते हैं। इसे क्या कहा जाना चाहिए, खासकर ऐसी दशा में जब  की सभी अर्थव्यवस्थाओं में उतार का संकेत गाढ़ा हो रहा हो?अगली पंचवर्षीय योजना के दृष्टिकोण को लेकर सिर्फ यही अकेली विसंगतिजन्य स्थिति नहीं है। शनिवार को योजना आयोग की बैठक में हालांकि प्रधानमंत्री ने शिक्षा और स्वास्थ्य के साथ बुनियादी विकास को 12वीं योजना का मजबूत लक्ष्य निरूपित करने का हरसम्भव दम दिखाया किंतु इसमें उन्हीं की सरकार व नीति निर्माताओं के दृष्टिकोण में जिस प्रकार की असंगति दिखी, वह अनेक गम्भीर सवाल उठाती है! अर्थशास्त्राय छवि वाले प्रधानमंत्री कहने में कोई दिक्कत नहीं महसूस करते कि नौ फीसद से अधिक की विकास दर का लक्ष्य हासिल कर लिया जाये तो देश का संकट सुलझ सकता है। लेकिन ऐसा कहते हुए उनका यह भूलना, या तथ्य को नजरअंदाज करना कितना मुनासिब कहा जाये कि देश-विदेश के आर्थिक हालात इसको समर्थन देते नहीं लग रहे हैं! अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने राजनीतिक लक्ष्य को साधने की गरज से तात्कालिक प्रावधन कर अपने देश की माली हालत का संकट कुछ दिनों के लिए टाल दिया है और अपने-अपने व्यावसायिक तकाजों के मद्देनजर उनके यहां के ध्न कुबेरों ने अब खास अंदाज में सरकार की मदद के लिए अपनी ओर से पेशकश करके देश को कुछ और समय तक मूच्र्छा से बचाने का इंतजाम करने की मंशा जतायी है, पर यूरोप से ऐसा कोई संकेत नहीं दिखता। हमारा मौजूदा सालाना व्यापार अभी सर्वाध्कि करीब 65 अरब डालर यूरोप से हो रहा है। अमेरिका की वित्तीय साख में हालिया गिरावट और हमारी साख के भी डगमगाने के खतरों के बीच शेयर बाजारों में मचे कोहराम से विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय कम्पनियों से सैकड़ों करोड़ डालर की निकासी इसी महीने की है। हमारे विकास का ताना-बाना विदेशी निवेश पर आधरित है। इध्र देश में भ्रष्टाचार के विरुद्ध जगी जनचेतना को शांत करने के लिए सरकार में न तो कोई राजनीतिक इच्छाशक्ति, और न ही कोई कौशल नजर आ रहा है। इससे अनिश्चय की जो तस्वीर उभरती है, वह निवेश के विदेशी इच्छुकों को कोई आश्वस्ति नहीं दिखाती। तिस पर महंगाई की मार, जिसके बारे में प्रधानमंत्री के ही आर्थिक सलाहकार यह कहते हुए कि ‘विकास दर बढ़ी तो महंगाई और बढ़ेगी’, प्रकारांतर में उनका मत खारिज कर रहे हैं। लिहाजा बहुत जरूरी है कि औपचारिक मंच पर आने के पहले सरकार और उसके नीति निर्माता और नियामक पहले खुद किसी निष्कर्ष पर पहुंच लें। अगली योजना के लक्ष्यों की बाबत भटकाव से हालात और खराब होंगे।



 न्याय की भाषा

 अदालत की भाषा के मामले में यह संवैधनिक प्रावधन किया गया कि जब तक वहां हिंदी के प्रयोग की व्यवस्था नहीं होती तभी तक अंग्रेजी का इस्तेमाल किया जाए। मगर आजादी के इतने सालों बाद भी उफपरी अदालतें हिंदी को सहज भाव से स्वीकार नहीं कर पाई हैं तो इस पर सवाल उठना स्वाभाविक है। न्यायपालिका में कामकाज का संबंध् केवल वकीलों के बीच होने वाली बहस और न्यायाधीश के फैसले तक सीमित नहीं होता। फरियादी और आरोपी भी न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े होते हैं बल्कि उनके अपने-अपने पक्ष ही मुकदमे का आधर बनते हैं। इसलिए कागजात, बहस और पफैसले की भाषा ऐसी हो जिसे वादी-प्रतिवादी भी समझ पाएं। यह नहीं माना जा सकता कि सभी फरियादी और आरोपी अंग्रेजी भाषा का ज्ञान रखते होंगे। इसलिए उचित ही बसपा के एक सांसद ने गुरुवार को लोकसभा में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में हिंदी को कामकाज की भाषा बनाने की मांग उठाई। हिंदीभाषी प्रदेशों के उच्च न्यायालयों में बहस और कामकाज कुछ हद तक जरूर हिंदी में होते हैं, बाकी प्रदेशों में अंग्रेजी का ही वर्चस्व है। पिछले साल मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै खंडपीठ के वकीलों ने तमिल में बहस की इजाजत देने की मांग को लेकर आंदोलन चलाया था। कई दिन के ध्रने के बाद खंडपीठ के जजों ने इसकी अनौपचारिक मंजूरी दे दी, पर यह भी कहा कि राष्ट्रपति की मंजूरी के बगैर इसका वैधनिक प्रावधन संभव नहीं है। अदालतों में अंग्रेजी का वर्चस्व भी एक बड़ा कारण है कि हमारे यहां मामूली कानूनी मसलों में भी लोग वकीलों पर निर्भर होते गए हैं। अदालतों में अंग्रेजी के दबदबे से केवल वादी-प्रतिवादी को परेशानी नहीं उठानी पड़ती। जिन वकीलों ने हिंदी या दूसरी भारतीय भाषा के माध्यम से कानून की पढ़ाई की है, वे कठिनाई महसूस करते हैं। तमाम वाजिब दलीलों के बावजूद कई बार अंग्रेजी न बोल पाने के कारण उनका पक्ष कमजोर रह जाता है। इस स्थिति को न्यायपूर्ण मानने में किसी को भी संकोच होगा।
दरअसल, उफरी अदालतों में कामकाज की भाषा केवल कुछ न्यायाधीशों और वकीलों के बनाए माहौल का नतीजा नहीं है। संसद खुद कानून अंग्रेजी में तैयार करती है। कानून में आज भी ब्रिटिश जमाने और उससे भी पहले की तकनीकी शब्दावली इस्तेमाल की जाती है। हिंदी को राजभाषा का दर्जा तो दे दिया गया, मगर इसे शासन और कानून की भाषा बनाने के लिए समुचित प्रयास नहीं किए गए। यों तकनीकी शब्दावली इस्तेमाल की जाती है। हिंदी कोश तैयार किया, मगर वे शब्द इस कदर दुरूह हैं कि आम लोगों के लिए उनका अर्थ समझना मुश्किल है। यही वजह है कि जहां अदालती कामकाज में हिंदी का इस्तेमाल होता है, वहां भी दलीलों और फैसलों को सहज रूप से समझ पाना संभव नहीं होता। अदालतों में हिंदी के इस्तेमाल का अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि उसे महज अनुवाद की भाषा बना दिया जाए। आखिर न्याय की भाषा ऐसी क्यों हो कि उसे सामान्य लोग आसानी से न समझ पाएं। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि सर्वोच्च न्यायालय में अनेक न्यायाधीशों को हिंदी समझने में दिक्कत पेश आ सकती है, क्योंकि जरूरी नहीं कि वे हिंदीभाषी हों, उनकी पढ़ाई-लिखाई हिंदी में हुई हो या हिंदी की तकनीकी शब्दावली से परिचित हों। लेकिन अगर कानून बनने की प्रक्रिया से ही इसका माहौल बने तो सकारात्मक नतीजे निकल सकते हैं।



उल्टा पड़ा दांव

 इसे आप क्या कहेंगे, सरकार का क्रूर उपहास या नियति की बाजीगरी! भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन की बागडोर संभालने वाले अन्ना हजारे और उनके नागरिक समाज के साथियों को उस तिहाड़ जेल में रात काटनी पड़ी जहां उन का साथ देने वालों में शामिल थे कामनवेल्थ गेम्स और टू-जी स्पेक्ट्रम महाघोटालों के दुर्नाम बंदी। लेकिन ‘सबक सिखाने का खेल’ महज चंद घंटों में उल्टे उसी के सर पर आ पड़ेगा, सरकार ने शायद यह नहीं सोचा होगा। अन्ना की गिरफ्रतारी के खिलाफ पूरे देश में देखते-देखते रोष की ऐसी लहर फैली और हजारों की भीड़ ने तिहाड़ जेल की ऐसी घेरेबंदी कर दी कि बंदी और गिरफ्रतारी का फर्क मिट गया। पता ही नहीं चल पा रहा था कि गिरफ्रतार कौन है, अन्ना या सरकार! सुबह अन्ना को गिरफ्रतार करने वाली सरकार रात होते-होते इस पेंच में फंसी थी कि अन्ना से तिहाड़ का पीछा कैसे छूटे। पूरा देश उबल रहा था। दुनिया भर से संदेश आ रहे थे और संसद में पक्ष-विपक्ष के गोले छूट रहे थे लेकिन जिस एक व्यक्ति को लेकर सारा हंगामा मचा था, वह सींखचों के पीछे बैठा सरकार के चलाये हथियार को ही अपने आंदोलन की ताकत में तब्दील कर रहा था। सरकारी दमन ने भ्रष्टाचार के खिलाफ छिड़ी जंग को सही मायनों में ऐसे जन आंदोलन में बदल दिया है जिसका फोकस अब लोकपाल बिल से आगे जनाधिकार तक पहुंच गया है।
अफसोस की बात है कि सरकार और सत्ताधरी गठबंध्न अब भी भ्रष्टाचार के खिलाफ उबल रहे जनमत की असलियत का सामना करने को तैयार नहीं है। अन्ना पर अशिष्ट भाषा में आरोपों की बौछार और छींटाकशी, आंदोलन के पीछे अमेरिका का हाथ बताना, नागरिक समाज को संसदीय प्रणाली का दुश्मन बताने और बार-बार उन्हें चुनावी जंग की चुनौती देना ऐसी बचकानी हरकतें हैं जो हमारी लोकतांत्रिक परिपक्वता पर सवाल खड़े करती हैं। संतोष की बात है कि संसद इस सरकारी झाम में नहीं फंसी और विपक्ष ने एकजुट होकर अन्ना के खिलाफ कार्रवाई को लोकतांत्रिक अधिकारो का हनन बताते हुए उन्हें तत्काल रिहा करने और आंदोलन चलाने की अनुमति देने की आवाज लगाई। अचरज की बात यह है कि बार-बार संसद को नागरिक समाज और अन्ना जैसी ‘बाहरी’ ताकतों का हौवा दिखा कर डराने की कोशिश की जा रही है लेकिन भ्रष्टाचार की बात आने पर एक ही जुमला दोहरा दिया जाता है कि सरकार के पास कोई ‘जादुई छड़ी’ नहीं है जो पलक झपकते इसका खात्मा कर दे। देश की चुनौतियों को समझने और उनके समाधन का रास्ता खोजने की जगह उन लोगों पर निशाना साध् लिया जाता है जो सरकारी और राजनीतिक पहल से निराश होकर जनांदोलनों के जरिये देश की दशा-दिशा सुधरने की हिम्मत करते हैं। अन्ना और नागरिक समाज पर निशाना साधने के पीछे कहीं यह डर तो नहीं कि लोकपाल आंदोलन के बाद उनका अगला निशाना जन अधिकार और चुनाव सुधर जैसे संवेदनशील विषय होंगे जो देश के राजनीतिक तौर तरीकों और सरकारी कार्यशैली में युगांतरकारी बदलाव की मांग करेंगे। अगर कहीं ऐसा ‘डर’ पनप रहा है तो देश के लिए तो यह आशाकारी संदेश है। देश के निरुपाय लोकतंत्रा को अन्ना के रूप में आवाज मिली है जिसमें भ्रष्ट तंत्रा का शोर डूब कर रह जाएगा।



 साख पर आंच

 पैसा केवल इंसान की हैसियत तय नहीं करता, दुनियाभर के देशों की औकात भी उनकी आर्थिक हालात से आंकी जाती है। अमेरिका अगर कई दशकों से ‘महाशक्ति’ के सिंहासन पर आसीन है तो यह केवल तकनीकी और सामरिक श्रेष्ठता के बूते नहीं है। उसकी ताकत का राज समृद्ध अर्थव्यवस्था में छिपा है जो संपदा में भी उसे महाशक्ति बनाती है। समृद्ध अर्थव्यवस्था की बुनियाद दुनिया की नजरों में अमेरिका की विसनीयता बढ़ाती है और उसे कर्ज देने या उसके यहां निवेश करने के लिए देशों की लाइन लगी रहती है। इस प्रकार एक समृद्ध देश और अमीर बनता जाता है। लेकिन, चोटी की अंतरराष्ट्रीय क्रेडिट एजेंसी ‘स्टैंर्डड एंड पुअर्स’ ने अमेरिका की ‘तीन सितारा’ आर्थिक साख को जब से घटा कर ‘दो सितारा’ किया है, इस महाशक्ति को भारी झटका लगा है। ग्लोबलाइजेशन नेटवर्क के कारण अमेरिका के इस झटके ने दुनियाभर के शेयरबाजारों में ‘आर्थिक सुनामी’ की लहर फैला दी। हमारा देश भी अछूता नहीं रहा और पहले से डगमगा रहे शेयरबाजार यहां पाताल की ओर कूच करते दिखने लगे। सवाल उठने लगे कि दो साल पहले कि वश्विक मंदी को सफलतापूर्वक झेल कर दुनिया को हैरान करने वाला भारत क्या ‘आर्थिक सुनामी’ के इन प्रलयंकारी लहरों को भी झेल पाएगा! चिंता इसलिए भी थी कि अमेरिका की साख गिराने के अगले दिन इसी एजेंसी ने भारत को भी सावधन रहने की चेतावनी दी थी।
अब आशा की क्षीण किरण इसी साख एजेंसी की तरफ से आई है जिसने आश्वस्त किया है कि फिलहाल भारत के लिए चिंता करने की बात नहीं है। ‘एस एंड पी’ का यह आश्वासन और हैरानी में डालता है जब पता चलता है कि जापान, ब्रिटेन और प्रंफास जैसे अमीर देश इस खुशखबरी के दायरे से बाहर हैं। इन देशों को भी भारत के साथ ही सावधनी की चेतावनी दी गई थी। हालांकि महंगाई, महंगे होते कर्ज, शेयरबाजार की बदहाली जैसे हालातों को देखते हुए नहीं लगता कि इस आश्वासन पर अध्कि इतराने की जरूरत है। अमेरिका की बदहाली का असर भारत पर नहीं पड़ेगा, ऐसी खुशफहमी नहीं पालनी चाहिए। बेशक, बीते महीने हमने निर्यात का खुशनुमा रिकार्ड बनाया था, लेकिन याद रखना चाहिए कि हमारी निर्यात गतिविधि अमेरिकी बाजार से गहराई से जुड़ी हुई है। सरकार हालांकि बार-बार आश्वस्त कर रही है कि ‘हम झटका झेल ले जाएंगे।’ लेकिन इसका लक्ष्य देश को संतुष्ट करने से अधिक विदेशी निवेशकों का भारत में भरोसा बढ़ाना है। शायद इसीलिए मुद्रास्फीति पर अंकुश की बाजीगरी अंतरराष्ट्रीय दबाव की दिशा में चल रही है। पिछले साल मार्च से रिजर्व बैंक ग्यारह बार ब्याज दरें बढ़ा चुका है और अभी वह थका नहीं है। ‘एस एंड पी’ ने बेशक बेलगाम मुद्रास्फीति को लेकर दीर्घकालिक नतीजों के नकारात्मक होने की चेतावनी दी है लेकिन यह भी साबित हो चुका है कि ब्याज के हथियार से मुद्रास्फीति को संभाला नहीं जा सकता। याद रहे, महंगा कर्ज बाजार में मांग पर असर डालता है और इसकी परिणति अंततः उत्पादन पर चोट के रूप में होती है। महंगाई और मंदी का एक साथ यानी ‘स्टेगफ्रलेशन’ किसी भी देश के लिए आर्थिक अवस्था का सबसे डरावना स्वप्न होता है। मुद्रास्फीति पर ब्याज का लगातार वार कहीं इस दुरूस्वप्न को हकीकत में न बदल दे। ध्यान रहे।



 ‘ कैग’ पर विवाद

 सरकारी खचरे का हिसाब किताब रखने वाले ‘कैग’ के एक और निर्मम हमले ने केंद्र सरकार के साथ ही गठबंधन की मुखिया कांग्रेस को तिलमिला कर रख दिया है। कामनवेल्थ खेलों और टू-जी स्पेक्ट्रम महाघोटालों पर ‘कैग’ की रिपोर्ट पहले ही प्रधानमंत्री कार्यालय और दिल्ली की शीला सरकार को कटघरे में खड़ी कर चुकी है। अब इसकी ताजा रिपोर्ट मुंबई के आदर्श कापरेटिव आवास घोटाले के लिए महाराष्ट्र के तीन भूतपूर्व मुख्यमंत्रियों, भारतीय सेना के दो पूर्व प्रमुखों और राज्य के अनेक दिग्गज अपफसरों पर सीधी जिम्मेदारी थोप रही है। लेकिन, संसद में रखी गयी ‘कैग’ की रिपोर्ट पर सार्थक बहस और कार्रवाई की जगह इस महत्वपूर्ण संवैधनिक संस्था के अधिकारो और नीयत पर हमला करना यकीनन ऐसा बचकाना कदम है जिससे लोकतंत्रा की जड़ें कमजोर होंगी। ‘कैग’ को यह अधिकार कानून ने दिया है कि वह न केवल सरकार के खर्चे की जांच करे बल्कि इन खर्चों से यदि कोई योजना प्रभावित होती है तो इसके लिए जिम्मेदार लोगों की तलाश कर उनके खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश करे। अपनी जिम्मेदारी सक्षमतापूर्वक निभाने के बावजूद यदि ‘कैग’ को शाबासी नहीं दी जा रही है तो कीचड़ की राजनीति में तो कम से कम उसे नहीं ही घसीटना चाहिए। ‘कैग’ की यह रिपोर्ट शीर्ष पदों पर भ्रष्टाचार की सरपट दौड़ती गाड़ी का बेबाकी से पर्दाफाश करती है। यह कहती है कि इस खेल में चुनिंदा पदों पर बैठे लोगों ने नियम कायदों को ताक पर रखा, दस्तावेजों में हेरफेर किए और सैन्यकर्मियों की विध्वा और बच्चों के कल्याण के नाम पर मुंबई के पाश इलाके में स्थित सेना की बेशकीमती जमीन हड़प कर बहुमंजिली इमारत खड़ी करवा दी। रिपोर्ट में दो टूक शब्दों में इन शीर्ष पदाधिकारियो के खिलाफ ऐसी कार्रवाई की मांग की गई है जो भ्रष्टाचारियों में दहशत जगा सके और लोगों में यकीन भर सके कि सरकार भ्रष्ट व्यवस्था पर अंतिम चोट के लिए कृतसंकल्प है। राजनीतिक दूरदर्शिता का तकाजा भी कुछ ऐसा ही कहता है।
लेकिन, ‘कैग’ के रिपोर्टों पर ही सवाल उठा रही कांग्रेस क्या ‘बोपफोर्स’ के दिनों को दोहरा रही है! आपको याद दिला दें कि अस्सी के दशक में ‘कैग’ के तत्कालीन मुखिया टीएन चतुर्वदी ने बोपफोर्स तोप सौदे में कमीशनखोरी का शक जाहिर किया था और मामला इतना उछला था कि तत्कालीन राजीव गाँधी सरकार मुसीबत में आ गई थी। बोपफोर्स नाम ही उन दिनों सरकारी भ्रष्टाचार का पर्याय बन गया था। चतुर्वेदी को इस रिपोर्ट के लिए व्यक्तिगत स्तर पर भी ठीक ठाक परेशानियां झेलनी पड़ी थीं। इस बार निशाने पर ‘कैग’ के वर्तमान मुखिया विनोद राय हैं और कहा जा रहा है कि अपनी रिपोर्टों को लेकर वह भी खासा दबाव झेल रहे हैं। ‘कै ग’ से शीला सरकार के बचाव में बेवजह के विवाद उठाए जा रहे हैं जो अंत में सरकार के लिए ही मुसीबत बन जा रहे हैं। सुरेश कलमाडी के अनैतिक आचरण से बचाव के लिए सरकार की ओर से तर्क गढ़ा जा रहा है कि यह नियुक्ति एनडीए के शासनकाल में हुई थी हालांकि तमाम दस्तावेज सरकार की तरपफ इशारा करते हैं। इस कुतर्क का नतीजा यह है कि विपक्ष के निशाने पर अब सीधे प्रधानमंत्री  और कांग्रेस अध्यक्ष आ गए हैं। समाधन की जगह समस्याएं खड़ी कर सरकार खुद ब खुद दबाव में आती जा रही है।



 फिर खतरे में मुबई

 देश की आर्थिक राजधानी मुंबई फिर खतरे में है। यह चुनौती एक बार फिर समंदर से ही मिली है और हर बार की तरह हमारी चैकसी व सुरक्षा व्यवस्था इस बार भी धरी की धरी रह गई। चंद दिनों के अंतर से दो जहाज गुपचुप मुंबई पहुंच गए। इनमें से एक महीनों पहले खराब होने के कारण त्याग दिया गया था और लावारिस समुद्र में भटक रहा था। ‘एमवी पवित’ नामक यह जहाज हफ्रतों हमारी जल सीमा में भटकता हुआ जब मुंबई के जूहू तट पर आकर अटक गया तब जाकर नींद खुली। इसके तुरंत बाद, मुंबई से चंद मील की दूरी पर ‘एमवी रैक’ नामक दूसरा मालवाहक जहाज पानी में डूब गया और इसमें लदा सैकड़ों टन पेट्रोल पानी में रिसता हुआ मुंबई के तटों तक पहुंच गया है। समुद्री जीव खतरे में आ गए हैं। इस मामले में भी हमारी तटवर्ती सुरक्षा व्यवस्था की पोल खुल गई और कई दिन बीत जाने के बावजूद हम अब तक पक्का नहीं कर पाए हैं कि रिसाव का कारण इन दोनों में से कौन सा जहाज है। समुद्र की दिशा से मुंबई पर आतंकी हमला झेले हुए अब तीन साल होने को आ रहे हैं, बावजूद हमारी तटवर्ती सुरक्षा आज भी छिद्रों से भरी हुई है और इसकी जवाबदेही मुख्य रूप से नौसेना की है। पिछले दिनों हमारी जलसेना में घुसे एक जहाज को पाकिस्तान से बात करते सुना गया जिसमें कुछ लोगों को मुंबई तट के नजदीक चुपचाप उतारे जाने का जिक्र था। हमारी नौसेना को इसकी भनक तक नहीं लग पायी। शुक्र था कि अन्य सुरक्षा एजेंसियां यह बातचीत पकड़ने में सफल रहीं। हालांकि, सघन छानबीन के बावजूद इस संदेहास्पद जहाज को ढूंढ पाने में सफलता नहीं मिल पायी है।
इसी तरह अभी चंद दिनों पहले ही मछली पकड़ने वाली एक लावारिस विदेशी नौका भटकती गुजरात के तट पर आ लगी थी। जाहिर था जो नौसेना एमवी पावित जैसे विशाल जहाज को मुंबई की तरफ आता नहीं देख पायी वह इस छोटी नौका को कहां से पकड़ पाती! मुंबई हमले के बाद हमने तटवर्ती सुरक्षा की अचूक व्यवस्था बनाने का दावा किया और नौसेना के अलावा कोस्टगार्ड, समुद्री पुलिस और कई एजेंसियों को इसमें लगा दिया। कागजों पर तो बेशक यह योजना अभेद्य किले जैसा भ्रम पैदा करती है लेकिन हकीकत उसी वक्त पता चल गई जब अस्सी मीटर लंबे एक विशाल जहाज को हम तब तक नहीं देख पाए जब तक कि वह जूहू के तट तक नहीं आ पहुंचा। सुरक्षा जैसा ही बड़ा सवाल पर्यावरण के बचाव का खड़ा होता है क्योंकि मुंबई के निकट जहाजों से तेल रिसाव की घटना नियमित रूप लेने लगी है। कोस्टगार्ड के आंकड़े बताते हैं कि बारह वर्षो में ऐसे रिसाव की अड़सठ घटनाएं हुई हैं जिनमें बड़े पैमाने पर हानि हुई है। लेकिन, अब तक हम ऐसा सक्षम कानून नहीं बना पाये हैं जो इनसे होने वाली क्षति के लिए जहाज मालिकों से पर्याप्त हर्जाना वसूल सके। यहां तक कि हमने अंतरराष्ट्रीय सामुद्रिक संगठन के साथ वह संधि भी नहीं की है जो इन मामलों में जहाजों पर पर्याप्त दंड लगाता है। तेल रिसाव से सुरक्षा के हमारे उपाय इतने लचर हैं कि तत्कालीन पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने पिछले साल खुलकर इसकी र्भत्सना की थी। मानसून का समय मछलियों और वानस्पतिक प्रजनन का होता है। ऐसे वक्त तेल रिसाव की दुर्घटना बेहद अपफसोसनाक है।



 टकराव का रास्ता

 लगता है संसद का अति महत्वपूर्ण मानसून सत्रा भी सरकार और विपक्ष के टकराव की भेंट चढ़ जाएगा। इसके पहले के दोनों सत्रा भी ऐसे हंगामे में धुल चुके हैं और देश विवश होकर लोकतंत्रा के इस क्षरण को देखने को मजबूर है। इस बार की मुसीबत भी सरकारी आडीटर ‘कैग’ की रिपोर्ट की बुलायी हुई है जिसमें कामनवेल्थ खेलों के दौरान हुई महाधांधली को लेकर दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित पर उंगली उठायी गई है। रिपोर्ट में प्रधानमंत्री कार्यालय को भी कठघरे में खड़ा कर दिया गया है और कहा गया है कि उसकी सिफारिश पर ही सुरेश कलमाडी को इन खेलों के आयोजन में सर्वेसर्वा बना कर निरंकुश अधिकारों से लैस कर दिया गया था। अब विपक्षी पार्टियां शीला दीक्षित को हटाने की मांग कर रही हैं। सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बीजेपी तो मांग कर रही है कि शीला को न सिर्फ हटाया जाए बल्कि उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कर उनकी गिरफ्रतारी भी की जाए। बीजेपी ने केंद्रीय खेलमंत्री अजय माकन के खिलाफ संसद के दोनों सदनों में विशेषाधिकार हनन का नोटिस भी दायर कर दिया है क्योंकि उन्होंने कलमाडी के चयन के लिए एनडीए की पूर्ववर्ती सरकार पर जिम्मेदारी थोपी है। संसद के अंदर चल रहा यह संघर्ष इसकी समितियों तक फैलता जा रहा है। लोकलेखा समिति के अध्यक्ष बीजेपी के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी एक बार फिर विवादों में आ गए हैं। टू-जी स्पेक्ट्रम महाघोटाले पर पिछली रिपोर्ट निरस्त होने के बाद उन्होंने अपने नए कार्यकाल में इस रिपोर्ट को न केवल जीवित कर दिया है बल्कि इस बार प्रधानमंत्री का नाम भी इसमें घसीटने की तैयारी कर ली है। जाहिर है, इस पर सत्तापक्ष बौखला गया है और जोशी का इस्तीफा मांग रहा है। कुल मिला कर हालात बदतर बनते जा रहे हैं जिसका खमियाजा अंततः देश को ही चुकाना पड़ रहा है।
ऐसा नहीं कि राजनीतिक दलों को संसद में चल रहे लगातार अवरोध से देश की चिंता का अहसास नहीं है। मानसून सत्रा शुरू होने से पहले तमाम पार्टियों की बैठक का फैसला था कि संसद की कार्यवाही को अवरोधों से मुक्त रखा जाएगा। महंगाई जैसे पेंचीदे विषय पर बहस के दौरान ऐसा दिखा भी जब सत्ता और विपक्ष ने हमलों के बावजूद सदन की मर्यादा बनाए रखी। लेकिन, ‘कैग’ की रिपोर्ट में शीला दीक्षित पर लगे आरोप ने बीजेपी के कर्नाटक के घाव हरे कर दिये। ऐसे ही आरोपों के दबाव में उसे मुख्यमंत्री येदियुरप्पा को हटाने पर मजबूर होना पड़ा था। अब शीला को निशाना बना बीजेपी हिसाब चुकाने के मूड में है। बेशक, ‘कैग’ के संदर्भ में दीक्षित पर जिम्मेदारी तो बनती ही है लेकिन इसकी आड़ में संसद को बंधक बना लेना कहां तक उचित है! एक से बढ़ कर एक महत्वपूर्ण कानूनों को इस सत्रा में शक्ल देने की तैयारी है। लोकपाल पर कानून बनने के साथ ही गरीबों को खाद्य सुरक्षा के दायरे में लाने की बात है और दर्जनों कानूनों को अमली जामा पहनाया जाना है। लेकिन मौजूदा गतिरोध से देश के बढ़ते कदम ठिठक सकते हैं। ऐसे वक्त जब पूरी दुनिया में मंदी और आतंक का हाहाकार है, हम समाधान की जगह समस्याओं के जाल बुनते जा रहे हैं। क्या यही एक वयस्क लोकतंत्रा की पहचान है, जिसका ढिंढोरा पीटने से हम कभी नहीं अघाते हैं!



 डीटीसी बसों से बढ़ते हादसे

 दिल्ली परिवहन निगम डीटीसी की कमाई बढ़ने के साथ ही इन बसों से दुर्घटनाएं बढ़ने का मामला निश्चित ही चिंताजनक है। गत वर्ष की तुलना में इस वर्ष डीटीसी बसों से हुए हादसों की संख्या में पिछले वर्ष के मुकाबले हुई वृद्धि यह दर्शाती है कि डीटीसी बस चालक कुछ लापरवाह हुए हैं या वे यातायात नियमों का भलीभांति पालन नहीं कर रहे हैं। डीटीसी के चेयरमैन ने इस संबंध् में शुक्रवार को सभी वरिष्ठ अधिकारियो की बैठक बुलाकर बढ़ती सड़क दुर्घटनाओं के प्रति चिंता जताई और अधिकारियो को निर्देश दिए कि डीटीसी बस से होने वाले हादसे में मौत होने पर सीधे तौर पर डिपो प्रबंध्क और क्षेत्रीय प्रबंध्क उत्तरदायी होंगे, जिनके विरुद्ध वह स्वयं अनुशासनात्मक कार्रवाई करेंगे।
इसके साथ ही उन्होंने अधिकारियो को निर्देश दिए कि भविष्य में हादसों पर रोक लगे इसके लिए प्रत्येक डिपो प्रबंध्क कम से कम पांच ड्राइवरों को प्रतिदिन यातायात नियमों की जानकारी देंगे। इसके अलावा डीटीसी के क्षेत्रीय प्रबंधक सप्ताह में एक बार ड्राइवरों को बुलाकर यातायात नियमों की जानकारी देंगे। साथ ही डीटीसी के ट्रेनिंग स्कूलों में भी ड्राइवरों को प्रशिक्षण के लिए भेजा जाए। उन्होंने ट्रेनिंग स्कूलों के प्रभारियों को निर्देश दिए कि वह दुर्घटनाओं पर पूरी तरह नियंत्राण के लिए विशेष कार्यक्रम चलाएं। ड्राइवर सही तरह से प्रशिक्षित हो सकें इसके लिए यातायात और विभाग के विशेषज्ञों को कार्यशालाओं में बुलाकर उनका व्याख्यान कराएं। डीटीसी बसें ब्लूलाइन बसों की राह पकड़ती जा रही हैं और उन्हीं की तर्ज पर किलर बसें बनती जा रही हैं। आए दिन दिल्ली के किसी न किसी इलाके में डीटीसी बस से कोई न कोई दुर्घटना होती है और उनमें से कई में लोगों की जान भी जाती है।
डीटीसी बसों से बढ़ते हादसों को देखते हुए यह बहुत आवश्यक हो गया था कि अधिकारी इस मुद्दे को गंभीरता से लें और हादसे रोकने की दिशा में पफौरन कदम उठाएं। ऐसी उम्मीद की जा सकती है कि डीटीसी चेयरमैन के इन निर्देशों पर अधिकारी अमल करेंगे और सड़क हादसों में कमी आएगी। मेट्रो के साथ ही डीटीसी बसें भी दिल्लीवासियों को यातायात का सुविधजनक और सुरक्षित साध्न मुहैया करा रही हैं। ऐसे में यह आवश्यक है कि डीटीसी बसों को ब्लूलाइन जैसी कुख्यात स्थिति में आने से रोका जाए और दिल्ली के लोगों को बेहतर बस सेवा प्रदान की जाए।



किसानों के साथ झांसेबाजी

 आवासीय और औद्योगिक परियोजनाओं के नाम पर किसानों और आदिवासियों को उनकी जमीन से सरकारी स्तर पर बेदखल करने का सिलसिला हमारे देश में कई वर्षों से चला आ रहा है। किसानों और आदिवासियों से उनकी आजीविका के एकमात्रा स्रोत को छीने जाने की इस कार्यवाही को नाम दिया जाता है जमीन अध्ग्रिहण। यह जमीन अध्ग्रिहण होता है कोई सवा सौ साल पहले अँग्रेजी हुकूमत के समय बने कानून के तहत। पिछले कुछ महीनों से जमीन अध्ग्रिहण का मुद्दा देशभर में गरमाया हुआ है। कई जगह जमीन मालिकों और सरकार के बीच हिंसक संघर्ष भी हुआ है और कई जगह अध्ग्रिहण की ऐसी कार्रवाइयों को अदालतों ने खारिज भी किया है। जहाँ तक जमीन अध्ग्रिहण कानून का सवाल है, देश की अदालतें कई बार इस औपनिवेशिक कानून को अप्रासंगिक करार दे चुकी है और सुप्रीम कोर्ट ने भी एक बार फिर इस कानून को ‘धेखा’ तथा ‘बीमार लोगों का बनाया हुआ कानून’ करार देते हुए इसे रद्द करने को कहा है।
हालांकि केंद्र सरकार ने पिछले दिनों ऐलान किया था कि उसने मौजूदा जमीन अध्ग्रिहण कानून की जगह नया कानून बनाने के लिए विधेयक का मसौदा तैयार कर लिया है और इसे संसद के मानसून सत्र में पारित करा लिया जाएगा, लेकिन अब सरकार कह रही है कि राज्य सरकारों, राजनीतिक दलों और किसानों के सुझाव मिलने के बाद ही इसे अंतिम रूप दिया जाएगा। ग्रामीण विकास मंत्रालय ने प्रस्तावित नए कानून के मसौदे को रायशुमारी के लिए अपनी वेबसाइट पर जारी किया है और 31 अगस्त तक लोगों से राय मांगी है।
जाहिर है कि राय मिलने पर उस पर विचार होगा और यह प्रक्रिया जब तक पूरी होगी, तब तक संसद का पांच सप्ताह का मौजूदा सत्रा खत्म हो चुका होगा। सवाल उठता है कि पोलियो से लेकर राष्ट्रीय पहचान पत्रा बनाने जैसे कई कार्यक्रमों पर करोड़ों रुपए के विज्ञापन जारी करने वाली सरकार ने इस मसौदे को विज्ञापन के जरिए आम किसानों, राजनीतिक दलों और जन संगठनों तक पहुंचाने का प्रयास क्यों नहीं किया? पूछा जा सकता है कि ऐसे कितने किसान हैं जो लैपटाप या कम्प्यूटर रखते हैं जो इस मसौदे को इंटरनेट पर देखकर सरकार को अपने सुझाव दे पाएंगे? जाहिर है सरकार न सिर्फ किसानों को झांसा दे रही है, बल्कि कांग्रेस महासचिव राहुल गाँधी के उस आश्वासन को भी झूठा साबित करने पर तुली है जो उन्होंने भट्टा पारसौल और अलीगढ़ के किसानों को दिया था कि सरकार उनके हित में नया जमीन अध्ग्रिहण कानून संसद के मानसून सत्रा में ही पारित कराएगी।



 अनुशासन के नाम पर

 शिक्षा और अनुशासन एक दूसरे-से गहरे जुड़े हैं। इतने गहरे कि इस बहाने इस शिक्षण संस्कार की परंपरा से लेकर उसके लक्ष्य तक को भलीभांति परिभाषित कर सकते हैं। पर आज अनुशासन आचरण से ज्यादा दूसरे पर थोपे जाने वाली मर्यादा का नाम है। विडम्बना है कि मर्यादा का यह आग्रह सबसे ज्यादा उस पीढ़ी से किया जाता है, जिस पर परंपरागत जीवन मूल्यों के साथ आधुनिक समय चेतना को भी आत्मसात करने का दबाव है। ऐसे में यह कहीं से मुनासिब नहीं कि हम बलात अनुशासन की लाठी उस पर भांजें। इंसाफ, तहजीब और मजहबी दरकार के नाम पर जिस तालिबानी सलूक को पूरी दुनिया में बर्बरता के रूप में देखा जाता है, वह बर्बरता हमारे समय और समाज के कुछ दायरों का सच भर नहीं बल्कि अंदर के कोनों-खोलों की दबी-छिपी सचाई भी है। घर-परिवार और समाज में यौन हिंसा के माहौल में तेजी और स्कूल-कालेजों में अनुशासन के नाम पर छात्रों से मध्यकालीन मानसिकता का सलूक अगर हमारी चिंता का विषय नहीं है तो इसे खतरनाक प्रवृत्ति ही कहेंगे।
अखबारों में खबर आई कि चेन्नई के एक कालेज में शिक्षक ने मोबाइल फोन रखने के आरोप में एक छात्रा की इस तरह तलाशी ली कि उसे लगभग निर्वस्त्रा कर दिया। दूसरी घटना केरल के एक केंद्रीय विद्यालय की है, जहां एक शिक्षक को बच्चों के बाल बढ़े होना इतना अनुशासनहीन लगा कि उसने एक साथ 90 बच्चों के बाल काट डाले। अनुशासन और संस्कृति के नाम पर पहरुवागिरी का यह कृत्य वैसा ही है जो युवकों-युवतियों को कभी कपड़े पहनने के सलीके के नाम पर सरेआम बेइज्जत करने से बाज नहीं आता तो कभी उनके प्रेम और खुलेआम मेलजोल को ध्र्म और संस्कृति के लिए घातक करार देता है। गौरतलब है कि अनुशासन का कोई आग्रह कोई खारिज की जा सकने वाली दरकार नहीं पर यह आग्रह दुराग्रह बन जाए तो निश्चित रूप से खतरनाक मंसूबों को साधने का बहाना बन जाता है। जहां तक बात है शिक्षण परिसरों में बरते और दिखने वाले अनुशासन की तो इसकी बुनियादी जरूरत से तो शायद ही कोई इनकार करे। एक बेहतर अनुशासित वातावरण में ही बेहतर शिक्षण का मकसद पूरा होता है। देश-दुनिया के हजारों-लाखों स्कूलों-कालेजों और विश्वविद्यालयों में से जिन कुछेक को ज्यादा लोकप्रियता और सम्मान हासिल है, वहां शिक्षा के साथ अनुशासन भी आला दर्जे का है। यही नहीं, इस अनुशासन के दायरे में सिर्फ वहां के छात्रा हीं नहीं बल्कि तमाम शिक्षक और कर्मचारी भी आते हैं।
इतिहास के कई नायकों ने अपनी सपफलता का श्रेय अपने शिक्षकों की मेहनत और स्कूल-कालेज के वातावरण को ही दिया है। साफ है, शिक्षकों के व्यवहार से छात्रों तक पहुंचने वाला अनुशासन निहायत संवेदनशील मसला है और किसी भी शिक्षा संस्थान में इस संवेदनशीलता का निर्वहन किस रूप में हो रहा है, यह उसके स्तर को काफी हद तक कर देता है। ऐसे दौर में जबकि शिक्षा को छात्रों के ज्यादा से ज्यादा अनुकूल और सहज बनाने की कवायद तेज है, छात्रों से असहज अनुशासन की अपेक्षा करना, समय और शिक्षा की आधुनिक समझ के पूरी तरह खिलाफ है। 



 महंगाई का ठीकरा

 पूरी दुनिया की आर्थिक हालत ठीक नहीं। यूरोपीय देशों की आर्थिक स्थिति में थोड़ा सुधर जरूर है पर अस्थायी है। अमेरिका के आर्थिक-वित्तीय क्षेत्रा में अनिश्चितता बनी है। ऐसे में भारत 8.3 पफीसद की प्रगति दर प्राप्त कर लेता है तो निराशाजनक नहीं होगा। वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी यह कह कर संतोष जता सकते हैं लेकिन इससे भारतीयों का पेट भरता नहीं दिखता क्योंकि विकास की यह दर जिस कीमत पर खींची जा रही है, वह आम आदमी के मुंह का निवाला छीन रही है। अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि तीन सालों में देश में गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वालों की संख्या एशियाई विकास बैंक की ताजा रिपोर्ट के अनुसार पांच करोड़ बढ़ी है। कारण स्थानीय जरूरतें नजरअंदाज कर सरकार द्वारा चलायी जा रही नीतियां है। यही स्थिति रहने पर समस्या गम्भीर होने से रोकी नहीं जा सकेगी। गरीबी रेखा के नीचे वे लोग आते हैं, जिन्हें सामान्यतया दोनों का खाना सही से नसीब नहीं हो पाता। अभी देश में करीब हर छठां व्यक्ति इस श्रेणी में है। महंगाई पर बात भारत से बाहर के संदर्भों का उल्लेख करते हुए करना इसलिए जरूरी है क्योंकि सरकार इस समेत विभिन्न मुद्दों की समस्या के रूप में उपस्थिति वैश्विक स्थिति के नजरिये से देखने की अभ्यस्त हो चली है। उसे अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं की अध्कि चिंता है।
 यह बात राष्ट्रमंडल खेल घोटाले के लिए बड़े जिम्मेदार माने जा रहे सुरेश कलमाड़ी को ही खेल आयोजन समिति का मुखिया बनाये जाने की मजबूरी के बाबत एक दिन पहले लोकसभा में प्रकट उसके बयान में भी झलकती है। सरकार महंगाई को जिस इंडेक्स से मापती है, उसके मानक क्या हैं, यह आम आदमी को समझ में नहीं आता, पर 2005 के बाद से बाजार में जिस चीज की कीमत बढ़ी, वह फिर नीचे नहीं आयी। इस मामले में अपवाद दाल, प्याज, चीनी जैसी चीजों की कीमतों से नहीं, बल्कि कुप्रबंध्न व महंगाई के राजनीतिशास्त्रा का पर्दापफाश हो जाने की वजह से है। सराकार लोकसभा में यह कहकर भले अपनी पार्टी के लोागों की तालियां जुटा ले कि महंगाई की दर में सुधर हुआ है पर यह बात हर किसी को पता है कि उसे कोई राहत नहीं मिल रही है। उपभोक्ता वस्तुओं की कमी नहीं है। खाद्यान्न की उपलब्ध्ता कम नहीं हुई है पर जिस तरह गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वालों और निम्न मध्यम वर्ग के लोगों की आय का 67 प्रतिशत सिर्पफ भोजन जुटाने पर जाया हो रहा है उसने उसकी आर्थिक कमर तोड़ दी है। नतीजातन अन्य चीजों की कीमतें मारक स्तर तक बढ़ी हैं। पिछले तीन सालों में आम लोगों की आय में सिर्पफ दस पफीसद इजापफा हुआ है मगर महंगाई के कारण आम वस्तुओं के मूल्य ठीक दोगुने हो गये हैं।
सरकार कहती है कि इसकी वहज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पेट्रोलियम मूल्यों में हो रही वृद्धि है। लेकिन अपने राजस्व में वृद्धि के लिए उसने ही तो करों के बोझ से मिट्टी के तेल जैसी प्राथमिक वस्तु तक को जनता की पहुंच से दूर कर दिया है। बुध्वार को लोकसभा में महंगाई पर चर्चा के दौरान विपक्ष न इसके कारणों का खुलासा उचित ढंग से किया है लेकिन जब तक सरकार मुनापफाखोरों और कालाबाजारियों के वजूद को नहीं तोड़ती, महंगाई के घोड़े पर लगाम लगानी मुमकिन नहीं दिखती। जरूरी हो तो जिंसो के वायदा कारोबार पर भी तत्काल रोक लगायी जानी चाहिए।



 बेशर्मी-मोर्चा के निहितार्थ

 दिल्ली में पिछले दिनों कनाडा, लंदन आदि देशों की तर्ज पर, महिलाओं के खिलाफ हो रही यौन-हिंसा के खिलाफ आवाज उठाने के लिए ‘बेशर्मी-मोर्चा’ खोला गया। जंतर-मंतर पर ‘स्लट-वाक’ यानी ‘बेशर्मी-मार्च’ में महिलाओं के प्रति संकीर्ण सोच पर प्रहार किया गया। इस साल ऐसे जुलूस की शुरूआत कनाडा से हुई थी। टोरंटो के एक पुलिस अधिकारी की टिप्पणी के खिलाफ तल्ख प्रतिक्रियास्वरूप इसकी शुरूआत हुई थी। इस अधिकारी ने टिप्पणी की थी-यदि महिलाओं को यौन-उत्पीड़न से बचना है तो उन्हें वेश्याओं की तरह कपड़े पहनने से बचना चाहिए। इस टिप्पणी के बाद कनाडा के अलावा  अमेरिका, यूरोप, आस्ट्रेलिया एवं एशिया में विरोध्-प्रदर्शन हुए। इन विरोध्-प्रदर्शनों में महिलाओं ने कम कपड़े पहनकर यह जाहिर करने का प्रयास किया कि महिलाएं यौन-प्रताड़ना के डर के बिना अपनी इच्छा के अनुसार कपड़े पहनें। जंतर-मंतर पर भी इस मार्च के दौरान हाथों में बैनर लिये युवतियों ने प्रदर्शन किया। एक बैनर पर लिखा था ‘मेरे छोटे कपड़े से तुम्हारा कोई लेना-देना नहीं है। सोच बदलो कपड़े नहीं।’ उनकी दलील थी कि छोटे कपडो का मतलब यह कतई नहीं है कि यह छेड़छाड़ का आमंत्राण है। इनका मानना है कि व्यक्ति में स्त्री के प्रति इज्जत का भाव होना चाहिए। कपड़ों के आकार का इससे कोई लेना-देना नहीं है। इस मार्च के समर्थक कहते हैं कि इस बात की क्या गारंटी है कि साड़ी पहनने वाली महिलाओं से दुराचार नहीं होता। बहरहाल, भारत में अपनी किस्म के इस पहले मार्च ने महिलाओं के हक में आवाज बुलंद करने की एक सार्थक कोशिश जरूर की है। मीडिया की सक्रियता से उन युवतियों को संबल जरूर मिला जो अपनी मर्जी के मुताबिक कपड़े पहनने की वकालत करती हैं।
 कुल मिलाकर नारी-अधिकारो की लड़ाई लड़ने वालों ने इस मोर्चे की सफलता को अपनी जीत बताया है। कहने को तो दिल्ली में ‘स्लट-वाक’ निकालने का मकसद महिलाओं के विरुद्ध होने वाली यौन-हिंसा के खिलाफ माहौल बनाना था। लेकिन सवाल यह उठता है कि पश्चिमी समाज की तर्ज पर निकाले गये इस ‘बेशर्मी-मार्च’ के जरिये समाज में महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता बढ़ पाएगी ?या फिर यह पश्चिमी देशों की नकल का एक फैशनेबल उदाहरण बनकर रह जाएगा ?लेकिन एक हकीकत यह भी है कि भारतीय समाज भी खुलेपन को एक सीमा तक ही बर्दाश्त करता है। वैश्वीकरण व उदारीकरण के इस दौर में भले ही महानगरों व बड़े शहरों में कपड़ों की आजादी को अंगीकार किया गया हो लेकिन ग्राम-देहात में इसे स्वीकार करने को कतई नहीं हैं। अकसर स्कूल-कालेजों से लेकर निजी जीवन में लड़कियों के ड्रेस-कोड को लेकर फतवे सामने आते रहे हैं। जिस तबके में प्यार करने वालों को मौत के घाट उतारने से गुरेज नहीं किया जाता, वहां इस खुलेपन को स्वीकार किया जाएगा, कहना मुश्किल है। देश में एक तबका व कुछ संगठन ऐसे हैं जो  वस्त्रों की आजादी को अपनी संस्कृति-परंपरा पर आक्रमण मानते हैं। यह वही वर्ग है जो वेलेंटाइन-डे पर दुकानों व प्रेमी-युगलों को हमले का शिकार बनाता है। वास्तव में आज भी भारतीय समाज का बड़ा वर्ग यह मान्यता रखता है कि वस्त्रों की गरिमा से स्त्राी की अस्मिता स्थापित होती है। रूढि़वादी सोच का समर्थन करने वाले तबके की अपनी दलीलें हैं कि हमारी संस्कृति गरिमापूर्ण वस्त्रों की पक्षध्र रही है। उसका मानना है कि पश्चिमी संस्कृति का अंधनुकरण छिछला व बेहूदा है जबकि आधुनिक सोच वाला तबका मानसिक नंगेपन को दूर करने की वकालत करता है जो मानता है कि यदि मनुष्य की सोच सकारात्मक है तो वस्त्रों के कम या ज्यादा कोई फर्क नहीं पड़ता। वास्तव में हमें महिलाओं की इज्जत करना सीखना चाहिए।



 प्रतिभा से खिलवाड़

 बारिश के बाद जलभराव और जाम मानों दिल्ली की नियति ही बन गईं है। हर वर्ष बारिश में राजधानी की प्रमुख सड़कों पर जलभराव और उसके कारण जाम लगना निश्चित ही दुर्भाग्यपूर्ण है। संबंधित सरकारी एजेंसियों को यह समस्या दूर करने के लिए गंभीर प्रयास करने चाहिए ताकि बारिश का आनंददायक मौसम दिल्लीवासियों के लिए परेशानी का सबब न बने। मंगलवार को दिल्ली में इस मौसम की सबसे ज्यादा बारिश दर्ज की गई। बारिश के बाद जलभराव के चलते उतरी, मध्य व दक्षिणी दिल्ली इलाके की करीब सभी प्रमुख सड़कों पर भयंकर जाम लग गया। लोग घंटों टैफिक में फंसे रहे। इस दौरान चैराहों पर न तो लालबत्ती काम कर रही थीं और न ही जलभराव से निजात दिलाने के लिए कहीं संबंधित विभागों के कर्मचारी दिखाई दिए। एमसीडी की रिपोर्ट के मुताबिक, मंगलवार को बारिश की वजह से 18 स्थानों पर भारी जलभराव हुआ। एनडीएमसी इलाके में भी कुछ स्थानों पर जलभराव के साथ तीन जगहो पर सड़क धंसने का मामला भी सामने आया।
दिल्ली में मंगलवार को हुआ जलभराव व जाम लगने का मामला कोई नया नहीं है। बारिश जब भी राजधानी पर मेहरबान होती है, दिल्लीवासियों को जलभराव व जाम के रूप में कष्ट झेलना पड़ता है। ये समस्या एमसीडी के इलाके में तो है ही, एनडीएमसी का वीआइपी क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं है। बारिश के दिनों में राजधानी की ऐसी स्थिति किसी भी हाल में स्वीकार्य नहीं है। एमसीडी और एनडीएमसी को चाहिए कि वे सड़कों पर जलभराव रोकने को लेकर पूरी गंभीरता में कार्ययोजना बनाएं और उसे अगले बारिश के मौसम से पूर्व हर हाल में पूरा करें। यह आवश्यक है कि जलभराव वाले स्थानों की पहचान की जाए, उन क्षेत्रों में इसके कारणों की तलाश कर उन्हें दूर किया जाए। साथ ही नालों के उफपर से अतिक्रमण हटाकर उनकी पूरी तरह से सफाई की जानी चाहिए। बारिश के समय गोल चक्करों पर लाल बत्तियां ठीक तरह से कार्य करें इसके भी उचित प्रबंध किए जाने चाहिए। ऐसे मौके पर यातायात पुलिस विभाग को अधिक सक्रिय होकर कार्य करना चाहिए। अधिक से अधिक यातायात पुलिस कर्मियों को सड़कों पर उतार दिया जाना चाहिए, ताकि वाहन चालकों को किसी तरह की कोई परेशानी न हों और उनका आवागमन सुचारू हो सके। जलभराव में बंद पड़े वाहनों को जल्द से जल्द हटाने की व्यवस्था भी की जानी चाहिए।



प्रतिभा से खिलवाड़

 बारिश के बाद जलभराव और जाम मानों दिल्ली की नियति ही बन गईं है। हर वर्ष बारिश में राजधानी की प्रमुख सड़कों पर जलभराव और उसके कारण जाम लगना निश्चित ही दुर्भाग्यपूर्ण है। संबंधित सरकारी एजेंसियों को यह समस्या दूर करने के लिए गंभीर प्रयास करने चाहिए ताकि बारिश का आनंददायक मौसम दिल्लीवासियों के लिए परेशानी का सबब न बने। मंगलवार को दिल्ली में इस मौसम की सबसे ज्यादा बारिश दर्ज की गई। बारिश के बाद जलभराव के चलते उतरी, मध्य व दक्षिणी दिल्ली इलाके की करीब सभी प्रमुख सड़कों पर भयंकर जाम लग गया। लोग घंटों टैफिक में फंसे रहे। इस दौरान चैराहों पर न तो लालबत्ती काम कर रही थीं और न ही जलभराव से निजात दिलाने के लिए कहीं संबंधित विभागों के कर्मचारी दिखाई दिए। एमसीडी की रिपोर्ट के मुताबिक, मंगलवार को बारिश की वजह से 18 स्थानों पर भारी जलभराव हुआ। एनडीएमसी इलाके में भी कुछ स्थानों पर जलभराव के साथ तीन जगहो पर सड़क धंसने का मामला भी सामने आया।
दिल्ली में मंगलवार को हुआ जलभराव व जाम लगने का मामला कोई नया नहीं है। बारिश जब भी राजधानी पर मेहरबान होती है, दिल्लीवासियों को जलभराव व जाम के रूप में कष्ट झेलना पड़ता है। ये समस्या एमसीडी के इलाके में तो है ही, एनडीएमसी का वीआइपी क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं है। बारिश के दिनों में राजधानी की ऐसी स्थिति किसी भी हाल में स्वीकार्य नहीं है। एमसीडी और एनडीएमसी को चाहिए कि वे सड़कों पर जलभराव रोकने को लेकर पूरी गंभीरता में कार्ययोजना बनाएं और उसे अगले बारिश के मौसम से पूर्व हर हाल में पूरा करें। यह आवश्यक है कि जलभराव वाले स्थानों की पहचान की जाए, उन क्षेत्रों में इसके कारणों की तलाश कर उन्हें दूर किया जाए। साथ ही नालों के उपर से अतिक्रमण हटाकर उनकी पूरी तरह से सफाई की जानी चाहिए। बारिश के समय गोल चक्करों पर लाल बत्तियां ठीक तरह से कार्य करें इसके भी उचित प्रबंध किए जाने चाहिए। ऐसे मौके पर यातायात पुलिस विभाग को अधिक सक्रिय होकर कार्य करना चाहिए। अधिक से अधिक यातायात पुलिस कर्मियों को सड़कों पर उतार दिया जाना चाहिए, ताकि वाहन चालकों को किसी तरह की कोई परेशानी न हों और उनका आवागमन सुचारू हो सके। जलभराव में बंद पड़े वाहनों को जल्द से जल्द हटाने की व्यवस्था भी की जानी चाहिए।



भुट्टो से हिना तक

 भारत से बातचीत के लिए रवाना होते वक्त पाकिस्तान की नई विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार ने जोरशोर से घोषणा की थी कि उनका देश इतिहास से सबक जरूर लेगा लेकिन उसकी गुलामी में डूबा नहीं रहेगा। सामान्य हालात में ऐसी घोषणाएं उम्मीदें जगाने वाली होती हैं। लेकिन,भारत-पाकिस्तान के दशकों के नर्म-गर्म संबंधें के हालात से जो वाकिफ हैं, ऐसे नारे शायद ही उनके खून में उबाल ला सके। भारत की जमीन पर खैर पैर रखने के बाद हिना ने पहला काम ही यह साबित करने का किया और संबंधें को मधुर बनाने की शुरूआत कश्मीर के अलगाववादियों और पाकिस्तानरस्त लोगों से खुसफुस के साथ शुरू की। भारतीय विदेश मंत्री एसएम कृष्णा से मुलाकात के पहले हुर्रियत के दोनों गुटों से अलग-अलग मुलाकात कर हिना ने शर्तिया यह संकेत देने की कोशिश की कि उनका देश कश्मीर के मामले में इन भारत विरोधियो के साथ है।
हिना के अपने देश में लोकतंत्रा भले ही फौजी बूट के तले दबा हो, लेकिन यह भारतीय लोकतंत्रा का ही चमत्कार है कि हुर्रियत जैसा देश विरोधी गुट राजधनी में पाकिस्तान सरकार के  अहम नुमाइंदे से बेरोकटोक चिमगोइयां कर सके। पाकिस्तान की सबसे नौजवान विदेश मंत्री के रूप में चर्चित हिना को कूटनीतिक मामलों में कच्चा समझने वालों की आंखें इस घटना से खुल गई होंगी। लेकिन, इतिहास का पाठ पढ़ाने वाली को अपने देश के एक और संयोग से सबक लेने की जरूरत शायद पड़ेगी। पाकिस्तान में दशकों पहले उनकी ही तरह कम उम्र का एक अति उत्साही राजनेता विदेशमंत्री बना था जिसने घोषणा की थी कि कश्मीर के लिए जरूरत पड़ी तो उनका देश हजार वर्षों तक भारत से युद्ध करता रहेगा। तत्कालीन राष्ट्रपति अयूब खान के पंसदीदा इस विदेश मंत्री का नाम था जुल्फीकार अली भुट्टो, जो बाद में अपने देश के बंटवारे और बांग्लादेश के निर्माण का कारण बने। भारत की जमीन पर मेजबान देश की भावनाओं को ठेस पहुंचा कर हिना दोनों देशों के संबंधें को ऐतिहासिक उड़ान देने के उपायों की खोखली बात कर रही है। हिना को मालूम है कि हुर्रियत की आज की हैसियत नहीं है कि वह कश्मीर की राजनीतिक नियति तय होने में कोई प्रभावी भूमिका निभा सके। हुर्रियत सिर्फ ऐसी बदअमनी फैला सकता है, जिसमें घाटी के नौजवानों की जिंदगी तबाह हो। हुर्रियत की सिर्फ इतनी खासियत रह गई है कि वह कश्मीर घाटी में पाकिस्तान का नाम बस बुदबुदाता भर रहे।
आज कश्मीर में पाकिस्तान के पास बस यही एक संपर्क सूत्र बचा है क्योंकि उसके भेजे आतंकियों के तो भारतीय सुरक्षा बलों के आगे बारह बज चुके हैं। इसलिए अशिष्ट कदम होने के बावजूद हिना की इस हरकत पर भारत को आपा खोने की जरूरत नहीं है। मुंह फुला कर एक-दूसरे से आंखे चुराते रहने से बेहतर है कि दोनों देश बातचीत के संवाद को आगे बढ़ाते रहें और मतभेदों को घटाने के लिए काम करते रहें। बदलते हालात में पाकिस्तान भी समझ रहा है कि अब कश्मीर से भी गंभीर मुद्दे हैं जिन पर दोनों को मिल बैठने की जरूरत है। जिस दिन हिना ने भारत में कदम रखा था, उसी दिन वायुसेना प्रमुख पीवी नाइक पाकिस्तान को चेतावनी दे रहे थे कि उसने यदि एटामिक हमलों की सोची तो नतीजे उसके लिए विनाशकारी होंगे। ऐसी चेतावनी हकीकत न बन जाए, इसके लिए भी संवाद का जारी रहना जरूरी है। 



फिर मौद्रिक कवायद

 महंगाई पर काबू पाना निश्चय ही सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। लेकिन इसके लिए मौद्रिक उपायों का ही सहारा कब तक लिया जाएगाऋ और क्या ये कदम कारगर साबित हो रहें हैं ?यह सवाल इसलिए उठता है क्योंकि रिजर्व बैंक ने एक बार फिर रेपो द